यह तो हम सभी जानते हैं कि कई सारे लोग अधिकार आ जाने पर बौरा जाते हैं. यह भी हम सुनते रहते हैं कि अक्सर लोग अपने प्रदत्त अधिकारों का गलत-सही उपयोग करते रहते हैं. इसके कई उदाहरण हैं जब किसी ने अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल किसी को गलत लाभ या गलत हानि के लिए कर दिया हो. लेकिन इसके कम ही उदाहरण होते हैं कि किसी के पास कोई शक्ति हो ही नहीं और वह बिना वांछित शक्ति के ही किसी विषय पर आदेश जारी कर दे. इसे कुछ ऐसा माना जाए कि शिक्षा विभाग का कोई अधिकारी किसी मरीज को हेल्थ सर्टिफिकेट जारी कर दे.
कुछ ऐसा ही काम मुझसे सम्बंधित एक प्रकरण में उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पारस नाथ मौर्य द्वारा किया गया है. एक प्रकरण की सुनवाई करते-करते मौर्य ने पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष की हैसियत से सीधे एक जमीन की रजिस्ट्री की वैधता और एक व्यक्ति से कब्ज़ा हटा कर दूसरे को कब्ज़ा दखल कराने का आदेश दे दिया, जबकि यह हम सभी जानते हैं कि क़ानूनन रजिस्ट्री की वैधता और कब्ज़ा दखल के सम्बन्ध में निर्णय का अधिकार मात्र सिविल न्यायालयों को होता है और वह भी किसी दाखिल किये गए केस में सुनवाई के बाद.
बात यह है कि पारस नाथ मौर्य के पास पिछड़ा वर्ग आयोग में शिकायत संख्या 186/2008 श्याम बिहारी विश्वकर्मा बनाम एसएसपी, लखनऊ दायर हुई. यह प्रकरण, एक भूखंड जिसे मैंने आज से करीब सात साल पहले एक हाऊसिंग कोओपेरेटीव सोसायटी से लखनऊ में ख़रीदा था, से सम्बंधित है. मेरे जमीन खरीदने और उसपर बकायदा बाउंड्री वाल बना कर कब्ज़ा-दखल के कई साल बाद अचानक इसी हाऊसिंग सोसायटी के एक पूर्व सचिव श्याम बिहारी विश्वकर्मा द्वारा मेरे विरुद्ध पिछड़ा वर्ग आयोग में यह शिकायत की गयी कि मैंने अपने पति अमिताभ के आईपीएस पद का गलत इस्तेमाल किया, गलत ढंग से जमीन की रजिस्ट्री कराई और फिर वहाँ पहले से मौजूद कुछ गरीब महिलाओं के बाउंड्री वाल गिरा कर बलपूर्वक कब्ज़ा कर लिया.
आयोग में शिकायत पहुँचने के बाद इस पर राजस्व और पुलिस विभाग की जांच हुई. थाने के दरोगा और हलके के लेखपाल, कानूनगो आदि मेरे पास आये, मेरे कागज़ आदि देखे, मौके पर भी जांच किया होगा. बाद में उन लोगों की रिपोर्ट में यह बात साफ़-साफ़ आ गयी कि शिकायत की गयी जमीन की मैंने सोसायटी के सचिव से बकायदा रजिस्ट्री कराई और उस पर काबिज हूँ. साथ ही किसी प्रकार के चाहरदीवारी गिराने की बात सत्य नहीं पायी गयी.
इसके बाद तो होना यही चाहिए था कि मेरे विरुद्ध शिकायत सही नहीं पाए जाने पर आयोग के अध्यक्ष के रूप में पारस नाथ मौर्य को प्रकरण को निक्षेपित कर देना चाहिए था, पर चूँकि उनके पास कुछ कारण थे इसीलिए यह रिपोर्ट आने के बाद भी मौर्य मेरी रजिस्ट्री की वैधता और अवैधता के प्रश्न का विश्लेषण करने लगे और फिर कुछ तर्क देते हुए दो पन्ने का एक कच्चा-पक्का आदेश यह कर दिया कि मेरी रजिस्ट्री अवैध है. वो यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह हुक्मनामा भी राज्य सरकार के सहकारिता विभाग को सुना दिया कि वह जमीन का कब्ज़ा मुझसे लेकर हाऊसिंग सोसायटी को दे और आयोग को एक माह में इससे अवगत कराया जाए.
मैं समझती हूँ आज तक किसी भी आयोग के अध्यक्ष ने इस तरह का आदेश नहीं दिया होगा जो सिर्फ सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है. रजिस्ट्री की वैधता, जमीन की मालियत, कब्ज़े के परिवर्तन आदि से सम्बंधित प्रकरण सीधे-सीधे सिविल कोर्ट के मामले हैं. इनमे बकायदा प्रभावित व्यक्ति द्वारा मुक़दमा दर्ज किया जाता है और उस पर दोनों तरफ से सिविल प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत सुनवाई होती है और तब जा कर कोर्ट इनके बारे में कोई फैसला करती है. यह नहीं कि मौर्य साहब की तरह आधी-अधूरी बातें सुन कर अधिकार के बाहर प्रकरण में फैसला कर दिया जाए.
इतना ही नहीं, अपने निर्णय में मौर्य साहब ने दुनिया भर की त्रुटियाँ भी की हुई हैं. मेरा नाम नूतन ठाकुर की जगह कई जगह रतन ठाकुर लिख दिया, विक्रेता का नाम कहीं डिंकर सिंह बिष्ट और कहीं तारा सिंह बिष्ट लिखा. ऐसी ही दूसरी गलतियां भी हैं. मैंने जो जानकारी इस बारे में हासिल की उसके अनुसार मेरे खिलाफ शिकायतकर्ता श्याम बिहारी विश्वकर्मा ने सोसायटी के सचिव के रूप में पारस नाथ मौर्य के पुत्र को उसी सोसायटी से भूमि भी प्रदान की थी. हो सकता है, यह मौर्य के निर्णय करने का एक प्रमुख कारण बना हो, पर कारण जो भी हो मेरा यह स्पष्ट मत है कि ऐसे किसी भी संवैधानिक संस्था के अधिकारी को अपने निजी और अन्येतर कारणों से न्याय का गला नहीं घोंटना चाहिए. इससे ना सिर्फ सम्बंधित व्यक्ति की गरिमा घटती है बल्कि उस पद की भी गरिमा का हनन होता है. राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के निश्चित कर्तव्य निर्धारित हैं, क्या अच्छा होता यदि अध्यक्ष महोदय उन्ही कार्यों को सही ढंग से संपादित कर पाते.
मैंने इन सभी तथ्यों से राज्यपाल, उत्तर प्रदेश एवं मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश को 22/06/2011 को पत्र लिख कर आवश्यक कार्रवाई करने और पारस नाथ मौर्य के विरुद्ध न्यायोचित कार्रवाई करने की मांग की. इस पर कुछ नहीं होने पर मैंने उच्च न्यायालय में यह रिट याचिका दायर की, जिस में आज 18/07/2011 को पारसनाथ मौर्य के अधिवक्ता ने न्यायालय में मौर्य द्वारा अपने पूर्व के आदेश दिनांक 09/08/2010 को दो दिनों के अंदर वापस लेने की बात कह कर यह बात स्वयं ही साबित कर दिया कि उनका पूर्व का आदेश अवैध था. इस पर उच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिका को निष्पादित कर दिया गया है. लेकिन असली प्रश्न अब भी यही है कि क्या पारस नाथ मौर्य जैसे किसी संवैधानिक संगठन के अध्यक्ष कोई भी मनमाना आदेश जारी कर सकते हैं, जिसे मामला फंसने पर पलट जाएँ?
डॉ. नूतन ठाकुर
लखनऊ


