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अमिताभ बच्चन के बर्थडे में इतना डूबे हैं कि जेपी का जन्मदिन भूल गए

नई दिल्ली। देश में संपूर्ण क्रांति की अलख जगाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आज जन्मदिन है। लेकिन आज हम अमिताभ बच्चन के जन्मदिन में इतने मशगूल हैं कि हमें उस महान समाजवादी नेता की याद ही नहीं रही। जेपी का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार में सारण के सिताबदियारा में हुआ था। पटना से शुरुआती पढ़ाई करने के बाद वह शिक्षा के लिए अमेरिका भी गए, हालाकि उनके मन में भारत को आजाद देखने की लौ जल रही थी। यही वजह रही कि वह स्वदेश लौटे और स्वाधीनता आदोलन में सक्रिय हुए।

नई दिल्ली। देश में संपूर्ण क्रांति की अलख जगाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आज जन्मदिन है। लेकिन आज हम अमिताभ बच्चन के जन्मदिन में इतने मशगूल हैं कि हमें उस महान समाजवादी नेता की याद ही नहीं रही। जेपी का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार में सारण के सिताबदियारा में हुआ था। पटना से शुरुआती पढ़ाई करने के बाद वह शिक्षा के लिए अमेरिका भी गए, हालाकि उनके मन में भारत को आजाद देखने की लौ जल रही थी। यही वजह रही कि वह स्वदेश लौटे और स्वाधीनता आदोलन में सक्रिय हुए।

 

जेपी अपनी पत्‍‌नी प्रभावती के कहने पर गांधी से मिलने साबरमती आश्रम गए। यह इत्तेफाक था कि वहा उस वक्त नेहरू भी मौजूद थे। यहीं से नेहरू और जेपी के बीच नजदीकी बढ़ी। नेहरू के कहने पर जेपी काग्रेस के साथ जुड़े, हालाकि आजादी के बाद वह आचार्य विनोभा भावे से प्रभावित हुए और उनके सर्वोदय आदोलन से जुड़े। उन्होंने लंबे वक्त के लिए ग्रामीण भारत में इस आदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने आचार्य भावे के भूदान के आह्वान का पूरा समर्थन किया।

जेपी ने 1950 के दशक में ‘राज्यव्यवस्था की पुनर्रचना’ नामक एक पुस्तक लिखी। कहा जाता है कि इसी पुस्तक को आधार बनाकर नेहरू ने ‘मेहता आयोग’ का गठन किया। इससे लगता है कि सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात शायद सबसे पहले जेपी ने उठाई थी। लोकनायक के बेमिसाल राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्हें सत्ता का मोह नहीं था, शायद यही कारण है कि नेहरू की कोशिश के बावजूद वह उनके मंत्रिमंडल शामिल नहीं हुए।

जेपी कभी घोर मा‌र्क्सवादी हुआ करते थे, लेकिन महात्मा गाधी और जवाहरलाल नेहरू से मिलने एवं आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद उनकी विचारधारा में बदलाव आया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अहिंसक संघर्ष की पुरजोर पैरवी की और उनके क्रांतिकारी नेतृत्व ने 1970 के दशक में भारतीय राजनीतिक की दशा-दिशा ही बदल दी।

वरिष्ठ पत्रकार और उनके साथ लंबे समय तक जुड़े रहे रामबहादुर राय कहते हैं कि अमेरिका से पढ़ाई करने के बाद जेपी 1929 में स्वदेश लौटे। उस वक्त वह घोर मा‌र्क्सवादी हुआ करते थे। वह सशस्त्र क्रांति के जरिए अंग्रेजी सत्ता को भारत से बेदखल करना चाहते थे, हालांकि बाद में बापू और नेहरू से मिलने एवं आजादी लड़ाई में भाग लेने पर उनके इस दृष्टिकोण में बदलाव आया। राय कहते हैं कि जेपी में सत्ता के प्रति कोई मोह नहीं था। वह सत्ता में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहते थे।

1960-61 में नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने की कोशिश की, लेकिन वह तैयार नहीं हुए। जेपी ने पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में विशाल जनसमूह को संबोधित किया। यहीं उन्हें ‘लोकनायक’ की उपाधि दी गई। इसके कुछ दिनों बाद ही दिल्ली के रामलीला मैदान में उनका ऐतिहासिक भाषण हुआ। उनके इस भाषण के कुछ ही समय बाद इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया। दो साल बाद लोकनायक के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के चलते देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। जयप्रकाश मैगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित हुए और मरणोपरात उन्हें ‘भारत रत्‍‌न’ से विभूषित किया गया। जेपी ने आठ अक्टूबर, 1979 को पटना में अंतिम सांस ली।

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