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अब पत्रकारिता के लिए सरोकार नहीं सनसनी की जरूरत है

: एक पत्रकार की व्यथा : फोन की घंटी बजती है और बॉस पूछते हैं कोई बड़ी खबर बताओ… मैं कहता हूं इधर से.. जी सर एक बुजुर्ग को परिवार के लोगों ने बेसहारा छोड़ दिया है … बॉस पूछते है बुजुर्ग की प्रो फाइल क्या है.. मैंने कहा जी रेलवे में काम करता बुजुर्ग फोर्थ क्लास में था… अब रिटायर हो गया है… दो बेटे हैं दोनों रेलवे में फोर्थ क्लास में ही हैं… दोनों बेटों की शादी हो चुकी है… बुजर्ग बाप को कोई रखना नहीं चाहता… उधर फोन से आवज आयी जाने दो एंकर विजुअल चल जायेगा प्रोफाइल लो है… लेकिन मैं जब अपने घर से पत्रकारिता के लिये निकला था.. तो मुझे समाज का हर वो मुद्दा खबर लगता था, जिसका इन्सान से सरोकार हो लेकिन दुःख इस बात का है कि अब शायद पत्रकारिता का स्वरुप बदल गया है, जिसे बस ग्लेमर चाहिए!

: एक पत्रकार की व्यथा : फोन की घंटी बजती है और बॉस पूछते हैं कोई बड़ी खबर बताओ… मैं कहता हूं इधर से.. जी सर एक बुजुर्ग को परिवार के लोगों ने बेसहारा छोड़ दिया है … बॉस पूछते है बुजुर्ग की प्रो फाइल क्या है.. मैंने कहा जी रेलवे में काम करता बुजुर्ग फोर्थ क्लास में था… अब रिटायर हो गया है… दो बेटे हैं दोनों रेलवे में फोर्थ क्लास में ही हैं… दोनों बेटों की शादी हो चुकी है… बुजर्ग बाप को कोई रखना नहीं चाहता… उधर फोन से आवज आयी जाने दो एंकर विजुअल चल जायेगा प्रोफाइल लो है… लेकिन मैं जब अपने घर से पत्रकारिता के लिये निकला था.. तो मुझे समाज का हर वो मुद्दा खबर लगता था, जिसका इन्सान से सरोकार हो लेकिन दुःख इस बात का है कि अब शायद पत्रकारिता का स्वरुप बदल गया है, जिसे बस ग्लेमर चाहिए!

मैंने सुना था कि पत्रकारिता एक जुनून की तरह होता है, जिसमें समाज का अच्छा और बुरा दोनों पहलू समाहित होता है… लेकिन आज की पत्रकारिता तो शायद चकाचौंध भरी दुनिया की पेज थ्री की कहानियों में सिमट कर रह गयी है! अख़बार की पत्रकारिता हो या फिर टेलीविजन की… बॉस को वही खबरें चाहिए जो हाई प्रोफाइल हो… क्योंकि उनका दर्शक और पाठक भी वही वर्ग है…. लेकिन उस वर्ग को समाज में कौन आगे लायेगा, जिसकों दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है…. सोचा था पत्रकार बनकर भूखे-नंगे-गरीबों के दर्द को समाज के सामने रखूँगा.. लेकिन आफिस के एसी कमरे में बैठने वाले बॉस को न ऐसों की तस्वीरें चाहिए न ही खबरें…. आज़ादी से पहले भी पत्रकारिता होती थी लोग छुप कर पत्रों के माध्यम से समाज को आज़ाद कराने की सोचते थे…. लोगों को एक मंच पर लाने को दर्द को बयां करते थे…… मगर आज न पत्रकार स्वतंत्रता अपनी बात लिख सकता है और ना ही टेलीविजन के लायक खबर ही बना सकता है।

मुझे आज भी वो दिन याद है… जब मैं शहर से ३५ किलोमीटर दूर…. ज्येष्‍ठ की दुपहरिया में एक ऐसी लड़की की स्टोरी करने निकला था… जिसके दोनों हाथ हादसे में कट चुके थे और वो इंटर के एक्जाम में मैथ साइड से ६८ प्रतिशत नंबरों से पास हुई थी…. मेरा मकसद था जो लोग अपने जीवन में परेशानियों से हार मान जाते हैं…  वो लोग रानी से प्रेरणा लेंगे और जिंदगी से लड़ना सीखेंगे ….मगर अफ़सोस कि स्टोरी पूरी कर अपने नोएडा आफिस भेज दिया.. पर उसका कोई रिस्पांस नहीं आया… क्योंकि टेलीविजन पर उन दिनों राखी सावंत के जलवे थे…. राजा चौधरी बिग बॉस के घर से निकल कर रोज शराब के नशे में हंगामा कर रहे थे… ये देश की उस समय की सबसे बड़ी खबरें थी… जिसपर टेलीविजन आधे-आधे घंटे का स्पेशल बनाता था! यानी बॉस को चाहिए पति-पत्नी का विवाद सड़कों पर… किसान को आन्दोलन के समय गोली लगते का लाइव शाट्स या फिर किसी अंध विश्‍वास की कहानी… जिस पर विश्‍वास भी नहीं किया जा सकता… मगर उस रानी के जज्बे को आज भी सलाम है… जिसने प्रदेश में तो अपना नाम नहीं किया… टीवी पर वो खबर न बन सकी… लेकिन अपने गाँव के लोगों के लिये मिसाल बन गयी! फ़िलहाल अब ट्रेंड बदल चुका है टीवी पत्रकारिता में रोज एक दिन पहले ही ख़बरों की प्लानिंग करनी होती है… प्लान न देने पर बॉस नाराज… कई फोन भी आफिस से आ सकते हैं कि आप काम ठीक से नही कर रहे हैं।

सबसे ज्यादा समस्या इन दिनों स्ट्रिंगरों की है… जो दिहाड़ी के मजदूर से भी बतदर हो गए हैं…. एक स्ट्रिंगर चैनल की आत्मा होता है… मगर वो दर्जनों अच्छी खबरें कर के दे दे चैनल को इससे मतलब नहीं … पैसा देते वक्त तो मानो मालिक की कमर ही टूट जाती है… और मिलता भी है तो चंद रुपए.. वो भी कई महीनों बाद… ऐसे में उस स्ट्रिंगर से कैसी उम्मीद जिसको परिवार तक चलाने के पैसे नहीं मिलते! मगर आफिस के एसी केबिन बैठा बॉस उस दर्द को क्या समझ पायेगा… जिसे लाखों रुपए तनख्वाह मिलता है….उ से इससे क्या मतलब कि उसका स्ट्रिंगर धूप में जलता है… बारिस में भीगता है तब जा के अख़बार और टेलीविजन के लिये खबरें निकाल पाता है… एक और बड़ी विकट समस्या है स्ट्रिंगर या रिपोर्टर के साथ… उसकी नौकरी २४ गुणे ७ की होती है… जब भी खबर आये घर से निकाल जाओ… मगर लाखों रुपए तनख्वाह लेने वाला बॉस क्या जब घर पहुंच जाता है तो वो दुबारा उस दिन आफिस आता है? आज की पत्रकारिता उस फिल्म की तरह हो गयी है… जिसमें प्रोफाइल, ग्लैमर, ट्विस्ट और कुछ एक्शन अगर हो जाये तो स्टोरी हिट …और चैनल की टीआरपी की बल्ले बल्ले… बॉस भी खुश …आज मीडिया में कोई भी अधिकारी नेता अपना बयान देने से बचता है और हर पत्रकार को हेय की दृष्टि से देखता है… क्योकि रिपोर्टर खबर कुछ भेजता है… प्रस्तुत किसी और तरीके से कर दिया जाता है… इस वर्ग पर दबाव बनाने का यही तरीका नहीं है… समाज के उन पहलुओं को भी दर्शाया जा सकता है… जिससे दिल पसीज आये …… फ़िलहाल कैमरे की नजर ऐसे ही वारदातों को तलाशती है जिससे सनसनी फ़ैल सके ….मगर ऐसे नज़रों को क्यों नहीं जिसमें एक मुफलिस सड़क किनारे अर्ध नग्न लेटा हो और उसके पास से तमाम लग्जरी गाड़िया निकाल जाती हैं… अधिकारीयों की गाड़िया हूटर बजाते निकाल जाती हैं….. ऐसे बेदर्द आखिर हमारे लिये खबर क्यों नही हैं?

क्यों सलमान खान और शाहरुख़ खान का विवाद हमारे लिये खबर है? क्यों मल्लिका का रोमांस हमारे लिये खबर है? क्यों लो प्रोफाइल बाप, बुजुर्ग और सड़क किनारे बुरे हालत से जूझते इन्सान हमारे लिये खबर नहीं हैं… आज की पत्रकारिता का रंग और रूप दोनों बदल चुका है… क्योंकि ऊपर बैठे समाज के मूर्धन्य पत्रकार पायजामा कुर्ता छोड़ कोट और टाई पहनने लगे हैं और कलम की जगह कम्‍प्‍यूटर का इस्तेमाल करने लगे हैं… तो सोच बदलना भी लाजमी है …….मगर इतना भी नहीं बदलना चाहिए कि कलम का सिपाही कहे जाने वाले पत्रकार …पत्रकार ही न कहलायें..  समाज उन्हें झुठला दे! क्योंकि पत्रकारिता तो समाज का वो आईना है जो शासन तंत्र के आगे सोचने को एक मंच प्रदान करता है ……जरुरत भर है अपनी सोच को बदलने की नहीं तो समय पत्रकारों को पत्रकरिता से दूर कर देगा और आने वाले समय में पत्रकार के रूप में रह जायेंगे ब्लेकमेलर …… ऐसे में पत्रकारिता कहीं खो जाएगी, जिसे ढूंढना भी मुश्किल हो जायगा!

लेखक महेंद्र प्रजापति चंदौली जिले में टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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