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Dilip Mandal : बीबीसी हिंदी का मोस्ट पॉपुलर ही क्या हिंदी वेब जगत के एक बड़े हिस्से का सच है? भास्कर, लल्लनटॉप, टाइम्स ग्रुप, आज तक वग़ैरह के कुल ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा सेक्स खोजता हुआ वहाँ पहुँचता है। सेक्स का कंटेंट बिकाऊ है। सब जानते हैं। भारत की तमाम बड़ी साइट यह खेल खेलती हैं। ज्योतिष, अंधविश्वास, पाखंड, क्रिकेट सबका मार्केट है। वेब पर अद्भुत रस सबसे लोकप्रिय रस है। लेकिन बीबीसी में भारतीय पब्लिक यह क्या खोज रही है? जो चीज़ होम पेज पर नहीं है, वह टॉप URL कैसे है? बीबीसी हिंदी पर कई बार टॉप 10 में 5 ख़बरें सेक्स की होती हैं।

क्या बीबीसी पर भी सेक्स बिकाऊ है? क्या यह बीबीसी की ब्रैंड इमेज के विपरीत बात नहीं है? मैं वैल्यू जजमेंट नहीं कर रहा। सही और ग़लत के पचड़े में यहाँ नहीं हूँ। बात सिर्फ ब्रैंड और कंटेंट के अंतर्विरोध की है। ब्रैंड वह नहीं है जो आप क्लेम करते हैं यानी होने का दावा करते हैं। ब्रैंड वह है जो यूज़र आपको समझता है। जिसकी तलाश में वह आपके पास आता है। ज़ी या इंडिया टीवी या जागरण का निष्पक्ष होने का क्लेम उसका ब्रैंड नहीं है। उनका ब्रैंड संघी होना है। जो इस अलॉगरिदम या गणित को समझते हैं, उनसे इस बारे में जानना चाहूँगा। यह जानते हुए भी कि बीबीसी का कंटेंट कई और वेबसाइट से बेहतर है। सेक्स बेचकर अगर बीबीसी ने नंबर वन साइट का दर्जा पा भी लिया तो क्या वह उसी बीबीसी की कामयाबी है, जिसे हम एक न्यूज साइट के तौर पर जानते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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