अन्ना हजारे के अनशन से चौतरफा आग लगी है। आग की लपटें बढ़ती जा रही है। अब इससे कैसे निपटा जाए? राजनीतिक आग पर कैसे काबू पाया जाए? इस सवाल से केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी हैरान, परेशान और हताश है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के ऑपरेशन के बाद हो रहे स्वास्थ्य सुधार का इंतजार कर रही कांग्रेस पार्टी के लिए मुश्किल की घड़ी है। संकटमोचक ढूंढे नहीं मिल रहा। कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे राहुल गांधी को सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि निढ़ाल हुई पडी है।
पूरी सरकार दुविधा में फंसी है। अब तो सरकार को लेकर वो भय भी जाता रहा कि सरकार के पास बड़ी ताकत होती है। इस ताकत से किसी भी विरोध को कुचला जा सकता है। सरकार किसी भी आंदोलनकारी से निपट सकती है या फिर अनशनकारी को निपटा सकती है। बाबा रामदेव के मामले में सरकार ने इस ताकत का इजहार कर सबको दिखा रखा है। पर अहिंसक अन्ना पर सरकारी ताकत का यह जादू नहीं चल रहा।
डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार और राहुल गांधी के लिए यह सवाल पल प्रतिपल जटिल से जटिलतर होता जा रहा है कि अन्ना से कैसे निपटा जाए? प्रदर्शनकारियों के लिए जेल में बदला गया छत्रसाल स्टेडियम भी गिरफ्तारियों से भरा जा रहा है। नए जेल का इंतजाम करने की बात हो रही है पर प्रदर्शनों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा। अन्ना का जादू काम करने लगा है। विरोध में सरकारी कर्मचारियों तक की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। हथियार से निहत्थे पुलिस के हाथों अन्ना और उनके समर्थकों से पेश आने की सरकारी रणनीति का कोई लाभ नहीं मिल रहा। इस अभूतपूर्व प्रयोग की कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही। सरकारी प्रयास बेकाम साबित हो रही है। सरकार को सहसा पैर के नीचे से जमीन खिसकने का आभास हो रहा है।
अब क्या होगा? या आगे क्या किया जाए? इस पर एकराय से फैसला लेना कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के अमेरिका में जाकर ऑपरेशन कराने के फैसले से भी ज्यादा जटिल बन गया है। कांग्रेस नेताओं की तरफ से चाटुकारिता में ही सही कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी के मुल्क नहीं होने का नुकसान हो रहा है। 24 अकबर रोड पर नेता बता रहे हैं कि अप्रैल में अन्ना को अनशन करने देने का सरकारी फैसला भी सोनिया गांधी के हस्तक्षेप की वजह से हुआ था। अन्ना ने सोनिया गांधी को खत लिखा था उसके जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को अन्ना के साथ सलीके से पेश आने की सलाह दी थी। लोकपाल समिति का गठन कर अनशन तुड़वाने का फैसला लिया गया था। लेकिन इस बार बुरी तरह फंसी सरकार को अन्ना के अनशन से निपटने के सवाल पर सटीक जवाब राजनीतिक मामलों की कबीना समिति तक नहीं दे पा रही। बेबसी का आलम है।
मु्श्किल इसलिए भी बड़ी है कि सरकार के फैसलों की तुलना अब आसानी से इमरजेंसी से कर दी जा रही है। विपक्ष अन्ना को लेकर ऐतिहासिक तरीके से गोलबंद होता जा रहा है। विपक्ष की बात छोड़िए कांग्रेस पार्टी में मौजूद हर बड़ा राजनीतिज्ञ अन्ना हजारे की खिलाफत से बच रहा है। मनीष तिवारी के अन्ना हजारे को तू-तड़ाक की भाषा से संबोधित करने जैसी बचकानी हरकत को दोहराने का माद्दा कांग्रेस के किसी दूसरे कद्दावर नेता में नहीं बचा है। हालात पर सूचना व प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी का फौरी बयान सरकार के बचाव में कम अन्ना के महिमामंडन करने वाला ज्यादा है। चंद माह पहले ही बाबा रामदेव को अश्लीलता के साथ ठोंककर ठग कहने वाले दिग्विजय सिंह की अन्ना के आगे घिग्घी बंधी है। कांग्रेस पार्टी के नेताओं की काटो तो खून नहीं वाली हालत बनी है।
गांधी परिवार के नुमांइदे की गैर मौजूदगी में कांग्रेस पार्टी ने अन्ना हजारे के साथ भी बाबा रामदेव सरीखा आचरण करने का एक फैसला लिया गया था। जिसके आधार पर स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक प्रेस कांफ्रेंस में अन्ना हजारे पर सीधा हमला किया गया। तूं-तडाक की भाषा में बात की गई। अन्ना हजारे को तिरोहित किया गया। उनको भ्रष्ट बताया गया। इससे कांग्रेस की भविष्य की चिंता करने वालों चौकना लाजिमी था, सो बीमार मां की बीच में ही तामीरदारी छोड़ आए राहुल गांधी ने हालात की नज़ाकत को भांपा और 24 अकबर रोड पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुई बैठक में एक दिन पहले हुए पार्टी के फैसले को पलट दिया। कांग्रेस नेताओं को अन्ना हजारे के साथ बेहतर आचार विचार के साथ पेश आने की हिदायत दे दी गई। लेकिन जो नुकसान होना था वो मनीष तिवारी के बयान से हो गई होगी। अब नुकसान के हर्जाने की कीमत क्या होने वाली है इसका अंदाजा लगाना बाकी है।
अनशन से पहले शांति व्यवस्था भंग करने के इल्जाम में घर से उठाकर गिरफ्तार कर लिए गए अन्ना हजारे का आंदोलन परवान चढ़ रहा है। अन्ना ने रिकार्डेड बयान में देश भर के लोगों से आठ दिनों की आहुति मांगी है। मतलब आने वाले आठ दिनों तक कांग्रेस पर ग्रह मंडराता रहेगा। यह ग्रह इस दरम्यान ही सरकार की बलि लेता है। या फिर अनशनकारियों की मांग के आगे सरकार झुकने के लिए मजबूर होती है। यह देखना होगा।
मुश्किल इसलिए भी बड़ी है कि अन्ना के विरोध से निपटने के लिए अबतक आजमा गया हर हथकंडा सरकार के खिलाफ जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि अन्ना को काबू में करने का कोई प्रभावी सूत्र बता दे और कांग्रेस पार्टी से मनमर्जी का इनाम ले जाए। कांग्रेस के इस बहकावे में फंसने वाले लालू यादव फिलहाल अकेले विपक्षी नेता हैं। जिन्हों ने खुले तौर पर अन्ना के आंदोलन को संसदीय व्यवस्था के खिलाफ करार दिया है। जबकि अन्ना पर कार्रवाई से बिफरे मुलायम सिंह ने तो सरकार को दो टूक सलाह दी है कि वो अन्ना को तत्काल रिहा करे और गिरफ्तारी के लिए सरकार माफी मांग ले। मुलायम की इस तल्खी ने राहुल गांधी के मिशन उत्तर प्रदेश को जबरदस्त झटका दिया है। मुलायम के बयान के बाद अब सरकार के लिए इस सलाह पर अमल करना राजनीतिक रूप से आसान नहीं रहा।
आंध्र प्रदेश में खोई जमीन की तलाश में लगे चंद्रबाबू नायडू ने अन्ना को साथ देने का एलान कर दिया है। आंध्र प्रदेश से ही कांग्रेस के साथ पार्टी का विलय करने वाले अभिनेता चिरंजीवी ने भविष्य की चिंता में कांग्रेस पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी है। राजनीति के कई शूरमा और सीपीएम तथा सीपीआई जैसी वामपंथी दल प्रतिपक्षी बीजेपी से अछूतपन के भय को खत्म करने के लिए तैयार नजर आ रही हैं। अन्ना के आंदोलन की चपेट में सरकार को फंसा देख बीजेपी पहले से मुस्कुरा रही थी। अब हालात ने बीजेपी को रेस में आगे खड़ा कर दिया है। यही बात कांग्रेस पार्टी और सरकार को खाए जा रही है।
इतिहास गवाह है कि भारतीय लोकतंत्र में जब कभी दक्षिणपंथी बीजेपी के साथ वामपंथियों और समाजवादियों के खड़े होने की हालात पैदा हुई है कांग्रेस पार्टी का बैंड बज गया है। चाहे 1974 के इमरजेंसी का दौर हो या फिर वीपी सिंह के बोफोर्स को लेकर छेड़ा गया कांग्रेस विरोधी अभियान। कांग्रेस सत्ता से इसलिए उखाड फेंकी गई कि वामपंथी और दक्षिणपंथी ताकतों के कंधे से कंधे मिलाकर चलने का फैसला कर लिया। ऐसी जब कभी नौबत आई है कांग्रेस का नाश हो गया। यह अलग बात है कि महज सत्ता परिवर्तन के लिए बनी नई व्यवस्था लंबे समय तक काम नहीं कर पाई और कांग्रेस वापस सत्ता में लौट आई। इसलिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए इस बार जो बातें की जा रही है वो आगे प्रभावी रहेंगी, इसका इंतजाम अन्ना हजारे के सर्मथकों को अभी से करना होगा।
अन्ना के समर्थक लाख कहें कि वो सरकार के बदलने के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था बदलने के लिए अभियान चला रहे हैं। लेकिन सच है कि सरकार के नुकसान से किसी न किसी को फायदा होगा है। फायदे के लिए ही विपक्ष की ओर से मौजूदा हालत की तुलना इमरजेंसी के दौर से की जा रही है। पर तुलना करने वाले भूल रहे हैं कि तब जेपी का अभियान राजनीतिक दलों की मदद से छेड़ा गया था। इसबार का अभियान राजनीतिक दलों को अलग रखकर छेड़ा गया है। अन्ना के मंचों पर राजनीतिक दलों के नेताओं को आने से रोका गया है। लेकिन दीगर है कि अब राजनीतिक दल गरम तवे पर रोटी सेंकने के लिए अन्ना के समर्थन में सामने आ रहे हैं। जबकि इमरजेंसी के खिलाफ उठे आंदोलन से इतर इसबार दावा राजनीतिक तंत्र की वजह से पनपने भ्रष्टाचार को खत्म करने का किया जा रहा है। गैर राजनीतिक व्यवस्था को दुरूस्त करने का आह्वान किया जा रहा है। चूंकि सत्ता में कांग्रेस है इसलिए कांग्रेस विरोधी लहर पैदा हो रही है और फिर से भरोसा दिया जाने लगा है कि कांग्रेस रूपी व्यवस्था के बदलने से ही राजनीतिक सामाजिक हालात बदल जाएंगे।
अन्ना हजारे का अभियान पूर्ववर्ती अभियान से इसलिए भी अलग लग रहा है कि इससे एक सामाजिक बदलाव की लहर पैदा होती दिख रही है। एक ऐसी लहर जिससे अन्ना हजारे ने अपने गांव रालेगण सिद्धि के आसपास कर दिखाया है। ईमानदारी और मेहनत के प्रति एक सूचिता पैदा की है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बगावत करने की ताकत पैदा की है। अन्ना के अभियान से किसी एक राजनीतिक दल को सीधा फायदा होता नजर नहीं आ रहा। यह अलग बात है कि सत्तारूढ कांग्रेस को होने वाले किसी नुकसान से विपक्ष को तात्कालिक फायदा राजनीतिक विपक्षियों को हो रहा है। राजनीतिक बदलाव के बजाय बात सामाजिक बदलाव की हो रही है। उस समाज में बदलाव करने की चेष्टा हो रही है जिसमें भ्रष्टाचार ने पांव जमा रखा है। भौतिक संसाधनों के क्रेज में भ्रष्टाचार करने के लिए लोग मजबूर हुए जा रहे हैं। मेहनतकशों और इमानदारों के प्रति संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों का अनादर होने लगा है। कुल मिलाकर अन्ना के समर्थकों के अंदर राष्ट्र निर्माण की कसमासहट ज्यादा दिख रही है।
अन्ना सफल अभियानों को अंजाम देने के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी तारीख, समय और मीडिया के इस्तेमाल को लेकर अन्ना के शानदार रणनीति का इजहार हो रहा है। पंद्रह अगस्त से ही नाफरमानी की शुरुआत हो गई। 65 सालों की आजादी में पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के लोगों ने सुबह झंडोतोलन के वक्त प्रधानमंत्री को सुनने के बजाय शाम किसी और के संबोधन को सुनने में ज्यादा दिलचस्पी ली। अन्ना हजारे के संबोधन को ज्यादा महत्व दिया गया। प्रधानमंत्री के राष्ट्रनिर्माण के संकल्प को संदेह भरी नजरों से देखा गया और अनशन पर आमादा शख्स पर ज्यादा यकीन किया गया।
उनके आह्वान पर भौतिकवादी व्यवस्था की सुख सुविधा में डूबी आबादी ने भी शाम को घंटे भर तक बिजली गुल कर दी गई। अन्ना के अभियान से कई लोगों को लगने लगा है कि बीते सात सालों से ईमानदार शख्स के तौर पर सत्ता शीर्ष पर कायम मनमोहन सिंह का असली चेहरा ईमानदारी वाला नहीं रहा। अन्ना की गिरफ्तारी को लेकर संसद में बबाल हो रहा है। सरकार को सूझ नहीं रहा कि तेजी से फैल रहे विरोध के वाइरस को आखिर कैसे कम किया जाए? प्रदर्शनों से कैसे निपटा जाए? नाफरमानी पर आमादा लोगों का क्या किया जाए? देखना दिलचस्प होगा कि अन्ना के अनशन की ताकत का असर कितना व्यापक रहता है।
लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.


