यशवंत पर हमले की कहानी, उन्हीं की जुबानी ( देखें सुनें संबंधित आडियो, वीडियो और तस्वीरें )

बिना वाइपर की बस… यह तस्वीर तबकी है जब बारिश थोड़ी कम हो गई थी.

दिल्ली को अलविदा कहने के बाद आजकल भ्रमण पर ज्यादा रहता हूं. इसी कड़ी में बनारस गया. वहां से रोडवेज बस के जरिए गाजीपुर जा रहा था. मेरे चाचाजी को हार्ट अटैक हुआ था, जिसके बाद उनकी ओपन हार्ट सर्जरी होनी है. उन्हीं को देखने के लिए गाजीपुर जा रहा था. शिवगंगा ट्रेन से बनारस उतरा और रोडवेज की बस पकड़ कर गाजीपुर जाने लगा. मौसम भीगा भीगा था. बारिश लगातार हो रही थी. बस चलने लगी. बिना वाइपर की बस धीमी गति से रेंगते हुए बढ़ रही थी. ड्राइवर कुछ ज्यादा ही सजग था क्योंकि लगातार बारिश से बस का शीशा पानीमय हुआ जा रहा था और उसे शीशे के पार सड़क पर देखने के लिए कुछ ज्यादा ही मशक्कत करनी पड़ रही थी.

मेरी सीट ड्राइवर के ठीक पीछे यानि पहली वाली सीट थी. मैं आसानी से बारिश और ड्राइवर का संकट देख समझ पा रहा था. बस जब घंटे डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद बनारस शहर के बाहर निकल गई और गाजीपुर की तरफ चलने लगी तो भी बस की स्पीड तीस चालीस से ज्यादा नहीं हो पा रही थी. एक जगह चाय पानी के लिए जब बस रुकी तो ड्राइवर साहब अपने सामने वाले बस के शीशे पर कुछ सफेद सफेद पोतने लगे. मैंने पूछा कि ये क्या रगड़ रहे हैं. ड्राइवर ने बताया कि ये चूना है, ये कैटलिस्ट होता है, पानी को रुकने नहीं देता, यानि पानी बूंद के रूप में शीशे पर इकट्ठा नहीं हो सकेगा और चूने के प्रभाव में आकर सरपट नीचे भागेगा जिससे थोड़ी बहुत विजिबिलिटी बनी रहेगी. ड्राइवर के इस देसी नुस्खे को देखकर हैरत में पड़ गया है. क्या गजब जुगाड़ है भारत में. हर चीज जो नहीं है, उसका स्थानापन्न तलाश लिया जाता है. शायद दुख और संकट का भी स्थानापन्न हम तलाश लेते हैं, मन ही मन, कि ये सब पूर्व जन्मों का फल है इसलिए भोग लो.

ड्राइवर ने जब दुबारा बस स्टार्ट की तो चूने का असर साफ दिख रहा था. ड्राइवर के सामने वाले जिस शीशे पर चूना लगा था वहां पानी रुक नहीं रहा था, सरपट भाग रहा था नीचे, इसलिए साफ दिख रहा था. ड्राइवर के बाएं वाले शीशे जहां चूना नहीं लगा था, वहां बूंद बूंद पानी चिपका हुआ था. ड्राइवर से बातचीत शुरू हुई. आखिर बिना वाइपर ये बस चलाने का मकसद, मतलब क्या है. इतने सारे यात्रियों की जान खतरे में डाले हुए हैं. जहां हमें दो घंटे में पहुंच जाना चाहिए, वहां वाइपर न होने के कारण चार घंटे में पहुंचेंगे, स्पीड धीमी होने के कारण. ड्राइवर बस चलाते हुए लगभग फट पड़ा. अपने अधिकारियों के उपर. अफसरों की लापरवाही और हीलाहवाली से दुखी ड्राइवर बोला कि मैं साल भर से कंप्लेन कर रहा हूं, कोई नहीं सुन रहा. आज भी जब ये बस ले कर चला हूं तो रजिस्टर पर लिखवा कर आया हूं कि इसमें वाइपर नहीं लगा है.

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Comments on “यशवंत पर हमले की कहानी, उन्हीं की जुबानी ( देखें सुनें संबंधित आडियो, वीडियो और तस्वीरें )

  • आनंद says:

    आप भाग्यशाली है, आपके मित्र आपकी ताकत है। वर्ना हमने तो काल्पनिक यशवंत को पर्दे पर अकेले ही जूझते-झेलते देखा था।

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  • बालकिशन शर्मा says:

    आपके हौसले को सलाम। वो सुबह कभी तो आएगी।

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  • Praveen Tree says:

    अन्तत: विजय तो सत्य की ही होगी। सत्य की रक्षा स्वयं भगवान करेंगे। आप अपने पथ पर दृढ़ता से बढ़ते रहिए।

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  • इमरोज़ खान says:

    क्या बात है आपका लेख पढ़ के नयी ऊर्जा आई

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  • maheshwari mishra says:

    यशवंत जी के साथ जो हुआ वह दिल दहला देने वाला है। मुझे लगता है कि हम आज भी गुलाम हैं। अंग्रेज गए लेकिन पुलिस और कर्मचारी छोड़ गए। जिनकी तानाशाही अंग्रेजों जैसी ही हैं और शिकायत करने पर भी कुछ नहीं होता। हमलावर को जल्छ से जल्द गिरफ्तार किया जाए।

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  • Om Prakash Nagmani says:

    सत्य की रक्षा स्वयं भगवान करेंगे। आप अपने पथ पर दृढ़ता से बढ़ते रहिए।

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  • रामचंदर लठवाल says:

    धिक्कार है ऐसे सड़े हुए सिस्टम पर हम सब की दुआएं आपके हमेशा साथ हैं इतिहास गवाह है जो भी बदलाव के रहनुमा हुए हैं उन सभी को इन तरह के हालात से जूझना ही पड़ा है …..आपकी सकारात्मकता को सलाम

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  • रामचंदर लठवाल says:

    वी आल आर गाइडेड बाइ सम वन. वी आल आर प्री प्रोग्राम्ड रोबोट्स, गाइडेड बाय समवन इल्स. और हम लोग करते वही हैं जो प्रोग्रामिंग तय की हुई होती है. जैसे किसी रोबोट को यह खुद नहीं पता होता है कि उसकी प्रोग्रामिंग कहां से लेकर कहां तक है, वह बस प्रोग्राम के गाइडेंस को फालो करता रहता है, और इसी प्रक्रिया में नष्ट हो जाता है एक रोज, उसी तरह हम लोगों को भी यह पता ही नहीं लगता कि हम कर क्या रहे हैं और किसलिए कर रहे हैं, लेकिन चूंकि अपन सब के भीतर ढेर सारे इंसटिंक्ट्स की प्रोग्रामिंग हो चुकी है इसलिए सेक्स से लेकर भूख तक, सुख से लेकर सुरक्षा तक के लिए भसड़-धसड़-रगड़ मचाए रहते हैं. सो, कभी कभी लगता है कि कीजिए हाय हाय क्यों, रोइये ज़ार ज़ार क्या… ये जो आपने लिखा है यशवंत जी इसके बाद शब्दों की दरकार ही नहीं हैं निसंधेह यह उस प्रयोजन का आगाज़ है जो अनदेखा है अनजाना है ….भगवान आपको हर तरह की शक्ति और क्षमता से नवाजे …….

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  • jagdish samandar says:

    बहुत अच्छा हुआ आपके साथ यह घटना हुई । अब कम से कम उस मूर्ख एआरएम को करारा जवाब तो मिलेगा । सरकारी नौकरी मिलने के बाद ये वर्णशंकर आम आदमी को तो कीड़ा मकोड़ा समझते हैं । कोई आम व्यक्ति अगर इनसे जरा सा सवाल कर ले या जोर से पूछ ले तो सालों की नाक कट जाती है । इस लिये उग्र होकर अपना रोब झाड़ते हैं कि जेसे सबके आका यही हैं । किसी आम व्यक्ति के साथ अगर यह घटना होती तो उस बेचारे की सारी जनहित की मंशा कुंठा में बदल जाती । ना वो बदला ले पाता और ना ही उसकी घुटन शांत होती । अब छोड़ना नहीं गधे को जब तक उसकी अकड़ निकलकर आम आदमी जैसी बोली ना बोलने लगे । साला एक तो सरकार से परेशान ये उसके भी बाप हो रहे हैं ।
    बहुत छोटी घटनाऐं भी कई बार जीवन की महत्वपूर्ण घटना बन जाती है । आपके साथ घटित हुये हादसे को देखकर यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है । समाज में मूर्खों की तादाद इतनी बढ़ रही है कि कोई बात सुनने को तैयार नहीं होता अपनी गलती मानना तो दूर की बात है । टेंशन नौट, भगवान आपके साथ है ।

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  • संजय कुमार सिंह says:

    जनहित के लिए मार खाना पुरस्कार जैसा है बशर्ते मारपीट करने वाले को औकात बता दी जाए। एक अधिकारी औकात में आता है तो उसके चमचों के साथ बहुत सारे अधिकारी और उनके चमचे भी सुधर जाएंगे। इसलिए मामले को छोड़ना नहीं है। ठीक से फॉलो करके, जो-जो धाराएं लग और साबित हो सकें – के तहत कार्रवाई कराई जानी चाहिए। भ्रष्ट सिस्टम में जिसे भी अधिकार मिलता है वह सिस्टम में शामिल हो जाता है। जनप्रतिनिधि अगर अपना काम कर रहे होते तो ऐसा क्यों होता। आम जनता यह सब कर नहीं पाती है, करना नहीं चाहती है। इसलिए अगर हम कुछ कर सकते हैं तो जरूर करना चाहिए।

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  • ashok anurag says:

    उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
    परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है
    मैं क़तरा हो के तूफानों से जंग लड़ता हूँ
    मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है
    कोई बताये ये उसके ग़ुरूर-ए-बेजा को
    वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है
    दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
    ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है
    – वसीम बरेलवी

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  • Sanjeev Singh thakur says:

    Choti si galat baat ke khilaaf ladne k liye bhi kitni mehnat aur dridhta chahiye yeh uska bahut acha udaharan h. Choti ladai ladte ladte BADI Ladai ki tayari Karen, janta aapka saath degi. JAI HIND, VandevMatram.

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  • प्रवीण चन्द्र राशि says:

    लिंक पूरा पढ़ने के बाद मन कौंध गया। लेकिन आपके द्वारा जनहितार्थ किए इस प्रयास ने उत्तर प्रदेश के घमंडी नाजायज़ सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। एक व्यक्ति सरकारी पद पाकर सिर्फ हमारा शोषण करने की कोशिश में क्यों लग जाता है, क्योंकि इनकी औकात को सांतवे आसमान पर हर ही चढ़ा देते हैं। आप जैसा कार्य अगर बाकि सभी करने लगें तो ये सरकारी बाबू टाईप हरामखोर लोग हरामखोरी की लत से मुक्त हो जायेंगे। इस सतही पत्रकारिता को मेरा सलाम व समर्थन।

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  • प्रवीण चन्द्र राशि says:

    लिंक पूरा पढ़ने के बाद मन कौंध गया। लेकिन आपके द्वारा जनहितार्थ किए इस प्रयास ने उत्तर प्रदेश के घमंडी नाजायज़ सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। एक व्यक्ति सरकारी पद पाकर सिर्फ हमारा शोषण करने की कोशिश में क्यों लग जाता है, क्योंकि इनकी औकात को सांतवे आसमान पर हर ही चढ़ा देते हैं। आप जैसा कार्य अगर बाकि सभी करने लगें तो ये सरकारी बाबू टाईप हरामखोर लोग हरामखोरी की लत से मुक्त हो जायेंगे। सतही पत्रकारिता को सलाम।

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  • Purushottam Asnora says:

    Dukh ki bat hai ki desh, pradesh mai kai kursiyou par gunde hi gunde baithe hai. Yashwant ji k sath jo huwa sharmnak hai our kare shabdou mai nida karte hain, up sarkar se mang hai ki ARm k khilaf satht karyvahi ho.

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