क्या अमरीका पाकिस्तान पर जल्द ही हमला करने वाला है? यह सवाल पाकिस्तान के गली-कूचों और टेलीविज़न चैनलों के दफ्तरों में बहुत जोर-शोर से पूछा जा रहा है. यही नहीं पाकिस्तानी हुक्मरान भी डरे हुए हैं कि कहीं अमरीका ने और सख्ती कर दी तो पाकिस्तान के लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी. हक्कानी ग्रुप नाम के अफगान संगठन के पाकिस्तानी फौज और आईएसआई से रिश्तों के बारे में जब से अमरीकी फौज के आला अफसरों ने खुले आम बात करना शुरू कर दिया है, तब से ही पाकिस्तान में अफरा-तफरी का माहौल है. पूरे देश में जनमत का दबाव इतना ज़्यादा है कि प्रधान मंत्री युसूफ रजा गिलानी ने सर्वदलीय बैठक बुला ली है. इस बैठक में पाकिस्तानी फौज के मुखिया जनरल कयानी और आईएसआई के मुखिया जनरल शुजा पाशा भी शामिल हो रहे हैं.
अमरीका ने साफ़ कह दिया है कि हक्कानी ग्रुप ने अफगानिस्तान में अमरीकी हितों को नुकसान पहुंचाने का अभियान चला रखा है, अमरीकी ठिकानों पर लगातार हमले कर रहा है इसलिए उसको ख़त्म करना ज़रूरी है. अमरीका ने इस काम में पाकिस्तान की मदद भी माँगी है. अमरीका का यह भी आरोप है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और हक्कानी ग्रुप में गहरे ताल्लुकात हैं. अमरीका की मांग है कि आईएसआई अब हक्कानी से दोस्ती ख़त्म करे और उसे दुश्मन मानना शुरू कर दे. अमरीका के इस रवैय्ये के बाद पाकिस्तान में बहुत गुस्सा है. देश के ज़्यादातर राजनेता और ताक़तवर फौजी लाबी मानती है कि पाकिस्तान को तिल-तिल कर ख़त्म करने की अमरीकी कोशिश के चलते ही हक्कानी ग्रुप से उसके रिश्तों को मुद्दा बनाया जा रहा है. यह सच है कि हक्कानी ग्रुप से पाकिस्तान के बहुत अच्छे रिश्ते हैं लेकिन पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि अमरीका ने ही हक्क़ानी ग्रुप को पैदा किया, उसे समर्थन दिया और आर्थिक मदद भी की. अब जब हक्कानी उनके खिलाफ हो गया है तो उसको ख़त्म करने के अभियान में पाकिस्तान को इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने तो पिछले हफ्ते अमरीका में ही बार-बार बयान दिया कि हक्कानी ग्रुप अमरीका का दोस्त संगठन है, इसलिए उसको पाकिस्तान के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं है. पाकिस्तान के इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि अब तक का अमरीका का रिकार्ड रहा है कि जब दोस्त की ज़रुरत नहीं रहती तो वह उसे ख़त्म कर देता है. आखिर तालिबान और अल कायदा भी तो अमरीका की कृपा और उसके पैसे से ही पैदा हुए थे लेकिन बाद में अल कायदा अमरीका का दुश्मन नंबर एक बन गया. अल कायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ना अमरीकी विदेश नीति का मुख्य एजेंडा बन गया और अंत में पाकिस्तान जैसे दोस्त के देश में ख़ुफ़िया तरीके से घुस कर अमरीका ने ओसमा को क़त्ल किया. उसी तरह से हक्कानी ग्रुप भी अमरीका की देन है लेकिन आजकल वह उसके लिए मुसीबत बना हुआ है. अमरीकी फौज का दावा है कि अफगानिस्तान में सक्रिय अमरीका के दुश्मनों में हक्कानी ग्रुप सबसे ज्यादा ताक़तवर है.
हक्कानी ग्रुप के मौजूदा मुखिया मौलाना जलालुद्दीन हक्कानी को अमरीका ने अफगानिस्तान से सोवियत सेना को भगाने के अभियान में इस्तेमाल किया था. जलालुद्दीन हक्क़ानी का इतना दबदबा था कि अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने उन्हें व्हाईट हाउस में बतौर मेहमान आमंत्रित किया था. हक्कानी को अमरीकी खुफिया संगठन सीआईए का पूरा और खुला समर्थन रहता था. इसके अलावा हक्कानी ने पाकिस्तानी आईएसआई से भी बिरादराना ताल्लुकात कायम कर लिया. उसे सउदी अरब के बहुत सारे धनवानों से आर्थिक मदद मिलती रही. अब भी मिलती है. आजकल उसे अमरीका से मिलने वाला पैसा बंद हो गया है तो उस कमी को हक्कानी ग्रुप फिरौती वगैरह के गैरकानूनी धंधों के ज़रिये पूरा कर लेता है. जब १९९६ में तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर क़ब्ज़ा किया तो सीनियर हक्कानी को मंत्री भी बनाया गया था. अभी पिछले दिनों अफगानिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने भी हक्कानी ग्रुप के संस्थापक मौलाना जलालुद्दीन के बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी को प्रधानमंत्री पद देने की पेशकश की थी. उनको उम्मीद थी कि इस से तालिबान का आतंक कम हो जाएगा. लेकिन सिराजुद्दीन हक्कानी ने मना कर दिया.
मौलाना जलालुद्दीन हक्कानी तो अब बूढ़े हो चले हैं लेकिन उनके बेटे सिराजुद्दीन ने काम संभाल लिया है. उन्हीं की अगुवाई में करीब पंद्रह हज़ार लड़ाके काम कर रहे हैं और अफगानिस्तान में सक्रिय अमरीकी सेना के दुश्मन बने हुए हैं. हक्कानी ग्रुप आजकल अफगान और अमरीकी फौज के निशाने पर है. शायद इसीलिये उसने अपना ठिकाना पाकिस्तान सीमा के अंदर, पाक-अफगान बार्डर पर कहीं बना रखा है. इसी हक्कानी ग्रुप को ख़त्म करने में अमरीका को पाकिस्तानी मदद की ज़रुरत है लेकिन पाकिस्तान के लिए हक्कानी ग्रुप के खिलाफ युद्ध का ऐलान करना बहुत ही मुसीबत का कारण बन सकता है. सच्ची बात यह है कि हक्कानी ग्रुप आजकल पाकिस्तानी फौज और आईएसआई का गहरा दोस्त है. जहां पाकिस्तानी सेना खुले आम कुछ नहीं कर पाती वहां हक्कानी ग्रुप का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी हालत में हक्कानी ग्रुप को ख़त्म करने का मतलब यह भी होगा कि पाकिस्तानी फौज अपनी ही एक शाखा को नेस्तनाबूद करने जा रही होगी.
इस स्थिति में पाकिस्तान सरकार में हक्कानी के खिलाफ कार्रवाई करने से बचने के उपायों पर चर्चा हो रही है. पाकिस्तानी राजनीति को समझने वालों का कहना है कि अगर आज हक्कानी ग्रुप के खिलाफ काम करने के लिए पाकिस्तानी फौज़ को मजबूर कर दिया गया तो कल अमरीका यह भी कह सकता है कि आईएसआई ने बहुत सारे आतंकी काम किये हैं, इसलिए उसे भी ख़त्म कर दिया जाना चाहिए. इतने ज़बरदस्त दबाव के चलते ही प्रधान मंत्री युसूफ रजा गिलानी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है. उधर इस्लामबाद में अमरीका से रिश्ते ख़त्म होने के बाद के रिश्तों पर चर्चा के लिए बैठकें शुरू हो गयी हैं. पाकिस्तानी राजधानी में सउदी अरब और चीन के राजनयिकों से मुलाकातों का सिलसिला जारी है. राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी और विदेश सचिव सलमान बशीर ने अमरीकी राजदूत से मुलाक़ात करके कुछ रास्ता निकालने की बात शुरू कर दिया है. प्रधान मंत्री गीलानी ने चीनी उपप्रधान मंत्री मेंग जियानझू से मुलाक़ात के बाद दावा किया कि चीन ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि वह पाकिस्तान की स्वतंत्रता, अखंडता और सार्वभौमिकता का समर्थन करता है. पाकिस्तान की सरकार और फौज को डर है कि अमरीका अफगानिस्तान की तरफ से उत्तरी पाकिस्तान के उन ठिकानों पर हमला कर सकता है जहां हक्क़ानी ग्रुप का मुख्यालय है. हक्कानी ग्रुप ने अपने सारे महत्वपूर्ण ठिकाने पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान इलाके में बना रखे हैं.
पाकिस्तान को मालूम है कि अगर उसने हक्कानी के खिलाफ अमरीका की मदद करने में आनकानी की तो अमरीका हमला भी कर सकता है. पाकिस्तान में इस संभावित हमले को पाकिस्तानी ज़मीन पर किया गया हमला माना जायेगा. पाकिस्तानी हुक्मरान की घबड़ाहट इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए. समाचार एजेंसी रायटर्स के साथ बातचीत में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने साफ़ कहा कि उनका देश एक सार्वभौम देश है उनके ऊपर कोई अन्य मित्र देश हमला कैसे कर सकता है. पाकिस्तान में अब अमरीका के बाद की योजना पर काम होना शुरू हो गया है लेकिन क्या यह संभव है. सोमवार को आईएसआई के मुखिया जनरल शुजा पाशा सउदी अरब गए थे. उनकी कोशिश है सउदी अरब से मदद ली जाए लेकिन क्या सउदी अरब की हिम्मत है कि वह अमरीका को नाराज़ कर सकता है. जहां तक चीन का सवाल है वह अमरीका के दबाव में नहीं है लेकिन क्या वह पाकिस्तान जैसे
गरीब देश के लिए अमरीका से अपने व्यापारिक रिश्तों को तबाह करके उसकी सेना को रोकने की किसी पाकिस्तानी कोशिश में उसकी मदद करेगा. ऐसी हालत में अब पाकिस्तान के लिए सबसे सही और सुरक्षित रास्ता यही लगता है कि वह स्वीकार कर ले कि उसके लिए अमरीका को नाराज़ कर पाना बिलकुल संभव नहीं है और उसे अब अमरीका की प्रभुता स्वीकार कर लेनी चाहिए. पिछले साठ साल की अमरीकापरस्त विदेशनीति की यही तार्किक परिणति है.
लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्स के नेशनल ब्यूरोचीफ हैं.


