भोपाल के सुपरिचित कवि अनिल गोयल के नवीन गजल संग्रह ‘रोटी नहीं सवाल नया’ का लोकार्पण गत दिनों हुआ। गंज बासौदा के ‘संजय गाँधी स्मृति महाविद्यालय’ में संयोजित दो दिवसीय शोध संगोष्ठी के मध्य हुए इस विमोचन समारोह में ‘उद्भावना’ (दिल्ली) के सम्पादक अजय कुमार, आलोचक रामप्रकाश त्रिपाठी, वरिष्ठ कवि नरेन्द्र जैन, राजेंद्र शर्मा, मणिमोहन मेहता आदि ने संग्रह की तेजस्विता को सराहते हुए कहा कि ‘रोटी नहीं सवाल नया’ पढ़ते हुए उस आम आदमी के हालातों से रुबरु होना होता है, जो लोकतंत्र के नाम पर विद्रूप राजनीति का अभिशप झेलने का विषय है। इस मौके पर अनिल गोयल ने बतौर आत्मकथ्य अपनी ग़ज़ल के ये शेर कहे -‘है मन मौज अपनी, है बंदिश बहर की/ कथा है, व्यथा है शहर दर शहर की’, … ‘सुनीं, देखी, भोगी हैं ये यातनाएँ/ ग़ज़ल हैं ये मेरे बराबर उमर की’, ‘जो कभी था बाप के भी बाप का परिचय/ सिर्फ़ उतना सा ही तो है आपका परिचय’, ‘सिद्ध कर दूँगा कि घुँघरु हूँ मैं अलबेला/ मुझसे करवा दीजिए बस थाप का परिचय’।
श्री गोयल ने अपनी सृजन यात्रा के बारे में बताया कि ‘बचपन में रामायण पाठ में शामिल होते हुए ‘बहर’ और ‘तुक’ की समझ आई। इसी के चलते दोहे और चौपाई की शक्ल में किसी भी विषय पर लिखने की आदत बनी।’ इस अवसर पर अमिताभ बच्चन पर लिखी उनकी चार कविताओं ने श्रोताओं की खूब वाह-वाही पाई।


