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अधिवक्‍ता अरविंद जैन हिंदी विश्‍वविद्याल को देंगे तीन हजार पुस्‍तकें

: सर्वश्रेष्ठ पी-एच्.डी. को पचास हजार का स्वर्ण पदक : हिंदी विवि के स्त्री अध्य‍यन विभाग में हुआ ‘संविधान और स्त्री’ तथा ‘विवाह और परिवार’ पर विशेष व्याख्यान : वर्धा ; महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय विशेष व्याख्यान समारोह के दौरान उच्‍चतम न्यायालय के सुप्रसिद्ध अधिवक्ता अरविंद जैन ने घोषणा की कि स्त्री अध्ययन विभाग के हितार्थ वे अपने निजी पुस्तकालय से स्त्री अध्ययन संबंधी तीन हजार पुस्तकें इस विभाग को भेंट करेंगे तथा प्रत्येक वर्ष इस विभाग के सर्वश्रेष्ठ पी-एच्.डी. शोध-प्रबंध को ‘अरविंद जैन स्वर्ण पदक’ (लगभग पचास हजार रुपये की राशि) भी प्रदान करेंगे। इस घोषणा का विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने स्‍वागत किया।

: सर्वश्रेष्ठ पी-एच्.डी. को पचास हजार का स्वर्ण पदक : हिंदी विवि के स्त्री अध्य‍यन विभाग में हुआ ‘संविधान और स्त्री’ तथा ‘विवाह और परिवार’ पर विशेष व्याख्यान : वर्धा ; महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय विशेष व्याख्यान समारोह के दौरान उच्‍चतम न्यायालय के सुप्रसिद्ध अधिवक्ता अरविंद जैन ने घोषणा की कि स्त्री अध्ययन विभाग के हितार्थ वे अपने निजी पुस्तकालय से स्त्री अध्ययन संबंधी तीन हजार पुस्तकें इस विभाग को भेंट करेंगे तथा प्रत्येक वर्ष इस विभाग के सर्वश्रेष्ठ पी-एच्.डी. शोध-प्रबंध को ‘अरविंद जैन स्वर्ण पदक’ (लगभग पचास हजार रुपये की राशि) भी प्रदान करेंगे। इस घोषणा का विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने स्‍वागत किया।

 

अधिवक्‍ता अरविंद जैन ने स्‍त्री संबंधी अनेक कानूनों की आलोचनात्‍मक व्‍याख्‍या करते हुए कहा कि किस तरह उनमें कई खामियाँ हैं जिनका लाभ उठाकर पुरूषवर्ग अपना हित साधता है। न्‍याय की पूरी प्रक्र‍िया का ‘माइंड सेट’ पितृसत्‍ता मूलक है। अत: जब तक यह ‘माइंड सेट’ नहीं बदलता है तब तक व्‍यावहारिक रूप से न्‍याय नहीं मिल सकता। स्‍त्री सशक्तिकरण के लिए पितृसत्‍ता का ‘माइंड सेट’ बदलना जरूरी है। ‘संविधान और स्त्री’, ‘विवाह और परिवार’, ‘जाति, वर्ग और जेंडर’ तथा ‘स्‍त्री आंदोलन (कानून के विशेष संदर्भ में)’ आदि विषयों पर अरविंद जैन ने अपनी बात रखी। ‘संविधान और स्‍त्री‘ विषय पर विमर्श करते हुए उन्‍होंने कहा कि स्‍त्री संबंधी कानूनों में तथा उसके आधार पर आए फैसलों में पितृसत्‍ता तथा स्त्रियों के साथ भेदभाव की मानसिकता स्‍पष्‍ट नजर आती है। ‘विवाह और परिवार’ विषय पर उन्‍होंने कहा कि ये दोनों संस्‍थाएँ पितृसत्‍ता व पुरूष वर्चस्‍व के अंतर्गत संचालित होती हैं। इन दोनों का व्‍यावहारिक रूप स्‍त्री विरोधी है।

 

अपने व्‍याख्‍यानों में ‘जाति, वर्ग और जेंडर’ के अधार पर स्त्रियों के साथ हो रहे भेदभाव को रेखांकित करते हुए उन्‍होंने बताया कि किस तरह से कई कानून धार्मिक वैधता का सहारा लेकर इस भेदभाव को और भी बढ़ाते हैं। समारोह के दूसरे दिन अधिवक्ता अरविंद जैन की एक कहानी ‘लापता लड़की’ पर एक कार्यशाला आयोजित की गई। जिसमें उन्होंने कहानी का पाठ भी किया तदुपरांत उपस्थित विद्यार्थियों ने इसपर अपने विचार व्‍यक्‍त किये। यह कहानी स्त्री मुद्दों पर केंद्रित एक बहस-तलब कहानी थी। जिसपर लंबी बहस हुई। इस विमर्श में स्त्री संबंधी अनेकानेक प्रश्न और मुद्दे उठे जिनपर अंत में अरविंद जैन ने अपनी विशेषज्ञतापूर्ण व्याख्यान दिया। गौरतलब है कि इस विमर्श में विश्‍वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित थे। समारोह की अध्‍यक्षता स्त्री अध्ययन के विभागाध्यक्ष प्रो.शंभू गुप्‍त ने किया।

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