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अब लालबत्‍ती की रार : भ्रष्‍टों को साधना बहुगुणा के सामने सबसे बड़ी चुनौती

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सामने अब लालबत्ती के दीवानों (ओदा पाने वाले) तथा भ्रष्ट नौकरशाही को साधना सबसे बड़ी चुनौती है. बहुगुणा के करीबी सूत्रों की माने तो तिवारी सरकार व निशंक सरकार में स्वयंभू सलाहकारों की भूमिका निभाने वाले कई महानुभाव अब बहुगुणा के इर्दगिर्द चक्कर काटने में जुट गए है. लाल बतियों के दुरुपयोग के लिए कुख्यात उत्तराखंड इस बार क्या गुल खिलाता है यह आने वाले समय में ही पता चलेगा पर लालबत्ती के दीवाने अब देहरादून व दिल्ली के चक्कर भी काटकर उस हर ठीये को तलाशने में जुटे हैं, जहां उनको उम्मीद की छोटी सी किरण भी नजर आ रही है.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सामने अब लालबत्ती के दीवानों (ओदा पाने वाले) तथा भ्रष्ट नौकरशाही को साधना सबसे बड़ी चुनौती है. बहुगुणा के करीबी सूत्रों की माने तो तिवारी सरकार व निशंक सरकार में स्वयंभू सलाहकारों की भूमिका निभाने वाले कई महानुभाव अब बहुगुणा के इर्दगिर्द चक्कर काटने में जुट गए है. लाल बतियों के दुरुपयोग के लिए कुख्यात उत्तराखंड इस बार क्या गुल खिलाता है यह आने वाले समय में ही पता चलेगा पर लालबत्ती के दीवाने अब देहरादून व दिल्ली के चक्कर भी काटकर उस हर ठीये को तलाशने में जुटे हैं, जहां उनको उम्मीद की छोटी सी किरण भी नजर आ रही है.

माननीय नारायण दत्त तिवारी जी ने लालबत्ती का जो पिटारा खोला वह अब सिमटने का नाम नहीं ले रहा है. बहुगुणा को तिवारी सरकार में हुए लालबतियों के दुरुपयोग से सबक लेना होगा. लोगों को याद है कि कैसे उत्तराखंड की संस्कृति को आगे बढ़ाने के नाम पर ओहदा पाया एक ओहदाधारी काल गर्ल रैकेट में पुलिस के हत्थे चढ़ा और फिर इस पूरे प्रकरण में उत्तराखंड के लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने एक ही गाने से कांग्रेस के ईमानदार कार्यकर्ता को भी नीचा देखने पर मजबूर कर दिया. इस पर भुवनचंद्र खंडूड़ी ने काफी हद तक अंकुश लगाने का प्रयास किया पर उनकी कुर्सी जाने के बाद निशंक सरकार में इनकी खूब बहाली हुई. कर्मठ कार्यकर्ताओं को लाल बत्तिया देना कोई बुरी बात नहीं है पर इनका योगदान सरकार की कार्यकुशलता को बढ़ाने में होना चाहिए.

निशंक सरकार के दौरान किसी अनुसूचित जाति, जनजाति व अल्पसंख्यक, मोर्चे की ओर से एक पर्चा छापा गया था, जिसमें ओदाधारियों के नाम छाप कर यह बताने की कोशिश की गयी थी कि किस प्रकार ओहदाधारियों को बनाने में पक्षपात बरता गया. इसमें जहां अनुसूचित जाति, जनजाति व अल्पसंख्यक वर्ग को उपेक्षित रखा गया वही पिछड़े व सीमान्त जिलो के कार्यकर्ताओं की भी घोर उपेक्षा की गयी. पर्चे में तथ्यों सहित समझाने का प्रयास किया गया कि निशंक व खंडूड़ी शासन में ज्यादातर ओहदे उन्होंने अपने गृह जिले के लोगों में बांटे. खैर, ये इत्‍तेफाक भी हो सकता है कि सबसे ज्यादा ओहदे इनके गृह जिले में ही आ गए और इन दोनों नेताओं को इसका भान न हो!! बहुगुणा को इन सारी बातों में तालमेल बनाकर चलना होगा और उन्हें जाति, धर्म व क्षेत्र का संतुलन देखकर ही ओहदे बांटने होंगे और जो आरोप पूर्ववर्तियों पर लग रहे हैं उनसे बचना होगा.

अभी कुछ दिन पूर्व मुख्यमंत्री बहुगुणा दिल्ली में थे. उत्तराखंड के सारे मुलाजिम नये मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में व्यस्त थे. तभी देहरादून से सचिव स्तर के महाशय का फोन आता है कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहे उनके बेटे को कुछ अखबार पहुंचा दें. यहाँ पत्रकारों की भीड़ जमा थी. कर्मचारी परेशान थे. इधर मुख्यमंत्री और उधर आला अधिकारी का फतवा..!! खैर, बताया जाता है कि यह अधिकारी चुनाव में मुख्यमंत्री खंडूड़ी के शुभचिंतकों को चुनाव जीतने के गुर बता रहे थे और अब कुर्सी पर जमे रहने के लिए कट्टर कांग्रेसी होने का राग अलाप रहा है और बहुगुणा जी के चक्कर काटने में बुरे ढंग से जुटा पड़ा है…!! बहुगुणा जी को इन सब की पहचान करनी होगी… और इन्हें दूर रखकर राज्य के सच्चे शुभ चिन्तक नौकरशाहों को तलाशना होगा….जो गरीब पहाड़ी के दर्द समझ सके…!

लेखक विजेंदे रावत वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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