सोशल मीडिया पर सरकार की वक्र दृष्टि

दामिनी रेप कांड के विरोध में रायसीना हिल्स पर भीड़ के सैलाब ने सरकार और खुफिया तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सरकारी मशनीरी हैरत में है कि बिना किसी नेतृत्व के इतनी बड़ी तादाद में जनता सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये एकजुट हुए और राष्ट्रपति भवन के पास तक आक्रोश जाहिर करने पहुंच गये। सरकार और खुफिया तंत्र की ओर से सोशल मीडिया को खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। इससे निपटने के लिए भी व्यापक विचार विमर्श इंटेलीजेंस और सरकार के बीच शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि देश के राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे के लिए भविष्य में भी सोशल मीडिया अहम् भूमिका निभा सकता है। सुरक्षा के लिहाज से सोशल साइटें एक नयी चुनौती बनकर सरकार के सामने खड़ी हैं। इस बात की आशंका सोशल मीडिया साइटों पर निगरानी रखने वाली सरकारी एजेंसी ने जाहिर की है। रिपोर्ट में कहा गया है उग्र प्रदर्शन के पीछे इन साइटों का इस्तेमाल किया गया। भावनाओं को छू जाने वाले अनगिनत संदेशों के जरिये दिल्ली के यूथ को टारगेट किया गया। एजेंसी की रिपोर्ट पर कारगर कदम उठाने का निर्णय लिया गया है। सरकार और तमाम खुफिया एजेंसियां उन कारणों पर गहन चिंतन मंथन कर रही है जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों की पुनरावृत्ति न होने पाए।

शर्म करो औवेसी, तुम्हारे कई सारे कथित पाक, अल्लाह की शरीयत पर चलने वाले मुल्क पूरे विश्व में भीख का कटोरा लिये खड़े हैं

मेरे कानों में मुसलमानों के एक घटिया नेता और झूठे खैख्वाह अकबरूद्दीन औवेसी की कड़वी भाषा रह रह कर गूंज रही है, यू ट्यूब पर जब से मैंने उस आस्तीन के सांप का जहर उगलता हुआ एक घण्टे का भाषण सुना तब से मेरा रोम-रोम विद्रोह किये हुये है, मेरा ही नहीं बल्कि तमाम वतनपरस्त और इंसानियतपरस्त लोगों का खून खौल रहा है, खौलना भी चाहिये क्योंकि कोई भी हरामजादा गीदड़ मुल्क के किसी भी कोने में अपने द्वारा जुटाई गई किराये की भीड़ के सामने शेर बनकर दहाड़ने की कोशिश करें तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, अकबरूद्दीन औवेसी कहता है – मैं सिर्फ मुस्लिम परस्त हूं, उसे अजमल कसाब को फांसी दिये जाने का सख्त अफसोस है, वह टाइगर मेनन जैसे आतंकी का हमदर्द है, वह मुम्बई के बम धमाकों को जायज ठहराता है, देश के मुम्बई संविधान, सेकुलरिज्म और बहुलतावादी संस्कृति की खिल्ली उड़ता है। कहता है, हम तो दफन होकर मिट्टी में मिल जाते है मगर हिन्दू जलकर फिजा में आवारा की तरह बिखर जाते है, वह देश के दलितों व आदिवासियों को दिये गये रिजर्वेशन पर सवाल खड़े करता है और इन वर्गों की काबिलियत पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है।

लड़कियां अपनी जिंदगी के बीस साल बहुत सोच-समझकर इन्‍वेस्‍ट करें

Manisha Pandey : मेरे एक परिचित, पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी और नौकरीपेशा पुरुष मित्र शादी के बीस साल बाद अपनी पत्‍नी को तलाक दे रहे हैं। पत्‍नी की हालत ऐसी है कि मानो उसकी पूरी दुनिया ही उजड़ गई हो। उसके लिए एक ईश्‍वर आकाश में है और दूसरा धरती पर – उसका पति। इन बीस सालों में दोनों ने अपनी जिंदगी, बुद्धि, ऊर्जा, समय, मेधा, ताकत कहां इन्‍वेस्‍ट की?

कुम्‍भ में झंझट : जगदगुरु शंकराचार्य ने विरोध स्‍वरुप अलविदा कहा

धार्मिक और आध्‍यात्मिक प्रतीकों तथा आस्‍थाओं का सनातन पर्व महा-कुम्‍भ विवादों में आ गया है। प्राचीनतम परम्‍पराओं में पवित्रताओं के सवालों और बदलावों के प्रवाहों में जबर्दस्‍त रोड़े पड़ गये हैं। व्‍यवस्‍था और हठों के बीच जिद दीवार इतनी ऊंची हो गयी है कि हजारों साल पुराने दुनिया के इस महानतम अनुष्‍ठान के आयोजन पर राहु-दृष्टि कलंकित कर चुकी है। शायद इस बार यह पहला मौका है जब धर्म-संस्‍थापनार्थ सदियों पहले आचार्य-शंकर द्वारा बनायी गयीं 4 पीठों में से एक पीठ के जगद्गुरू शंकराचार्य ने बाकायदा इस आयोजन को विरोधस्‍वरूप अलविदा कह दिया। तय हो चुका है कि द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्‍वामी सरूपानंद सरस्‍वती अब इस बार के आयोजन में शरीक नहीं होंगे। हालांकि प्रशासनिक और सरकारी तौर पर यही कहा जा रहा था कि स्‍वारूपानंद जी को कुम्‍भ में वापस बुलवाने की भरसक कोशिशें चल रही हैं। लेकिन आज मुख्‍यमंत्री ने ऐलान कर दिया कि नई परम्‍परा की गुंजाइश ही नहीं।

नेतृत्‍व को नकारती जनता की भीड़

दिल्ली में चलती बस में हुये कुख्यात बस रेप काण्ड के विरोध में दिल्ली समेत देश भर में विरोध दर्ज कराने और आरोपियों को कड़ी सजा की मांग के लिए सडक़ों पर लाखों की संख्या में एकत्र हुई भीड़ नेतृत्व विहीन थी. भारत जैसे देश में जहां आम आदमी को केवल वोट समझा जाता हो, जहां आम आदमी की स्थिति पशुओं से भी बदतर हो, आम आदमी साढ़े छह दशकों के उपरांत भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो, जहां आम आदमी की नियति हाथ जोडक़र जी हजूरी करना माना जाता हो, जहां जात-पात, वोट बैंक की राजनीति सिर चढक़र बोलती हो, जहां विधायिका स्वयं को संसद और संविधान से ऊपर मानती हो, जहां नेता देश को अपने पिताजी की जागीर समझते हों, जनता से दुव्यर्वहार और विश्वासघात को अपना धर्म समझते हों, जहां प्रजातंत्र केवल नाममात्र का ही शेष हो. प्रजा पर तंत्र पूरी तरह हावी हो चुका हो, जहां जनता दो जून की रोटी के फेर में चौबीस घंटे व्यस्त रहती हो वहां शक्तिशाली सत्ता और मशीनरी के समक्ष आम आदमी का एकजुट होकर सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोलना इस शताब्दी की बड़ी घटनाओं और में से एक है.

पुलिस फिर संजय नामदेव को फंसाना चाहती है

कॉमरेड संजय नामदेव को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर केवल चार दिनों तक ही जेल के अन्दर रख सकी जिला पुलिस ने उनकी रिहाई के दो दिनों बाद ही फिर से गिरफ्तारी का दबाव बनाना शुरू कर दिया है। ऐसा सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि श्री नामदेव की राजनैतिक और समजिक गतिविधियां प्रभावित की जा सके। कॉमरेड नामदेव के सहयोगियों ने यह सूचना दी है कि उनके घर, दफ्तर और बैठने की अन्य जगहों पर बरगवां थाने की पुलिस लगातार दबिश दे रही है। ताजा प्रकरण 307 के एक मुकदमे का है जो नवम्बर 2010 मे कायम हुआ था। मामला हिन्डालको परिसर में एक दुर्घटना में एक विस्थापित श्रमिक की मौत का है, जिसके खिलाफ विरोध प्रर्दशन आयेजित हुए थे। प्रर्दशन के दौरान हुई झड़प के फलस्वरूप कॉमरेड संजय पर 307 का यह मुकदमा कायम किया गया।  

कौन है जो हनी सिंह को बढ़ावा देता है?

मशहूर पंजाबी रैप सिंगर हनी सिंह पर उनके गानों में अपशब्दों के प्रयोग और अश्लीलता के चलते लखनऊ के आईपीएस अधिकारी अमिताभ सिंह ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है, पर सवाल उठता है कि जब हनी पिछले तीन वर्षों से समाज में बेशर्मी से अश्लीलता परोसने का काम बेधड़क करता जा रहा था तब किसी देशभक्त का ध्यान उस ओर क्यों नहीं गया? मैं हनी सिंह का प्रशंसक नहीं हूं और न ही अमिताभ ठाकुर के प्रति कोई दुराभाव है किन्तु ऐसे समय जबकि देश में बलात्कार और उसकी सजा को लेकर बहस छिड़ी हो, क्या हनी सिंह को इतनी तवज्जो देना सही है? जबसे हनी सिंह पर पुलिस केस दर्ज हुआ है इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक वर्ग हनी ओर उसके विवादित विडियो दिखा-दिखा कर आखिर क्या साबित करना चाहता है? आखिर क्यों हनी सिंह को बतौर मशहूर हस्ती पेश किया जा रहा है?

नाम पर कानून बनाने की मांग और उसकी सार्थकता

केंद्रीय मंत्री शशी थरूर का विवादों से विशेष रिश्ता है. वह जब भी कुछ बोलते हैं या सोशल साईट पर लिखते हैं एक विवाद खड़ा हो जाता है. परन्तु इस बार उनके लेखन से उनकी अपनी ही पार्टी और दल को अधिक परेशानी हुई है. पाश्चात्य पृष्ठभूमि और विचारों से प्रभावित शशि थरूर जो वर्तमान में केंद्रीय सरकार में मानव संसाधन मंत्री भी हैं, ने दिल्ली में बलात्कार की शिकार हुई दामिनी (काल्पनिक नाम) का वास्तविक नाम उसकी मृत्युपरांत भी सार्वजानिक ना करने पर सवाल उठाये हैं और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की रोकथाम पर बनाये जाने वाले संशोधित कड़े कानून का नाम भी दामिनी के वास्तविक नाम पर रखने की वकालत की है.

आखिर इन ‘दामिनियों’ का आंसू कौन पोछेगा?

: अखिलेशजी! इनको नौकरी, मुआवजा नहीं न्याय की है दरकार : दिल्ली में गैंगरेप की शिकार दामिनी को न्याय दिलाने के लिए देश एकजुट हुआ। दरिंदों को सजा दिलाने की मांग ने जोर पकड़ा। यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भुक्तभोगी लड़की और उसके साथी को नौकरी और आर्थिक मदद करने का ऐलान किया। देश के कोने-कोने से उठे जोरदार विरोध और मुख्यमंत्री के मदद का ऐलान, दोनों को अच्छी शुरुआत माना जा सकता है पर क्या आपको पता है यूपी में दर्जनों अभागी ‘दामिनियों’ का आंसू पोंछने वाला कोई नहीं है। उनके परिजनों को न्याय की दरकार है। इन गुमनाम ‘दामिनियों’ के लिए न तो कोई जुलूस निकला और ना ही कहीं धरना-प्रदर्शन। इनके लिए न्याय दूर की कौड़ी है। मिलिए इलाहाबाद और उसके बगल के जिले प्रतापगढ़, कौशांबी की इन अभागन दामिनियों से। ये रहीं दिल दहला देने वाली वारदातें।

बदहाल उत्तर प्रदेश, मस्त अखिलेश

“उत्तर प्रदेश की तकदीर में कांटे ही कांटे है, कभी मायावती तो कभी अखिलेश आते हैं” आखिर कब तक उत्तर प्रदेश को झूठे वादों से ये नेता लूटते रहेंगे।मायावती ने जमकर प्रदेश को लूटा, अब समाजवादी पार्टी की सरकार इस वादे के साथ आयी कि पूर्व में की गयी गलतियों को नहीं दोहराया जायेगा और यह वादा स्वयं युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया लेकिन कुछ भी नहीं बदला गुंडों का आतंक, निरंकुश पुलिस, हत्या, लूट, डकैती तो जैसे आम बात हो गयी l कड़कड़ाती ठण्ड में सरकार 13 दिन गर्म हीटरों में दुबकी रही और बाहर ठण्ड से गरीब दम तोड़ता रहा करोड़ों रुपया महोत्सव की गर्मी में उड़ गया, राजधानी लखनऊ से उठकर सैफई आ गयीl कहते है कि “पूत के पांव पालने में” दिखाई देने लगते है वही हाल उत्तर प्रदेश सरकार का है, नौ माह का समय बीत चुका और कुछ भी नहीं बदला, जिस वादे के साथ अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी को सत्ता में लाये थेl

एमएलए ओवैसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से मना, दंगा होने पर ही दर्ज करेंगे एफआईआर

हैदराबाद एमएलए अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ भड़काऊ भाषण मामले लखनऊ के दो विद्यार्थियों तनया ठाकुर और उसके भाई आदित्य द्वारा आज गोमतीनगर थाना में एक एफआईआर दिया गया. थानाध्यक्ष एसके गौतम ने इन बच्चों द्वारा दिये गए प्रार्थनापत्र पर एफआईआर लिखने से साफ़ मना कर दिया. ओवैसी ने अपने भाषण में खुलेआम हिंदू-मुसलामानों में अतीव तनाव बढ़ाने वाले अत्यंत आपत्तिजनक और भड़काऊ बातें कही थीं. उन्होंने कहा था कि यदि पुलिस मात्र पन्द्रह मिनट के लिए हट जाए तो अल्पसंख्यक धर्म के लोग बहुसंख्यकों को उनका दम दिखा देंगे. साथ ही उन्होंने हिंदू धर्म के देवताओं के बारे में अत्यंत अनुचित और भद्दी बातें कहीं.

डा. लक्ष्‍मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ स्‍मृति पर्व आयोजित

लखनऊ। 30 दिसम्बर, 2012 को यूपी प्रेस क्लब के सभागार में डॉ0 लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ स्मृति पर्व का आयोजन किया गया। समारोह का प्रारम्भ स्व0 निशंक जी द्वारा लिखित सरस्वती वंदना का सस्वर गायन ‘मुझको भी अपना वर दो’ के साथ हुआ, जिसका गायन प्रो0 कमला श्रीवास्तव एवं सहयोगी डॉ0 सरोजनी सक्सेना, श्रीमती इन्दिरा श्रीवास्तव, श्रीमती स्मिता जैन एवं श्रीमती रेखा मित्तल द्वारा किया गया। डॉ0 लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ के चित्रा पर माल्यार्पण करने वाले मुख्य अतिथियों में श्रीमती स्वरूप कुमारी बख्शी, श्री गोपाल चतुर्वेदी, श्री उदय प्रताप सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, डॉ0 सुधाकर अदीब, निदेशक, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, प्रो शैलनाथ चतुर्वेदी, श्री महेश चन्द्र द्विवेदी (पूर्व डीजीपी, उ0प्र0), डॉ0 मंजुलता तिवारी व श्री गिरीश चन्द्र शुक्ला मुख्य थे।

क्यों ना बलात्कारियों से पहले ‘बलात्कार’ को ही फांसी दे दें!

दिल्ली में चलती बस में बहशी दरिंदों की हवस से सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई पैरामेडिकल की छात्रा की मौत पर कहा जा रहा है उसकी चिता मशाल बन 125 करोड़ देशवासियों को जगा गई है। दिल्ली में इंडिया गेट से लेकर मीडिया-समाचार पत्रों और सोशियल मीडिया पर आज यही चर्चा है, जैसे कुछ दिन पहले केजरीवाल, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की चर्चा थीं (तब भी देश को जागा हुआ बताया जा रहा था)। इस सबसे थोड़ा आगे निकलते हैं। मीडिया, समाचार पत्रों में धीरे-धीरे उसकी खबरें पीछे होती चली जाएंगीं। सोशल मीडिया में लोगों की प्रोफाइल पर लगे काले धब्बे भी जल्द हटकर वापस अपनी या किसी अन्य खूबसूरत चेहरे की आकर्षक तस्वीरों से गुलजार हो जाएंगे। अखबरों, चैनलों में कभी संदर्भ के तौर पर यह आएगा कि 16 दिसंबर 2012 को पांच बहशी दरिंदों ने दिल्ली के बसंत विहार इलाके में चलती बस में युवती से बलात्कार किया था, और उसे उसके मित्र के साथ महिपालपुर इलाके में नग्नावस्था में झाड़ियों में फेंक दिया गया था।

पुस्तक मेला में उपन्यास ‘वर्चस्व’ का लोकार्पण

अभिव्यक्ति फाउंडेशन के तत्वावधान में गिरिडीह झंडा मैदान में आयोजित पुस्तक मेला के उद्घाटन समारोह के मौके पर भोरंडीहा, गिरिडीह के 78 वर्षीय बसंत शर्मा लिखित उपन्यास ‘वर्चस्व’ का लोकापर्ण किया गया। लोकार्पण गिरिडीह विधायक निर्भय कुमार शाहाबादी, पूर्व विधायक चन्द्रमोहन प्रसाद, डीडीसी प्रमोद कुमार गुप्ता, एसडीओ संजय भगत, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कंचनमाला, उद्योग महाप्रबंधक कमलेश लोहानी, अभिव्यक्ति फाउंडेशन के कृष्णकांत और लेखक बसंत शर्मा ने संयुक्त रूप से किया। सभी ने पुस्तक मेला के आयोजन की सराहना की और स्थानीय प्रकाशकों को और भी पुस्तकें प्रकाशित करने को प्रेरित किया। उपन्यास ‘वर्चस्व’ में नारी सशक्तिकरण की इस सदी में पुरुषों का अपनी पत्नी पर वर्चस्व, पत्नी के अपने स्वतंत्र विवेक और इच्छा के बीच के संघर्ष, उसके साथ न्यायपालिका की ओर भी बढऩे की चेष्ठा करते भ्रष्टाचार के घृणित पंजे और उसके निर्ममतापूर्वक मचोड़ दिए जाने के दृढ़ संकल्प के संघर्ष को चित्रित किया गया है।

मुख्‍य कोषाधिकारी के तुगलकी फरमान से बनारस के कर्मचारियों का वेतन रूका

वाराणसी। राज्य कर्मचारियों का माह दिसम्बर का वेतन कोषागार कार्यालय द्वारा ई-पेमेन्ट के नाम पर रोक दिया गया है। जिस कारण कर्मचारियो में गहरी नाराजगी है। कर्मचारियों को कहना है कि गत दिवस कमिश्नरी आडिटोरियम में लखनऊ से आये निदेशक कोषागार की अध्यक्षता में आयोजित बैठक के दौरान अप्रैल, 2013 से ई-पेमेन्ट व्यवस्था लागू होने की जानकारी कार्यालयाध्यक्षों को दिया गया था। लेकिन एक जनवरी को नये साल के पहले ही दिन कई विभागों में कोषागार कार्यालय द्वारा फोन कर दिसम्बर माह के वेतन से संबंधित प्राप्त चेक को लौटाने की मुख्य कोषाधिकारी के फरमान को सुनाया गया। बस क्या था, कर्मचारी सकते में आ गये।

दिल्‍ली के बर्बर इस क़दर बेख़ौफ़ क्‍यों?

: दिल्‍ली पुलिस की ”हेल्‍पलाइनों” की कड़वी असलियत – एक अनुभव : कोई भी यह उम्‍मीद करेगा कि 16 दिसंबर के गैंगरेप की बर्बर घटना और उसके बाद उमड़े जनआक्रोश के कारण कम से कम कुछ समय तक तो पुलिस और सरकारी मशीनरी थोड़ी संवेदनशील और चुस्‍त-सतर्क रहेगी। लेकिन हक़ीक़त एकदम उलट है। पिछले कुछ दिनों में कई स्त्रियों से ऐसे अनुभव सुनने को मिले और कल शाम से हम लोग ख़ुद इस कड़वी सच्‍चाई से रूबरू हो रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से स्‍त्री मुक्ति लीग की ओर से हम कई साथी दिल्‍ली के अलग-अलग इलाकों में इस घटना को लेकर प्रदर्शन, सभाएं और पर्चे बांटने का काम कर रहे हैं। इसी से बौखलाए एक बीमार मस्तिष्‍क का पुरुष कल शाम से स्‍त्री मुक्ति लीग के फोन नंबर (जो पर्चे पर छपा है) पर फ़ोन करके लगातार धमकियां, गाली-गलौच और अवर्णनीय रूप से अश्‍लील बातें कर रहा है। उसने सीधे यह भी कहा कि मैं तुम सब लड़कियों को पहचानता हूं और तुम लोग मुझसे बच नहीं सकतीं। मैं तुम्‍हारा वह हाल करूंगा कि लोग दहल जाएंगे। और भी ऐसी बातें जो दोहराई नहीं जा सकतीं…।

सज़ा से ज़्यादा ख़ौफ़ बढ़ाये जस्टिम वर्मा कमेटी

बहस छिड़ी है कि बलात्कारी के लिए क़ानून को सख़्त कैसे बनाया जाए? कितना सख़्त मुनासिब होगा? कैसे लागू होगा सख़्त कानून? इस सवालों के उत्तर मुश्किल नहीं हैं। बशर्ते, हम अपवादों या दुरुपयोग की दलीलों को दरकिनार करके सख़्ती के फ़ायदों पर ही फोकस करें। इसे समझना आसान हो सकता है। बस, हमें अपराध से जुड़ी तमाम बातों की परिभाषाएं दुरुस्त करनी होंगी। इसे और भी आसानी से प्रश्नोत्तर शैली में समझा जा सकता है। मसलन,

1. प्रश्न – बलात्कार की परिभाषा  क्या होनी चाहिए?

उत्तर – बलात्कार शब्द का अर्थ है, बलात् यानी जबरन की गयी हरक़त। इस लिहाज़ से तो किसी महिला के प्रति होने वाली हरेक बेज़ा हरक़त जिसमें उसकी सहमति नहीं हो, उसे बलात्कार ही मानना चाहिए।

संपादकजी… छापकर आवरण पर… नग्न स्त्रियों की तस्वीर… ललकारते हैं रात में… (अंशु की तीन कविताएं)

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संपादकजी,
छापकर आवरण पर
नग्न स्त्रियों की तस्वीर
ललकारते हैं रात में
यही है तुम्हारी संस्कृति
देख लो खजुराहो

जिन्हें गैंगरेप पर पछतावा नहीं था, अब वे तिहाड़ पहुंच कर मौत मांग रहे

Shama Qureshi : दिल्ली गैंग रेप के बाद पूरे देश में रोष का महौल है…नहीं पता कितने लोगों को ये पता है कि जब कि कोई आरोपी रेप केस में दिल्ली की तिहाड़ जेल पहुंचता है तो उसकी क्या हालत की जाती है..सूत्रों की माने तो तिहाड़ के कैदी हर रेप केस में जेल में आये आरोपी की पहले जमकर धुनाई करते हैं…आरोपी का जीना मुहाल रहता है..पुराने कैदी उनसे अपने काम करवाते हैं और टॉयलेट की सफाई करवते हैं…सूत्रों का कहना तो यहां तक है कि रेप की असल परिभाषा आरोपियों को जेल में सिखायी जाती है…और उनकों भी गैंग रेप का शिकार बनाया जाता है…दिल्ली गैंग रेप के आरोपी जब से तिहाड़ जेल पहुंचे हैं उनका डर से बुरा हाल..

थरूर साहब दिक्कत ये है कि आप अपने देश को नहीं जानते

Mayank Saxena : जो बेहद क़ाबिल साथी गीता चोपड़ा अवॉर्ड के तर्क से सहमत हैं…उनको ये पता होना चाहिए कि ये एक पुरस्कार है जो बहादुर बच्चों को दिया जाता है…न कि कोई क़ानून जिसमें अमानवीय बलात्कारियों को सज़ा…आपको घटनाओं, अपराधों, स्थितियों और पुरस्कारों-क़ानूनों का अंतर पता होना चाहिए…ये इतना अजीब सा तर्क है जहां एक क़ानून की पुरस्कार से तुलना की जाती है… क्या दंगा रोधी क़ानून को बिल्कीस के नाम पर कर दिया जाए, क्या हत्या की धारा को नैना साहनी या प्रियदर्शिनी मट्टू के नाम पर रखा जाए…कुछ सब्सटैंशियल भी है आप लोगों के पास कि बस भावनाओं में बह कर कुछ भी कह देना और उसका आंख और दिमाग बंद कर के समर्थन कर देना ही मानवता है.