यह तस्वीर पटना आर्ट कॉलेज के पासआउट मूर्तिकार वीरचन्द्र की है. वीरचन्द्र की यह तस्वीर रुबन इमरजेंसी में इलाज के दौरान की है. ७ सितम्बर की रात आर्ट कॉलेज परिसर में उनपर तब जानलेवा हमला हुआ, जब वे अपने दोस्त दीपंकर कर्मकार के साथ एक कृति (म्यूरल) को पूरा करने में लगे थे. दीपंकर बंगाल के मालदह जिला के उन विस्थापित परिवार से हैं, जिनका घर-बार गंगा की पेट में समा गया. दीपंकर पटना आर्ट कॉलेज के ७ नम्बर कमरे में रहते थे. वीरचन्द्र पर हमले की पटकथा एक असली-नकली संन्यासी ने तैयार की. कला के क्षेत्र का यह कथित संन्यासी हमले से आधे घंटे पहले आर्ट कॉलेज हॉस्टल में लड़कों के बीच रैगिंग के परंपरागत अधिकार का व्याख्यान बांच रहा था.
प्रथम वर्ष की एक छात्रा ने ७ सितम्बर को बुद्धा कालोनी थाने में दर्ज प्राथमिकी (१४०\७.९.११) में रैगिग के विरुद्ध जिन छात्रों को अभियुक्त बनाया, उन छात्रों के बचाव में होस्टल के छात्रों के साथ असली-नकली संन्यासी ने उत्तेजक वक्तव्य दिए. तथाकथित संन्यासी ने साफ कहा कि इस प्राथमिकी के पीछे वीरचन्द्र का हाथ है. आप सब एक होकर वीरचन्द्र से निबट लो, हम सारे केस मुकदमे देख लेंगे. वीरचन्द्र के ऊपर जानलेवा हमले में रैगिंग के सभी नामजद अभियुक्त शामिल थे. हॉस्टल के ज्यादातर छात्र मूकदर्शक थे. इन्हें रैगिंग तुम्हारा अधिकार है, ऐसा पाठ पढाया गया था. जब वीरचन्द्र बेहोश होकर बेसुध हो गए, मुख से खून की उलटी हुई तो कुछ छात्रों ने वीर को कॉलेज परिसर से जिन्दा बाहर निकलने में मदद की.
वीर जब इलाज के लिए पीएमसीएच में भर्ती थे तो बुद्धा कालोनी की पुलिस वीर नामक गुंडे को ढूंढने आर्ट कॉलेज आयी थी. वीर को पीएमसीएच से बेहतर इलाज के बिना छोड़ दिया गया. वीर को साथ लेकर ८ सितम्बर की सुबह जब उनके साथी बुद्धा कालोनी थाने पहुंचे तो पुलिस यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि वीर के ऊपर जानलेवा हमला हुआ है. जब वीर अपना बयान लिखते हुए बेहोश हो गए तो पुलिस ने उन्हें फिर पीएमसीएच पहुँचाया. पीएमसीएच इमरजेंसी वार्ड में जब ९ सितम्बर की दोपहर मीडिया के बंधु पहुँचने लगे तो आनन-फानन में वीर को डिस्चार्ज कर दिया गया. १० की शाम जब हसन इमाम, अभ्युदय भाई के साथ हम जन उनके कमरे पर पहुंचे तो वीर बेहोश पड़े थे. वीर को साँस लेने में बेहद तकलीफ हो रही थी. उनके मुख और नाक में अपने मुख से साँस भरते हुए एम्बुलेंस से रुबन इमरजेंसी के आईसीयू में तत्काल भर्ती कराया गया. वीर के पास बेचने के लिए बकरी या हमारे पास कोई सोने की घडी तो नहीं थी. हम डाक्टर सत्यजीत के कायल हैं, जिनने अपने बूते वीरचन्द्र के इलाज की जिम्मेवारी स्वीकारी.
वीरचन्द्र फिलवक्त रुबन इमरजेंसी से बाहर होकर किसी गुप्त ठिकाने पर तन कर खड़ा होने की कोशिश में स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं. मै पिछले 10 दिनों से वीर के साथ अटेंडेंट की भूमिका में लगा हूँ. वीरचन्द्र पर हमले की प्राथमिकी १४१\८.९.११ पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. हमलावर सुरक्षित घूम रहे हैं और हमले का शिकार हमलावरों के दहशत में गुप्त ठिकाने में छुपा है. यह किस तरह का सुशाशन है, किस तरह का अँधा कानून है भाई साहब. वीरचन्द्र आर्ट कॉलेज बचाओ संघर्ष आन्दोलन की रीढ़ रहे हैं. जाहिर है कि यह आन्दोलन सरकार के उस निर्णय के विरुद्ध शुरू हुआ, जिस में आर्ट कॉलेज को आर्यभट ज्ञान विश्विद्यालय में मिलाने की घोषणा की गयी थी. सब जानते हैं कि आर्ट कॉलेज को आर्यभट में मिलाने और स्वपोषित करने का प्रस्ताव उस कथित संन्यासी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रधान सचिव अंजनी सिंह को दिया था, जो वीरचन्द्र पर जानलेवा हमले का मास्टर माइंड है.
जानलेवा हमले के अभियुक्त सरकारी परियोजना “किलकारी” में दो लाख के सरकारी ठेके पर किसी कलाकृति को अंजाम देने में लगा है, जो आर्ट कॉलेज आन्दोलन से अलग सरकारी खेमे में खड़ा होगा, उसे लाखों-लाख का सरकारी ठेका मिलेगा और सरकार के बड़े साहब हर परिस्थिति में उनकी हिफाजत करेंगे. आप समझने की कोशिश करिए, वीरचन्द्र के हमलावरों को कौन बचा रहा है…? वीर को बेहतर इलाज के बिना सरकार के सबसे बेहतर अस्पताल से क्यों डिस्चार्ज कर दिया गया…? जो हमलावरों के साथ नहीं हैं, वे वीरचन्द्र को न्याय दिलाने के संघर्ष में खड़े हों. पटना के रंगमंचों की २ दिन पहले हुई बैठक में वीरचन्द्र पर हुए हमले की तीव्र भर्त्सना की गयी है और अनीश अंकुर नामक रंगकर्मी का सामाजिक वहिष्कार कर दिया गया है.
पटना से पुष्पराज की रिपोर्ट.


