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Mukesh Kumar : शुक्र है कि माकपा को अब जाति व्यवस्था से उपजी सामाजिक विषमता के कारण होने वाले अत्याचारों एवं भेदभाव को अपनी नीति-रीति का हिस्सा बनाने की सद्बुद्धि आ गई है। सवर्णों के नेतृत्व ने उसे ऐसा करने से रोक रखा था, लेकिन सफाचट हो रहे जनाधार ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपना रवैया बदले और भारतीय परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक विषमता को जोड़कर देखे।

लेकिन केवल नीतियों के स्तर पर इसे स्वीकारने से कुछ नहीं होगा। ज़रूरी है कि पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को संगठन में उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए अगर आरक्षण की व्यवस्था लागू करनी पड़े तो किया जाना चाहिए, वर्ना सवर्ण कभी उन्हें ऊपर नहीं आने देंगे। सवर्ण कम्युनिस्टों की मानसिक संरचना ऐसी है कि वे श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त रहते हैं और अपने मानदंडों पर ही सारे निर्णय लेने के लिए विवश करते हैं। इनके जाल से निकलकर ही पार्टी अपना जनाधार बढ़ा सकती है। लेकिन उसे ध्यान रखना होगा कि सामाजिक न्याय की उस नारेबाजी में भी न फँसे जिसमें लालू, मुलायम और मायावती वगैरा फँस गए हैं और उनकी राजनीति केवल खुद को किसी भी तरह सत्ता पर बनाए रखना है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से

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