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अब कांग्रेसियों से जूझ रहे है राहुल गांधी

लखनऊ। राहुल गांधी के दो दिन के दौरे के बावजूद कांग्रेस को पूर्वांचल में कोई बड़ी राजनैतिक जमीन मिलती नजर नही आ रही है। राहुल गांधी लोगों को प्रभावित कर रहे हैं और लोगों को उनसे उम्मीद भी है पर पिछले लोकसभा चुनाव में कई सांसद चुने जाने के बावजूद कई जिलों में पार्टी संगठन हवा में है। राहुल गांधी कबीर के मगहर से शुरुआत करके इस अंचल के ग़रीबों, बुनकरों और अल्पसंख्यकों को कांग्रेस से जोड़ने की ठोस कवायद जरुर करते है, पर इस कवायद को यहां के कांग्रेसी वोट में बदल पाएंगे इसपर जल्दी कोई यकीन नहीं करता।

लखनऊ। राहुल गांधी के दो दिन के दौरे के बावजूद कांग्रेस को पूर्वांचल में कोई बड़ी राजनैतिक जमीन मिलती नजर नही आ रही है। राहुल गांधी लोगों को प्रभावित कर रहे हैं और लोगों को उनसे उम्मीद भी है पर पिछले लोकसभा चुनाव में कई सांसद चुने जाने के बावजूद कई जिलों में पार्टी संगठन हवा में है। राहुल गांधी कबीर के मगहर से शुरुआत करके इस अंचल के ग़रीबों, बुनकरों और अल्पसंख्यकों को कांग्रेस से जोड़ने की ठोस कवायद जरुर करते है, पर इस कवायद को यहां के कांग्रेसी वोट में बदल पाएंगे इसपर जल्दी कोई यकीन नहीं करता।
एक राहुल गांधी ने इस अंचल में देर से शुरुआत की दूसरे जो सांसद चुने गए वे दिल्ली में ज्यादा समय देते हैं पूर्वांचल में कम, यह एक आम शिकायत है। खांटी समाजवादी बेनी वर्मा से लेकर आरपीएन सिंह तक इस क्षेत्र से मंत्री हैं पर उन्हीं की अपने क्षेत्र में मौजूदगी को लेकर सवाल उठते रहते हैं, वे आसपास की सीटों पर कांग्रेस को कितना फायदा पहुचाएंगे यह समझा जा सकता है। महाराजगंज से हर्षवर्धन हो या फिर फैजाबाद से निर्मल खत्री इनका समय भी दिल्ली में ज्यादा गुजरता है क्षेत्र में कम। डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल की भी स्थिति कोई बहुत बेहतर नही है पर बस्ती में बड़ी रैली कर अपनी ताकत का प्रदर्शन जरुर कर चुके हैं। ऐसे में राहुल गांधी चाहे मोटर साइकिल से चले या नाव से नदी पार कर गांव-गांव लोगों की नब्ज टटोले आगामी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ज्यादा सफलता हासिल कर पाएगी यह लगता नहीं है। राहुल गांधी ने दो दिन में जगह-जगह कांग्रेसियों की क्लास ली और यह अनुभव भी किया कि इन इलाकों में पार्टी की क्या स्थिति है।

राहुल गांधी इस दौरे में ज्यादातर उन जगहों पर गए जहाँ से कांग्रेस का कोई सांसद नही है। ऐसे में वे भी बहुत ज्यादा उम्मीद तो नहीं कर रहे होंगे पर हर जगह वे जब कांग्रेसी नेताओं से मिले तो पहले उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं की जानकारी ली और फिर यह भी पूछा कि इन समस्याओं को लेकर क्या-क्या कदम उठाए गए, कोई आंदोलन किया गया या नहीं। एक बैठक में जब कांग्रेसी नेता ने बताया कि बरसात के बाद आंदोलन होगा तो राहुल गांधी हैरान थे। राहुल गांधी का यह दौरा पूर्वांचल के चार जिलों में उन नौजवान सम्मेलनों में शिरकत करना था, जिनका मकसद पार्टी संगठन के चुनाव के लिए नेतृत्व की नई कतार तैयार करना था। पर ऐसे हर सम्मलेन से पहले वे पार्टी संगठन के लोगों से मिलते और लंबी चर्चा करते। वे यह जानना चाहते थे कि ब्लाक से लेकर जिले तक में किसी समस्या को लेकर पार्टी के कार्यकर्त्ता किस तरह काम करते हैं, जिससे लोग कांग्रेस से जुड़े। इसलिए वे हर जगह कांग्रेस नेताओं से समस्या और उसके निदान की जानकारी लेते।

कांग्रेस में संगठन के स्तर पर जवाबदेही की परम्परा ख़त्म हो चुकी है। राहुल गांधी इसे फिर से शुरू कर रहे है। साथ ही पहली बार कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व जिला स्तर पर पार्टी को लोगों को जन आंदोलन के लिए तैयार करता नजर आ रहा है। इसका असर तो पड़ेगा पर कितना यह कहा नहीं जा सकता। गोरखपुर के एक कार्यकर्त्ता गोविंद राम ने कहा – राहुल गांधी अगर छह महीने पहले यह काम शुरू किए होते और अपने मंत्री- सांसदों को भी जिलों में भेज देते तो आज माहौल बदल जाता। पार्टी के आधा दर्जन सांसद और मंत्री हैं पर कभी भी गोरखपुर में कांग्रेस कोई बड़ा आंदोलन नहीं कर पाई। न ही आसपास के जिलों में पार्टी कोई उप चुनाव जीत पाई है। यहाँ कांग्रेस के जिला संगठन में लाठी के जोर पर चुनाव होता है और गुटबाजी ऐसी कि कांग्रेस से कोई लड़े तो असंतुष्ट कांग्रेसी ही उसे हरा देंगे। आरपीएन मंत्री बनने के बाद दिखते नहीं तो हर्षवर्धन अब दिल्ली वाले हैं और पाल साहब अपने परिवार की चिंता ज्यादा करते हैं। ऐसे में कांग्रेस का क्या भविष्य होगा।

कमोवेश कई और जिलों की भी यही कहानी है। राहुल गांधी नौजवान हैं। गांव-गांव तक जा रहे है पर पार्टी संगठन एक दो दौरों से मजबूत होने वाला नहीं है। इसके आलावा राजनैतिक मोर्चों पर भी कम चुनौतियां नहीं है। राजनैतिक टीकाकार वीरेंद्र नाथ भट्ट ने कहा – राहुल गांधी जगह-जगह राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के चार सौ करोड़ के घोटाले के लिए मायावती सरकार को गिरा देने की बात करते हैं। पर हजारों करोड़ के स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद केंद्र सरकार की जवाबदेही पर बात नहीं करते। इससे उनकी राजनीति पर सवाल तो उठता ही है। फिलहाल तो उन्हें सालों से आंदोलन से कटे कांग्रेसियों को सड़क पर उतरने के लिए तैयार करना होगा। साभार : जनसत्‍ता

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