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पी.के. खुराना

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने कई नारे उछाले थे, उनमें से एक नारा था — “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सीमम गवर्नेंस”। मोदी ने तब यह नारा देकर लोगों का दिल जीता था क्योंकि इस नारे के माध्यम से उन्होंने आश्वासन दिया था कि आम नागरिकों के जीवन में सरकार का दखल कम से कम होगा। लेकिन आज हम जब सच्चाई का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि यह भी एक जुमला ही था। अमित शाह ही नहीं खुद मोदी भी गुजरात के विधानसभा चुनाव के लिए गुजरात में प्रचार कर रहे हैं। अमित शाह के साथ बहुत से विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी राज्य में दिन-रात एक किये दे रहे हैं। लगता है मानो देश की सारी सरकारें गुजरात में सिमट आई हैं। गुजरात विधानसभा चुनावों के कारण संसद का सत्र नहीं बुलाया जा रहा है ताकि संसद में असहज सवालों से बचा जा सके, वे सवाल मतदाताओं की निगाह में न आ जाएं। इसी प्रकार चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को प्रभावित करने के सफल-असफल प्रयास न तो गवर्नेंस हैं और न ही “मिनिमम गवर्नमेंट” के उदाहरण हैं।

उद्यम के विस्तार के लिए तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में आयोजित सम्मेलन में मोदी की उपस्थिति आवश्यक थी क्योंकि यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में सार्थक भूमिका निभा सकता है। गुजरात के विधानसभा चुनावों के बीच भी मोदी ने हैदराबाद के सम्मेलन के लिए समय निकाला क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय नेताओं से मिलकर बहुत खुश होते हैं, अच्छी खबर बन जाती है और इस सम्मेलन की उपलब्धियों को वे गुजरात के चुनाव में भी भुना सकते हैं। लेकिन गुजरात के विधानसभा चुनावों की आपाधापी में हम सब एक ज्वलंत समस्या, यानी कश्मीर को भुलाए दे रहे हैं।

वोट पाने के लिए भाजपा के काम करने का तरीका बहुत बारीकी से बुना जाता है। गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी से व्यापारियों में इस हद तक नाराज़गी थी कि कांग्रेस का एक छोटा-सा ट्वीट “विकास पागल हो गया है” सोशल मीडिया पर वायरल होकर अपने आप में एक बड़ा मुद्दा बन गया। इसके बाद गुजरात में राहुल गांधी की लोकप्रियता और कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी। जनता का मूड भांप कर भाजपा ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया और जीएसटी की दरें घटाईं, जीएसटी फाइल करने की कठिनाइयों को दूर करने का प्रयत्न किया और व्यापारी वर्ग को यह संदेश दिया कि भाजपा उनके साथ है। नीतियों में आनन-फानन में परिवर्तन के अलावा अपनी जानी-पहचानी रणनीति के मुताबिक मतदाता सूची पर आधारित पन्ना-प्रमुख, शक्ति केंद्र आदि की संरचना करके संगठन को न केवल मजबूत किया बल्कि उस संगठन के माध्यम से घर-घर पहुंचना सुनिश्चित किया। मतदाताओं तक पहुंचने के भाजपा के विशद कार्यक्रम का लाभ भाजपा को मिलना निश्चित है। अमित शाह की यह कार्य-प्रणाली सचमुच प्रभावशाली है। विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत इसका प्रमाण है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता से बातचीत में एक रोचक तथ्य सामने आया। नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर उन्होंने बताया कि दिल्ली से जो कांग्रेसी नेता छत्तीसगढ़ आते हैं, उनका काफी प्रचार होता है, वे तामझाम के साथ आते हैं, स्वागत करवाते हैं, कुछ बड़े नेताओं से मिलते हैं, प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और दिल्ली लौट जाते हैं जबकि भाजपा के केंद्रीय नेता बिना किसी तामझाम के पहुंचते हैं, नेताओं से मिलने के बाद गांवों में जाते हैं, कार्यकर्ताओं से मिलते हैं, उनसे चर्चा करते हैं, उन्हें सुझाव देते हैं और एक स्फूर्तिदायक माहौल बनाकर वापस जाते हैं।

कश्मीर की समस्या पर टिप्पणी करते हुए भाजपा की चुनावी रणनीति का विश्लेषण करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि भाजपा इसी रणनीति पर चलकर कश्मीर की समस्या का हल कर सकती है। कश्मीर के लोगों में नाराज़गी है, केंद्र सरकार से उनकी कई अपेक्षाएं हैं जो पूरी नहीं हो रही हैं। बातचीत के कई दौर असफल हो चुके हैं, मोदी सरकार की ओर से कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा का तीन दिन तक विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों से मिलकर बातचीत का हालिया दौर भी उससे अलग नहीं है क्योंकि इसके लिए कोई सोची-समझी रणनीति बनाने के बजाए बहुत उथले ढंग से प्रयास किया गया है। अलगाववादी नेताओं की बात तो छोड़िये, मुख्यधारा के बहुत से नेता भी उनसे बेदिली से ही मिले। भारत सरकार ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व मुखिया दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त किया और उन्हें किसी से भी बात करने की स्वतंत्रता दी।
दिनेश्वर शर्मा की वापसी के बाद स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया केंद्र सरकार की आशाओं के अनुरूप नहीं थी। वस्तुत: ऐसी कार्यवाहियों से अविश्वास और बढ़ता है, नाउम्मीदी और बढ़ती है।

इसकी बजाए भाजपा के केंद्रीय नेताओं को कश्मीर जाकर वहां के स्थानीय नेताओं से बातचीत करनी चाहिए और उनके साथ मिलकर कश्मीर के लोगों से अनौपचारिक चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों के साथ अनौपचारिक चर्चा में बहुत से छोटे-छोटे मुद्दे उभर कर सामने आयेंगे, जिनका हल बहुत आसान है लेकिन समस्या बने रहने पर वे नाराज़गी के बड़े कारण बन जाते हैं। कश्मीर के लोगों के अनौपचारिक संपर्क की यह प्रक्रिया न तो आसान होगी और न ही अल्पकालिक। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, लेकिन यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके परिणाम सार्थक होने की संभावनाएं सबसे ज्य़ादा हैं। समस्या यह है कि भाजपा के एजेंडे में कश्मीर प्राथमिकता पर नहीं है और कश्मीर समस्या के हल के लिए भाजपा रचनात्मक ढंग से नहीं सोच रही है।

कश्मीर में हाल ही में एक घटना हुई है जिससे भाजपा कुछ सीख ले सकती है। उत्तरी कश्मीर का निवासी एक नवयुवक उमर खालिक मीर उर्फ समीर इसी वर्ष मई में लश्कर में शामिल होकर उग्रवादी बन गया था। इसी 3 नवंबर को सेना जब एक गांव में तलाशी अभियान चला रही थी तो उन्हें एक घर में इस युवक की मौजूदगी की भनक मिली। बहुत प्रयासों के बाद भी जब उमर खालिक समपर्ण के लिए तैयार नहीं हुआ तो सेना के अधिकारियों ने वहां से 5 किलोमीटर दूर स्थित उसके घर में उसकी मां से संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि यदि उनका बेटा समर्पण कर देगा तो वे उसके साथ नरमी का व्यवहार करेंगे। मां की अपील पर उमर खालिक ने समपर्ण कर दिया। इसके बाद उभरते हुए फुटबॉल खिलाड़ी मज़ीद अर्शद खान द्वारा मुख्यधारा में लौटने के बाद एक और मां ने अपने बेटे को उग्रवाद की राह छोड़ने के लिए अपील जारी की है। कश्मीर की महिला फुटबॉल खिलाड़ी और कोच अफशाना को भी एक बार ऐसे हालात में घिरना पड़ा जहां वे पुलिस पर पथराव में शामिल हो गईं। पत्थरबाजी करते हुए उनकी तस्वीर वायरल हो गई तब उन्हें समझ आया कि उनसे क्या गलती हुई है। वे मानती हैं कि हिंसा उनके मसले का हल नहीं है। यही नहीं, हाल ही में जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की 13 क्रिकेट टीमों ने एक साथ अपने हुनर का प्रदर्शन किया।

क्या हम खिलाड़ियों को इन भटके युवाओं का आदर्श बना सकते हैं, क्या हम कश्मीर की फिज़ा बदलने के लिए कुछ उदारवादी धार्मिक नेताओं, समाज सेवकों, शिक्षकों और पत्रकारों आदि की सहायता ले सकते हैं, क्या हम कश्मीर में किसी नये नाम से कोई ऐसा संगठन खड़ा कर सकते हैं जो धीरे-धीरे स्थानीय लोगों में पैठ बनाकर उनका विश्वास जीत सके? मोदी जी के लिए गुजरात जीतना जितना अहम मुद्दा है, कश्मीर में शांति स्थापित करना हम भारतीयों के लिए उससे भी ज्य़ादा अहम मुद्दा है। क्या मोदी जी इस ओर ध्यान देंगे?

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं और लगभग हर विषय पर कलम चलाते हैं। संपर्क : This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

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