भारत के राष्ट्रपति जिसके पास लोग क्षमा याचिका व जीवन दान के लिए फाइले लगाते हैं और गुहार करते हैं ताकि वो और जी सकें, लेकिन वहीं जब उन्हीं राष्ट्रपति से सरकारी तंत्र से थक हार कर कोई मौत के लिए गुहार लगाये तो आप क्या कहेंगे?जी हां, यह हकीकत है जनपद गाजीपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के ड्राइवर जिनकी पत्नी की मौत एक सरकारी डाक्टर के प्राइवेट नर्सिंग पर उसके लापरवाही से हो गया। बावजूद इसके उसे आज तक न्याय नहीं मिला तब वो सरकारी कर्मी अपने ही विभाग की उपेक्षा से त्रस्त होकर राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के यहां मौत के लिए पत्र लिखा है।
जनपद गाजीपुर के जिला अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी के ड्राइवर के पद पर तैनात पारसनाथ तिवारी जिनकी पत्नी की मौत जनपद मऊ के
जिला अस्पताल में तैनात डा. एके मिश्रा के प्राइवेट क्लीनीक, जो जनपद के ही तुलसीसागर मुहल्ले में है, के लापरवाही भरे ईलाज से मौत हो गई और मौत से पूर्व पत्नी की हालत खराब होने पर निजी चिकित्सक के यहां से लाकर जिला अस्पताल में ईलाज कराने के लिए भर्ती किया, लेकिन डाक्टरों ने जब उसकी हालत देखी तो बताया कि इसकी हालत इसलिए खराब है क्योंकि दवा रियेक्शन कर चुकी है। डाक्टर ने उसे वाराणसी ले जाने की बात कही जिसके बाद वो वाराणसी लेकर गये, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गयी। जिसके बाद इन्होंने अपनी पत्नी का दाह संस्कार करने के पश्चात इस डाक्टर के खिलाफ कारवाई और उसका निजी क्लीनीक बन्द करवाने के लिए अपने सभी आलाधिकारियों को पत्र लिखने के साथ ही जनसूचना के तहत भी लिखा पढ़ी की।
जिस पर एक जांच गठित किया गया लेकिन उसमें उस डाक्टर ने अपनी पहुंच व रसूख के दम पर अपने बीमार पिता की देख रेख के लिए जनपद आने की बात कह उक्त जांच को नोटों के दम पर बन्द करा दिया, लेकिन अपने बुलन्द हौसले के चलते उक्त ड्राइवर ने यहीं हार नहीं माना बल्कि आगे भी कार्रवाई करता रहा और तो और जिलाधिकारी से भी गुहार लगाया, लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला। अन्तत: वह अपने ही सरकारी तन्त्र से हार गया और अब वो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेज कर गुहार लगाई है कि यदि उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया गया तो जलालत भरी जिन्दगी जीने से बेहतर है कि वो मौत को गले लगा ले।
उस सरकारी कर्मी के साथ इतना ही नहीं किया गया बल्कि जब वो अपने पुत्र के साथ जनपद के दौरे पर पिछले माह आये विज्ञान व प्रौद्योगिकी सचिव रजनीश आहूजा, जब जिला अस्पताल पहुंचे थे तो वो उनसे मिलकर अपनी आप बीती से सम्बन्धित पत्र व कारवाई के लिए पत्रक देना चाहा तो उससे पूर्व ही जिलाधिकारी की उन पर नजर पड़ गई और उनके आदेश पर उन्हें बिना किसी कसूर के कोतवाली के हवालात में उनके युवा पुत्र के साथ डाल दिया गया। सचिव के जाने के बाद रिहा कर दिया गया। जब पारसनाथ के द्वारा राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के यहां अपनी मौत से सम्बन्धित पत्र भेजने के साथ ही वो पत्र मुख्य चिकित्सा अधिकारी व जिलाधिकारी के पास भी भेजा गया है। बावजूद इसके मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने ऐसे किसी भी पत्र को मिलने से इनकार किया और बताया कि अगर पत्र मिला तो वो उस पर जरूर कारवाई करेंगे। जब एक सरकारी कर्मी का उसी के विभाग के द्वारा उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है तो आम आदमी की क्या बिसात।
गाजीपुर से अनिल कुमार की रिपोर्ट.


