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डॉ राकेश पाठक

आज पं जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिन है। आइये नेहरू के ग्वालियर से सरोकार की पड़ताल करते हैं। दरअसल रियासतों के विलय के बाद जब "मध्य भारत" राज्य बना तो तत्कालीन सिंधिया शासक जीवाजी राव सिंधिया नेहरू जी की ही सम्मति से "राज प्रमुख"(वर्तमान राज्यपाल समान पद) बनाये गए। आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों में ग्वालियर हिन्दू महासभा का गढ़ था। सबसे पहले सांसद भी हिमस के ही थे। दूसरे आम चुनाव से पहले पं नेहरू के आग्रह पर तत्कालीन महारानी विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुईं और 1957 का लोकसभा चुनाव गुना सीट से लड़ा। सिंधिया राजघराने की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह पहली आमद थी।उन्होंने हिन्दू महासभा के दिग्गज विष्णुपंत घनश्याम देशपाण्डे को करारी शिकस्त दी।

17 जुलाई 1961 को जीवाजीराव सिंधिया का देहांत हो गया। सं 1962 का आमचुनाव सामने था। राजमाता शोक के कारण चुनाव लड़ने को अनिच्छुक थीं। लेकिन नेहरू के व्यक्तिगत आग्रह पर वे ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़ीं। अब तक भारतीय जनसंघ का उदय हो चुका था। जनसंघ ने माणिकचंद बाजपेयी को राजमाता के खिलाफ प्रत्याशी बनाया।  इसी चुनाव के मौके पर जवाहरलाल नेहरू ग्वालियर आये। एस ए एफ ग्राउंड पर आमसभा हुई।तब डॉ रघुनाथ राव पापरीकर महापौर थे। इस सभा की जिम्मेदारी उन पर ही थी। नेहरू जी को देखने,सुनने के लिए पूरी गालव नगरी उमड़ पड़ी। मंच पर नेहरू जी के साथ इंदौर की भूतपूर्व महारानी शर्मिष्ठा देवी भी थीं।

राजमाता विजयाराजे शोक के कारण जयविलास महल में ही रहीं और एक दो अवसर के अलावा प्रचार के लिए भी नहीं निकलीं। उन्होंने माणिकचंद बाजपेयी को भारी अंतर से हराया।बाद में बाजपेयी ने राजनीति से नाता तोड़ लिया और प्रखर और सम्मानित पत्रकार के रूप में स्थापित हुए। बताना मुनासिब होगा कि राजमाता के कांग्रेस में प्रवेश के साथ ही इस अंचल में हिन्दू महासभा के सफाया हो गया।कालांतर में द्वारिकप्रसाद मिश्र से विवाद होने पर इंदिरा गांधी के दौर में राजमाता जनसंघ में शामिल हो गईं। नेहरू की आमसभा और उनका करिश्माई व्यक्तित्व लंबे समय लोगों की चर्चायों में दर्ज रहा।

दुर्लभ चित्र- ये तस्वीर SAF ग्राउंड की आमसभा की है जिसमें नेहरू जी के साथ महारानी शर्मिष्ठा देवी और डॉ रघुनाथराव पापरीकर साथ हैं।

लेखक डा. राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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