कोई लाख दलीलें दे कि उत्तराखंड राज्य में सब कुछ सही चल रहा है और व्यवस्था पूरी तरह से नियंत्रण में है, लेकिन यह कपोल कल्पना के सिवाय कुछ और नहीं है। सूबे में घपले-घोटालों पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। कारण, अब तक जितने घपले घोटाले हुए हैं उनकी जांच पूरी होने में सालों लगेंगे और जिन मामलों में जांच पूरी होकर कार्यवाही का समय आया भी तो सबने आंखें मूंद ली। घपले घोटालों में अधिकारी लिप्त हैं और उनकी जांच करने वाले भी अधिकारी, तो व्यवस्था होगी ही रामभरोसे। वर्ष 2006 में उत्तराखंड वन सेवा के अधिकारियों के दक्षिण अफ्रीका दौरे का आरटीआई में खुलासा हुआ तो मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। यही नहीं मौखिक आदेश पर ही वन अधिकारियों ने सीएफडी से 20 लाख रुपये ले लिये और मनमर्जी से खर्च कर डाले। आधे दशक से भी अधिक समय बीतने के बावजूद वन विभाग यह बता पाने में नाकाम है कि इस रकम को खर्च करने से राज्य का क्या भला हुआ?
मामला एनडी सरकार के समय का है। तब नवप्रभात, जो कि इस समय विकासनगर से विधायक हैं, उत्तराखंड सरकार में वन मंत्री थे। इको पर्यटन का अध्ययन करने के लिए वनमंत्री नवप्रभात के नेतृत्व में विधायक शैलेन्द्र मोहन सिंघल, मुख्य वन संरक्षक डीबीएस खाती, विनोद कुमार तथा राजाजी नेशनल पार्क के तत्कालीन डायरेक्टर जीएस पाण्डे दौरे पर साउथ अफ्रीका गये थे। इस अहम दौरे को दल ने मौजमस्ती के तौर पर लिया और उनके साथ मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के परिजन भी शामिल हो गये। हालांकि सूचना अधिकार में मांगी गई जानकारी में विभाग ने इस संबंध में मालूमात न होने का बहाना बना दिया। यही नहीं अध्ययन दल ने क्या रिपोर्ट दी है, किसी को भी कुछ नहीं मालूम, क्योंकि अभी तक किसी भी अनुभाग में यह रिपोर्ट है ही नहीं। विभाग के एक अधिकारी आरडी पाठक ने जब अध्ययन रिपोर्ट की सूचना मांगी तो विभाग की ओर से भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं करायी गयी। वर्तमान में मामला राज्य सूचना आयोग में चल रहा है और सवाल जस के तस खड़ा है कि उक्त लोगों के दक्षिण अफ्रीका जाने पर राज्य सरकार ने पैसा खर्च किया तो आखिर इस दौरे से राज्य को कितना लाभ मिला है? क्या यह दौरा अधिकारियों और मंत्रियों की परिजनों को घुमाने के लिए विशेष यात्रा थी?
खैर! जब यह दल वापस लौटा तो दौरे पर कुल खर्चा 6 लाख 88 हजार 926 रुपये आया। तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक वित्तीय प्रबंधन डीबीएस खाती के व्यक्तिगत निर्देश पर तत्कालीन वन रेंजर पश्चिमी तराई वन प्रभाग रामनगर आरके तिवारी ने सीएफडी खाते से 10-10 लाख रुपये कर दो बार में 20 लाख की धनराशि आहरित की। तिवारी ने खाती के निर्देश पर 10 लाख रुपये डीएस जीना, प्रतिनिधि कार्बेट हाईड अवे ढिकुली रामनगर को हस्तगत कर दी, जबकि शेष 10 लाख की राशि राजाजी नेशनल पार्क के तत्कालीन निदेशक जीएस पाण्डे को सौंप दी। सुरक्षा की दृष्टि से पाण्डे ने 3 लाख रुपये अपने पास रख लिये, जबकि 3 लाख रुपये तत्कालीन वन क्षेत्राधिरी कांसरों रेंज हेम शंकर मैन्दोला और बाकी के 4 लाख एकाउंटेट डीएस नेगी को देकर रसीद भी ले ली। हालांकि जीएस पाण्डे के पास जो धन था उसका हिसाब नहीं है, क्योंकि उनके पास से कोई रसीद अथवा हिसाब नहीं मांगा गया।
उक्त 20 लाख में से कुल 6, 88926 रुपये यात्रा पर खर्च हुए। इसके बाद 15 अगस्त 2006 से लेकर 19 नंवबर 2008 तक चार बार में 10, 85000 रुपये नकद वापस हो गए। अभी भी 2, 26000 की रकम का हिसाब नहीं दिया गया है। मामला खुलने पर सीएफडी की ओर से इस बची हुई धनराशि की वसूली के लिए कार्यवाही की बात कही जा रही है। इस पूरे प्रकरण में हैरत की बात यह रही कि वित्तीय प्रबंधन का जिम्मा संभाल रहे शीर्ष अधिकारी खाती के द्वारा ही वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ायी गयी। जो धन 4 किस्तों में जमा किया गया है वह कहां से आया यह सवाल बना हुआ है? क्योंकि, वन क्षेत्राधिकारी आरके तिवारी का कहना है कि उन्होंने कोई धन जमा किया ही नहीं। उनके नाम पर धन जमाकर रसीदें काट दी गयी हैं। तिवारी के इनकार के बाद यह पूरी तरह से नंबर दो का धन माना जा रहा है। सरकार विदेश यात्राओं पर जाने के लिए अब कड़ी निगरानी की बात कह रही है, लेकिन ऐसा कई बार हो चुका है जब अध्ययन दल महज सैर सपाटे के लिए ही विदेश भ्रमण कर चुके हैं।
वन महकमे में इस टूर को लेकर खासी चर्चायें हैं, लेकिन बडे़ अधिकारियों की संलिप्तता के कारण सभी कुछ कहने से बच रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी का तो यहां तक कहना है कि एक बड़े अधिकारी जो कि अब शासन में हैं, के पास कैमरे की जिम्मेदारी थी। उन्होंने साउथ अफ्रीका में विमान के लैंड करते ही कैमरे की जिम्मेदारी बखूबी संभाल ली थी। बाकी दूसरे बडे़ अधिकारियों और मंत्री जी ने अपने परिवार को भी समय देना था। ऐसे में अध्ययन करने की फुर्सत कहां मिलती। कैमरे वाले साहब ने हवाई सर्वेक्षण के दौरान कुछ तस्वीरें खींची हैं जोकि उनकी निजी संपत्ति बन गयी। पुष्ट सूत्रों के अनुसार 10 लाख रुपये की धनराशि को एक विदेशी एजेंसी के माध्यम से साउथ अफ्रीकन मुद्रा में परिवर्तित किया गया। बिना एफसीआरए की क्लीरेंस के बिना इस धनराशि को व्यय कर दिया गया। इसी कारण बची धनराशि को अन्यत्र से जमा कर धन को वैध दिखाने के लिए तिवारी के नाम पर रसीदें कटवायी गयी। यही वजह धन को जमा कराने में भी बाधा मानी जा रही है। पाठकों की जानकारी के लिए टूर पर हुए खर्च 6,88,926 लाख रुपये में महज कुछ तस्वीरें उन यादगार पलों की मिली हैं जिन्हें लेकर वन विभाग के अधिकारी आनाकानी कर रहे हैं। इन गोपनीय तस्वीरों को हम राज्य की जनता के साथ साझा कर रहे हैं, ताकि वह देख सके कि उस पर खर्च होने वाले धन को किस तरह मंत्री-अधिकारी अपनी तफरीह में उड़ाकर बेशर्मी से खीसे निपोरते फिरते हैं।
सरकारी धन पर विदेश यात्रा करने से पूर्व आरबीआई से मुद्रा परिवर्तन की अनुमति लेनी होती है एवं यात्रा के बाद बची हुई विदेशी मुद्रा को वापस जमा करना अनिवार्य होता है। अगर प्रति व्यक्ति कितना खर्च कर सकता है, वह भी फेरा नियमों के तहत उल्लेखित होता है। सरकारी कार्य से जाना और घूमने के लिए जाना दोनों में खर्च करने की सीमा एवं विदेशी मुद्रा की सीमा अलग-अलग होती है। ऐसे में विभाग द्वारा 20 लाख रुपये किस नियम के तहत दिए गए और आरबीआई के किस नियम के तहत यह विदेशी मुद्रा में परिवर्तित किया गया अपने आप में अनसुलझा प्रश्न है? अगर संपूर्ण मुद्रा परिवर्तित कर दी गई हो, तो यात्रा के बाद उसे भारतीय मुद्रा में वापस परिवर्तित कर विभागीय खजाने में तुरंत ही जमा करना अनिवार्य है। ऐसा न करना फेरा कानून का सीधा-सीधा उल्लंघन है। अगर आंशिक मुद्रा ही परिवर्तित की गई हो तो बचे हुए धन को तुरंत खजाने में जमा हो जाना चाहिए था। ऐसा न करना भारतीय प्रशासनिक कानून के तहत अपराध है, क्योंकि सरकारी धन को बिना कारण इतने समय तक अपने पास रखना जुर्म की श्रेणी में आता है।
साफ झूठ बोल रहा है विभाग!
जानकारों की मानें तो वन विभाग विदेश गए अध्ययन दल के यात्रियों के संबंध में जानकारी न होना साफ तौर पर झूठ बोल रहा है। नियमानुसार किसी भी मंत्री या सरकारी दल की विदेश यात्रा को भारत सरकार के द्वारा अनुमति प्रदान की जाती है एवं संबंधित राजदूत को भी सूचित किया जाता है। ऐसे दलों को संबंधित सरकारें वीजा में छूट देते हुए तुरंत वीजा प्रदान करती हैं और साथ-साथ सरकारी प्रोटोकाल का भी ध्यान रखा जाता है। वन विभाग द्वारा इतने महत्वपूर्ण दौरे का कोई रिकार्ड न रखना सवाल खडे़ करने के लिए काफी है। क्योंकि, विदेश यात्रा करने वाले प्रत्येक सदस्य का विवरण विभाग की ओर से विदेश मंत्रालय और संबंधित देश स्थित राजदूतावास को अनिवार्य रूप से भेजा गया होगा। ऐसे में इस दल के सदस्यों का ब्यौरा उपलब्ध न होने की बात गले नहीं उतरती। यानी अब चोरी पकडे़ जाने पर बचाव में बहानेबाजी की जा रही है।
राष्ट्रीय अवकाश के दिन हुए पैसे जमा!
वन विभाग की मानें 15 अगस्त 2006 को कर्मचारियों ने छुट्टी नहीं बनाई, बल्कि देशभक्ति के चरम का परिचय देते हुए कार्यालय में काम किया। तभी तो तीन लाख 75 हजार की राशि उक्त तिथि को कार्यालय में जमा संभव हो सकी!
राजीव थपलियाल की रिपोर्ट.


