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सियासत

आजकल बड़ी शान्ति है, खुद से लड़ना जो छोड़ दिया है…

Yashwant Singh : कोई नहीं। मन है। उड़ान भरता है। सपने देखता है। गिरता है। जख्मी होता है। उठता है। चलता है। हँसता है। रोता है। गुनगुनाता है। मन है। इसे हासिल है छूट। कुछ भी कर लेने की। तभी तो ये मन है। तन की सीमाओं के पार। अपार विस्तार। जान है ये मन। सोच कर देखिये। बिना मन कैसा होगा जन। शायद मुर्दा होना इसी अवस्था को कहते होंगे। काबू करने की तमाम कोशिशें नाकाम हुईं। सवारी गाँठने की साधनाएं फेल हुईं। अब दोस्ती कर ली है मन से। खुद को इसके हवाले कर निश्चिन्त हो गया हूँ। जब-जब जो-जो सुख दुःख देता है मन, कुबूल कर लेता हूँ बहुत मन से। आजकल बड़ी शान्ति है। खुद से लड़ना जो छोड़ दिया है।

<p>Yashwant Singh : कोई नहीं। मन है। उड़ान भरता है। सपने देखता है। गिरता है। जख्मी होता है। उठता है। चलता है। हँसता है। रोता है। गुनगुनाता है। मन है। इसे हासिल है छूट। कुछ भी कर लेने की। तभी तो ये मन है। तन की सीमाओं के पार। अपार विस्तार। जान है ये मन। सोच कर देखिये। बिना मन कैसा होगा जन। शायद मुर्दा होना इसी अवस्था को कहते होंगे। काबू करने की तमाम कोशिशें नाकाम हुईं। सवारी गाँठने की साधनाएं फेल हुईं। अब दोस्ती कर ली है मन से। खुद को इसके हवाले कर निश्चिन्त हो गया हूँ। जब-जब जो-जो सुख दुःख देता है मन, कुबूल कर लेता हूँ बहुत मन से। आजकल बड़ी शान्ति है। खुद से लड़ना जो छोड़ दिया है।</p>

Yashwant Singh : कोई नहीं। मन है। उड़ान भरता है। सपने देखता है। गिरता है। जख्मी होता है। उठता है। चलता है। हँसता है। रोता है। गुनगुनाता है। मन है। इसे हासिल है छूट। कुछ भी कर लेने की। तभी तो ये मन है। तन की सीमाओं के पार। अपार विस्तार। जान है ये मन। सोच कर देखिये। बिना मन कैसा होगा जन। शायद मुर्दा होना इसी अवस्था को कहते होंगे। काबू करने की तमाम कोशिशें नाकाम हुईं। सवारी गाँठने की साधनाएं फेल हुईं। अब दोस्ती कर ली है मन से। खुद को इसके हवाले कर निश्चिन्त हो गया हूँ। जब-जब जो-जो सुख दुःख देता है मन, कुबूल कर लेता हूँ बहुत मन से। आजकल बड़ी शान्ति है। खुद से लड़ना जो छोड़ दिया है।

 

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त फेसबुक स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Harsh Kumar : इसको हार मानना भी कहते है और थक जाना भी।
 
Vikas Mishra : बहुत खूब स्वामी। एक बार फिर पढ़िए जो लिखा है। यही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आदर्श भाषा है। छोटे-छोटे वाक्य। सीधे समझ में आने वाले सरल शब्द। ऐसी भाषा मिलती नहीं जल्दी।
 
Narendra M Chaturvedi : ये मन बढ़ा चंचल है दिन रात तड़पता है…..पर बड़े भाई मन से दोस्ती बड़ी टेड़ी खीर है। कोई सरल मार्ग हो तो हमे भी बताओ…..?
 
Pankaj Singh : खुद से लड़ना । यानी आत्मसंघर्ष । यानी अन्तर्द्वन्द्व । यानी आत्मनिषेध । आप जैसे सक्रिय और युवा बुद्धिजीवी के लिए तो इसे जीवन का पर्याय होना चाहिए । स्नेह ।
 
Yashwant Singh : कभी कभी युद्ध विराम भी आनंद देता है Pankaj सर।
 
Riyaz Hashmi : लगता है आप आत्मनियंत्रण में हैं। यह अवस्था विरलय ही प्राप्त होती है। शनि, राहु और केतु पराजित हो चुके हैं। थोड़ा यम यम, चप चप में नियंत्रित ध्यान दें तो निश्चय ही आनंद की प्राप्ति होगी।
 
Vinay Bihari Singh : मन एव मनुष्याणां, कारणम बंध मोक्षयो (मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है)- उपनिषद।
 
Robin Rastogi : आप बहुत गहरा लिखते है।।।। बहुत उम्दा
 
Km Madhavi : Bahut kathin kaam hai….khud se na ladna
 
बाँके बिहारी : बेहतरीन! मन पर मनन हो, ना कि मन का दमन हो।

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