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अन्ना : प्रिंट ने किया तौबा, टीवी ने फिर बनाया इवेंट

: हजारे को सबसे बड़ा ब्रांड बनाने वाले पत्रकार थे या कोई और? : अपना अनशन समाप्त करने के बाद गुडगाँव के एक अस्पताल में २-३ दिन तक स्वास्थ्य लाभ करके अन्ना हजारे वापस अपने गाँव चले गए. यह खबर आज देश के हिन्दी के सबसे बड़े अखबार में पहले पेज पर छपी है. खबर गुडगाँव के संवाददाता की है और एक कालम की यह खबर करीब १०० शब्दों में निपटा दी गयी है. देश के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार में भी यह खबर पहले पेज पर संक्षिप्त छापी गयी है. यानी अब प्रिंट मीडिया को अन्ना हजारे और उनकी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं बची है, लेकिन टेलीविज़न मीडिया ने कल शाम को जब अन्ना हजारे अस्पताल से निकले तो उस विदाई को मीडिया इवेंट बनाने की पूरी कोशिश की.

: हजारे को सबसे बड़ा ब्रांड बनाने वाले पत्रकार थे या कोई और? : अपना अनशन समाप्त करने के बाद गुडगाँव के एक अस्पताल में २-३ दिन तक स्वास्थ्य लाभ करके अन्ना हजारे वापस अपने गाँव चले गए. यह खबर आज देश के हिन्दी के सबसे बड़े अखबार में पहले पेज पर छपी है. खबर गुडगाँव के संवाददाता की है और एक कालम की यह खबर करीब १०० शब्दों में निपटा दी गयी है. देश के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार में भी यह खबर पहले पेज पर संक्षिप्त छापी गयी है. यानी अब प्रिंट मीडिया को अन्ना हजारे और उनकी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं बची है, लेकिन टेलीविज़न मीडिया ने कल शाम को जब अन्ना हजारे अस्पताल से निकले तो उस विदाई को मीडिया इवेंट बनाने की पूरी कोशिश की.

कुछ चैनलों पर अन्ना हजारे की अस्पताल से विदाई की खबरों को देखने का मौका मुझे भी मिला.  हेडलाइन थी कि अन्ना हजारे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी है. एक कार में ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ कर अन्ना हजारे को जाते हुए दिखाया गया था. वही सफ़ेद गांधी टोपी, वही सफ़ेद कुरता और वही सौम्य मुस्कान. करीब ३ सेकण्ड का यह शाट बार-बार दिखाया गया. साथ में न्यूज़ रीडर की आवाज़ भी कानों में पंहुच रही थी कि अन्ना हजारे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी है. उसी शाट को करीब २५ मिनट तक लगातार दिखाया गया और एक ही वाक्य को न्यूज़रीडर तरह-तरह से बोलता रहा. कभी कहता कि अन्ना हजारे को अस्‍पताल से छुट्टी दे दी गयी है. और वे कहीं जा रहे हैं. फिर कहता कि हम आपको इस बारे में पल-पल की जानकारी दे रहे हैं. अब हम गुडगाँव चलते हैं जहां हमारे संवाददाता मिस्टर अमुक लाइव जुड़ रहे हैं. और अब वे पल-पल की जानकारी देंगे. लाइव संवाददाता भी वही वाक्य कुछ फेरबदल करके सुनाते और कहते कि अभी पता नहीं है कि अन्ना को कहाँ ले जाया जा रहा है. यह भी नहीं पता कि उनके साथ कौन-कौन हैं. यह भी नहीं पता कि वे कहाँ जा रहे हैं.

यानी करीब ७ वाक्य ऐसे होते थे कि लाइव संवाददाता को पता ही नहीं कि खबर क्या है लेकिन टेलीविज़न पर हैं तो कुछ न कुछ तो बोलते ही रहना है, लिहाजा कुछ ऐसे वाक्य बोलते रहे जिन वाक्यों को न्यूज़ रीडर और लाइव संवाददाता ने मिलकर २५ मिनटों में सैकड़ों बार बोला होगा. बार-बार लगता था कि बीच में यह न्यूज़ रीडर थोड़ा समय निकाल कर उन खबरों के बारे में भी बता देगा, जिससे देश को पता चलता कि उत्तर भारत के बहुत सारे इलाकों में भारी बाढ़ आई हुई है. कुछ इलाकों में लोग पेड़ों पर रह रहे हैं, कुछ इलाकों में लोग बाढ़ की वजह से पूरी तरह से अलग थलग पड़ गए हैं और भूख से तड़प रहे हैं, लेकिन ऐसा कहीं होता नहीं दिखा. शाम को भी कुछ चैनलों को देखने का मौक़ा मिला. वहां भी कुछ ऐसी बहसें चल रही थीं जिनको देख कर लगता ही नहीं था कि असली भारत किन मुसीबतों से जूझ रहा है. राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी और अफज़ल गुरु की फांसी की राजनीतिक विवेचना भी कुछ चैनलों पर नज़र आई. लेकिन इन खबरों को आज अखबारों ने वह इज्ज़त नहीं दी है, जो रुतबा इन का कल के टीवी चैनलों पर देखने को मिला.

ज़ाहिर है कि भारतीय मीडिया की प्राथमिकताएं खबर की औकात से नहीं किसी अन्य कारण से तय होती हैं. कुछ कठोर आलोचक टीवी न्यूज़ की प्राथमिकता को तय करने का पैमाना टीआरपी को बता कर टीवी चैनलों को बहुत ही स्वार्थी संगठन के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं. उस तर्क से तो टीवी चैनल इंसान की कमजोरी का बौद्धिक शोषण करने वाले संगठन के रूप में मान लिए जायेंगे. आम तौर पर इंसान की यह कमजोरी होती है कि वह अपने बारे में खबर देख कर बहुत खुश होता है. हालांकि कई ज्ञानी टीवी संपादक इस बात को सेमिनारों आदि में इस बात को खुद स्वीकार करते पाए जाते हैं, लेकिन उन्हें शायद मालूम ही नहीं है कि वे क्या स्वीकार कर रहे हैं. टीआरपी के दबाव में खबरों को प्रस्तुत करने की बात को कुछ हद तक तो स्वीकार किया जा सकता है लेकिन यह पूरी तरह से सच नहीं है. भारत में टेलीविज़न की बहुत सारी खबरों ने इतिहास रचा है. उन सबको यहाँ दुहराना समीचीन नहीं होगा लेकिन समकालीन भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसी खबरें ज़रूर हैं, जिनके कारण बहुत बड़े-बड़े घोटाले पब्लिक डोमेन में आये. कामनवेल्थ खेलों के घोटाले, २ जी स्पेट्रम के घोटाले आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिनको फोकस में लाने में टेलीविज़न चैनलों का भारी योगदान है.

बंगारू लक्ष्मण नाम के नेता को नोटों के बण्डल संभालते दिखाकर टेलीविज़न ने भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग में एक संगमील स्थापित किया था, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है इस तरह की खबरें उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं. कामनवेल्थ खेल और २जी वाला घोटाला तो देश के राजनीतिक विकास में भारी योगदान कर रहा है. कांग्रेस को एक भ्रष्ट पार्टी के रूप में चिन्हित करने में इन खबरों का बहुत बड़ा योगदान है. लेकिन जब टेलीविज़न एक व्यक्ति के अनशन को राष्ट्रीय एजेंडा पर लाने की कोशिश करता है तो बात अजीब लगती है. टेलीविज़न की कृपा से ही ब्रांड अन्ना अगस्त के दूसरे पखवाड़े के समय काल में १० दिनों के विज्ञापन की दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय ब्रांड बन सके. विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोगों का कहना है किसी एक आदमी को १५ दिन के अंदर देश का टाप ब्रांड बनाना कोई मामूली सफलता नहीं है. उसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर प्लानिंग की ज़रूरत होती है. देश के आम आदमी को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि किसी को ब्रांड बनाने के लिए कितनी प्लानिंग की गयी और कितनी नहीं की गयी. लेकिन उसे इस बात से ज़रूर मतलब है कि वह टेलीविज़न पर ऐसी ख़बरों को देखे जिस से उसकी जानकारी बढे़.

यहाँ कम्युनिकेशन थियरी के महान विद्वानों मार्शल मैक्लुहान और रेमंड विलियम्स के विचारों का हवाला देकर कोई प्वाइंट स्कोर करने की मंशा नहीं है, लेकिन आम आदमी की उस जिज्ञासा को ज़रूर रेखांकित किया जाना चाहिए कि वह उन खबरों को ही देखे जो उसकी जानकारी में वृद्धि करें. अगर जानकारी में वृद्धि करने के बाद कोई खबर बार-बार श्रोता के सर पर हथौड़े की तरह काम कर रही है तो उसे विज्ञापन कहा जायेगा. यहाँ इस बहस में भी जाने की ज़रुरत नहीं है कि पंद्रह दिनों तक टेलीविज़न पर अन्ना हजारे की जो ब्रांड बिल्डिंग की गयी उसका उद्देश्य क्या था और उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए टेलीविज़न टाइम कौन मुहैया करवा रहा था, लेकिन यह बात सच है कि समाचार की जितनी भी परिभाषाएं अब तक जानकारी में आई हैं उनके अनुसार १५ दिन तक टेलीविज़न पर चला अन्ना हजारे का अभियान किसी भी सूरत में खबर की श्रेणी में नहीं आता. हाँ अगर यह मान लिया जाय कि वह ब्रांड बिल्डिंग का एक आयोजन था तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी. आज के अखबारों में छपी अन्ना हजारे से सम्बंधित ख़बरों को जो मामूली ट्रीटमेंट हुआ है उसे देख कर समझ में आ जाता है कि पत्रकार बिरादरी तो अन्ना हजारे वाली ख़बरों को सही समझ रही थी, लेकिन जो नज़र आ रहा था वह पत्रकारों के कारण नहीं नज़र आ रहा था. बार-बार सवाल उठता है कि कहीं वह ब्रांड मैनेजरों का काम तो नहीं था.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के नेशनल ब्यूरो चीफ हैं.

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