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अंग्रेजी मीडिया को अरविन्द केजरीवाल से क्या समस्या है?

भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्‍त जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर अनशन पर बैठे अन्ना हजारे को जिस मीडिया ने देश का आईकान बना दिया था उसी मीडिया का एक हिस्सा (अंग्रेजी मीडिया) अब टीम अन्ना के खिलाफ लामबंद है. टीम अन्ना के अर्जुन अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ अंग्रेजी मीडिया में एक के बाद एक स्टोरी प्रकाशित की जा रही है. इसकी शुरुआत ट्रिब्यून ने एक सितम्बर को की. अखबार ने वित्त मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से लिखा कि केजरीवाल पर अब भी सरकार का बकाया है और इस लिहाज से वह अब भी सरकारी कर्मचारी हैं. इसमें अरविन्द केजरीवाल का पक्ष नहीं रखा गया.

भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्‍त जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर अनशन पर बैठे अन्ना हजारे को जिस मीडिया ने देश का आईकान बना दिया था उसी मीडिया का एक हिस्सा (अंग्रेजी मीडिया) अब टीम अन्ना के खिलाफ लामबंद है. टीम अन्ना के अर्जुन अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ अंग्रेजी मीडिया में एक के बाद एक स्टोरी प्रकाशित की जा रही है. इसकी शुरुआत ट्रिब्यून ने एक सितम्बर को की. अखबार ने वित्त मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से लिखा कि केजरीवाल पर अब भी सरकार का बकाया है और इस लिहाज से वह अब भी सरकारी कर्मचारी हैं. इसमें अरविन्द केजरीवाल का पक्ष नहीं रखा गया.

अरविन्द केजरीवाल ने रविवार को स्टार न्यूज में एक साक्षात्कार के दोरान इस पर स्पष्ट किया कि अख़बार का पत्रकार उन्हें  मोबाईल पर मैसेज भेज कर उनकी जीवनी प्रकाशित करने के लिए बात करना चाहता था और उन्हें अपनी जीवनी प्रकाशित करवाने में कोई रूचि नहीं है, लेकिन अगले दिन उन्हें ट्रिब्यून में इस खबर का पता चला. आपको याद करा दें कि ट्रिब्यून उन्हीं पांच अखबारों में से एक है, जिनके संपादकों को प्रधानमंत्री ने करीब दो महीने पहले बात अकरने के लिए बुलाया था. अगले ही दिन ट्रिब्यून ने पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री का खूब महिमा मंडन किया था. पांच सितम्बर को इंडियन एक्सप्रेस में स्टोरी छपती है कि अरविन्द केजरीवाल ने 2006 में सीबीडीटी को लिखे एक पत्र पर नियमों उल्‍लंघन की बात मानी थी. अखबार दावा करता है कि अरविन्द केजरीवाल के उस पत्र की प्रति भी उसके पास है. इस स्टोरी में भी अरविन्द केजरीवाल का पक्ष यह लिख कर नहीं छपा कि उन्हें मैसेज किया गया था लेकिन जवाब नहीं आया.

अब सवाल यह है कि यह सारे दस्तावेज पत्रकारों को कौन लीक कर रहा है. जाहिर है यह सरकार का ही काम है और कुछ सम्पादक और पत्रकार सरकार के हाथों में खेल रहे हैं. अरविन्द केजरीवाल ने दो साल की छुट्टी लेकर सूचना के अधिकार बिल पर काम किया. यह भी सरकारी काम ही था. तकनीकी तौर पर भले यह आयकर विभाग का काम न हो लेकिन सरकार अब उनसे हिसाब मांग रही है. कितने ताज्जुब की बात है कि सरकार के पास अफजल गुरु पर हुए खर्चे का कोई हिसाब नहीं है और सूचना का अधिकार कानून लिखने वाले मैग्सेसे अवार्ड विजेता समाजसेवी अरविन्द केजरीवाल का सारा हिसाब सरकार ने सिर्फ इसलिए निकाल लिया, क्योंकि केजरीवाल सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार एक खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. सरकार टीम अन्ना से वैसे पार नहीं पा पायी तो अब हथकंडों पर उतर आई है, लेकिन जनता सब देख रही है और इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ेगा. भगवान अंग्रेजी मीडिया को भी सदबुद्धि दें क्यों कि यदि अंग्रेजी मीडिया का रवैया ऐसा ही रहा तो कल को जब इतिहास लिखा जायेगा तो अंग्रेजी मीडिया की भूमिका एक विलेन के रूप में ही याद की जाएगी.

पत्रकार नेरश अरोरा की रिपोर्ट.

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