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Prabhat Ranjan : आजकल मीडिया में प्रिया सिंह पॉल का नाम चर्चा में है। 90 के दशक में जब भारत में निजी टीवी चैनलों का विस्तार हो रहा था तो उनका नाम जाना पहचाना था। जहां तक मुझे याद आता है वह ज़ी टीवी चैनल की प्रोग्रामिंग हेड भी थीं। न जाने कितने नामों को उन्होंने टीवी के पर्दे पर चमकाया। बाद में उस दौर में टीवी के सभी प्रमुख नामों के साथ उनका नाम भी गुम हो गया।

अब अचानक टीवी धारावाहिकों की कहानी की तरह उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया है कि वह संजय गांधी की पुत्री हैं। मधुर भंडारकर की फ़िल्म 'इंदु सरकार'' के ऊपर आपत्ति की है कि फ़िल्म में उनके 'पिता' संजय गांधी का किरदार ठीक तरह से पेश नहीं किया गया है। जबकि नेहरू-गांधी परिवार के असली वारिसों ने अभी तक इस फ़िल्म को लेकर कुछ नहीं कहा है। मीडिया में जिस तरह से उनका जीवन उभरकर आ रहा है वह अपने आप में किसी रहस्य रोमांच से भरे उपन्यास की कथा की तरह लग रहा है।

बहरहाल, मुझे अपने सीतामढ़ी के पास बने उस विशाल मठ के अंतिम महंत की मौत का किस्सा याद आ गया। महंत जी की मौत के बाद गांव की अनेक औरतें अपने अपने हाथ की चूड़ियां फोड़कर माथे का सिंदूर मिटाने लगीं। सबका कहना था कि महंत जी की मौत के कारण वे विधवा हो गईं। गांव के दर्जनों युवक अपने अपने सिर मुंडाकर उनको मुखाग्नि देंने के लिए आगे आ गए। सबका दावा था कि महंत जी उनके पिता थे।  जब विरासत बड़ी होती है तो दावेदार उभर कर आते ही रहते हैं।

पत्रकार और साहित्यकार प्रभात रंजन की एफबी वॉल से.

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