वर्धा : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा व सीएनडीपी के संयुक्त तत्वावधान में परमाणु मुक्त भारत की संकल्पना-जापान एवं अन्य देशों से सबक विषय पर विवि के विमर्श द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल बिदवई ने उद्घाटन सत्र में बीज वक्तव्य देते हुए रविवार को कहा कि तथाकथित विकास के नाम पर परमाणु संयंत्र लगाए जा रहे हैं। परमाणु उर्जा से जापान में हुई तबाही का सबक लेकर हमें भी परमाणु उर्जा के खतरों से सचेत रहने की जरूरत है।
आण्विक शस्त्रीकरण और आण्विक उर्जा : एक ही सिक्के के दो पहलू विषय पर चर्चा करते हुए प्रफुल्ल बिदवई ने कहा कि सबसे बड़ा आतंकवादी हमला जापान में परमाणु बम का गिराया जाना था, जिसमें एक लाख चालीस हजार लोग मारे गए थे। चेर्नोबिल में परमाणु उर्जा से हो रहे खतरे की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि वहां 34 हजार से 95 हजार लोग मर गए। फूकूसीमा में परमाणु संयंत्र से कैंसरजनित रेडियो एक्टिव तत्व निकल रहे हैं। सब्जियां, मछली एवं पानी सब प्रदूषित हो चुका है। सब जगह जहर फैला हुआ है। परमाणु संयंत्र में हो रहे मेल्टडाउन के कारण जापान ही नहीं पूरा विश्व हिल चुका है। हिरोसीमा और फूकुसीमा में साम्य दिख रहा है कि यहां भी सन् 1945 ई.जैसी घटना याद आने लगी है।
उन्होंने कहा कि जापान में रेडिएशन से सिर्फ पहली पीढ़ी को ही नहीं अपितु दूसरी व तीसरी पीढ़ी को भी प्रभावित किया है। हमें यह विमर्श करने की जरूरत है कि परमाणु उर्जा के खतरे से आगे की पीढियों को जूझना न पड़े। कुछ रेडियो आइसोटोप्स का प्रभाव बहुत लंबे समय तक होता है। परमाणु उर्जा के विकिरण से सैकड़ों सालों तक जहर पैदा होता रहता है। प्लूटोनियम का प्रभाव 75 करोड़ साल तक बना रहता है। आज राक्षसी मात्रा में उर्जा पैदा करने की होड़ मची है। ऐसे में हमें मानव जीवन को बचाने के लिए परमाणु उर्जा के विकल्प के बारे में सोचने की जरूरत है। परमाणु उर्जा के विकल्प का सबसे बड़ा स्त्रोत है-सूर्य, समुद्री लहरें, हवा व पानी। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि विकसित देशों से जोखिम की टेक्नोलोजी लेकर उर्जा पैदा करना कहां तक उचित है।
मुख्य चर्चा सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. अचिन वनायक ने अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा: वर्तमान संदर्भ विषय पर वक्तव्य देते हुए कहा कि शांति को हम अलग-अलग समझते हैं। संतुलन से शांति, साम्राज्य के साथ जुड़ाव, अनौपचारिक साम्राज्य, विपन्स ऑफ टेरर, संतुष्टि के साथ शांति जुड़ी हुई है। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीबी व असमानता बहुत बढ़ी है। आज ग्लोबल वार्मिंग व इकोलोजिकल डिजास्टर से पर्यावरण का खतरा बहुत बढ़ा है। अमेरिका में शीतयुद्ध खत्म होने के बाद भी मिलिटरी के बजट में दिनोदिन बढ़ोतरी हुई है। आज अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी व्यवस्था का बोलबाला है। ग्लोबलाइजेशन ऑफ इलीट हो गया। वर्ल्ड प्रोड्यूसर, वर्ल्ड चियर और वर्ल्ड कंस्टीच्यूशन के बाद अब होगा वर्ल्ड पुलिस। जिसका चीफ होगा यूएस प्रेसीडेंट। अनौपचारिक साम्राज्य का हार्डवेयर है पुलिस मिलिटरी और सॉफ्टवेयर है-डर। शीत युद्ध के बाद न्यूक्लियर जंग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम हुई है पर स्थानीय स्तर पर बढ़ी है।
धरती की साभ्यतिक और उर्जा जरूरतें एवं असीमित उर्जा आपूर्ति के मिथक विषय पर विमर्श करते हुए वरिष्ठ पत्रकार व मीडियाविद् रामशरण जोशी ने कहा कि आज से करीब पांच हजार साल पहले जैसे वेदों में भी पृथ्वी की सुरक्षा का उल्लेख पाते हैं, उस समय न तो साम्राज्यवाद था न पूंजीवाद। हम जानते हैं कि टेक्नोलॉजी से कैसे समाज का उत्थान और साथ ही मनुष्यता के लिए खतरे भी पैदा हुए हैं। आज दुनिया में 20 हजार परमाणु बम हैं जिससे दुनिया में खतरे के बादल छाये हुए हैं। जापान में 1945ई. में अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने से भी हम सबक नहीं ले सके। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक व समाजशास्त्री यूरोप में पैदा हुए पर राज्यसत्ता इनके विचारों से परे जाकर काम करती है। हमें इसपर सोचने की जरूरत है कि राज्य का कौन सा चरित्र, डिसीजन मेकर होता है। 1997 में यूएन एसेम्बली में स्वीकार किया गया कि कोल्डवार के बाद रिजनल कनफ्ल्क्टि बढ़ी है। न्यूक्लियर इनर्जी की बात करते हैं, पिछले 20 वर्षों से हम एकध्रुवीय व्यवस्था में है। मीडिया ने प्रचारित किया कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। गांधीजी के विचार को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि इस पृथ्वी के पास सबकुछ है जिससे आपकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो सकें परंतु हम जीवनशैली के नाम पर हम विलासितापूर्ण जीवन जीने के आदी होते जा रहे हैं। अगर हम अपने जीवन शैली में सुधार में परिवर्तन नहीं लाएंगें तो इससे मानवाधिकार का हनन होगा और लोकतंत्र का हाशियाकरण होगा। उन्होंने विकास का हवाला देते हुए कहा कि आज असमान वितरण से असमानता बढ़ी है।
जापान, फूकूसीमा के अकियो हागा ने रेडियो एक्टिविटी से उत्पन्न हो रहे खतरों का खुलासा करते हुए कहा कि फूकूसीमा में बिजली संयंत्र लगाया गया था, किसी कारण से वह ढह गया, बाद में पता चला कि परमाणु संयंत्र लगाने में कुछ खराबी हो गयी और रेडियो एक्टिव पदार्थ निकलने लगे। बच्चों पर रेडियो एक्टिव तत्व का खतरनाक प्रभाव न हो इससे बचने के लिए मुझे भारत आना पड़ा, वहां से कई घरों के लोग पलायन कर रहे हैं।
इस दौरान रैमन मैग्ससे सम्मान से सम्मानित समाजसेवी संदीप पाण्डेय ने सुरक्षित आण्विक उर्जा के मिथक और रेडिएशन से जुड़े खतरे पर चर्चा करते हुए कहा कि 30 जुलाई को काकड़ापाड़ परमाणु बिजली संयंत्र, गुजरात में विकिरण से चार मजदूर प्रभावित हुए। वैज्ञानिक ये मानते हैं कि थोड़ा भी विकिरण शरीर में आएगा तो वह गंभीर बीमारी से ग्रसित हो सकता है या मानसिक रूप से विक्षिप्त भी हो सकता है। 90 मिली सीवर्ड एक मजदूर को मिल गया डॉक्टर ने कहा कि हमने इसका इलाज कर दिया। जबकि विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि विकिरण से ग्रसित बीमारी का इलाज नहीं हो सकता है। जादूगोड़ा जहां कि यूरेनियम का कारखाना है वहां के मजदूरों को कहा जाता है कि आप कपड़े को घर से धोइए। कहने का तात्पर्य है कि आप अपने परिवार में विकिरण पहुंचा दें। सरकार कभी कबूल नहीं करती कि इससे कोई नुकसान हुआ है। अमेरिका में पिछले बीस-पच्चीस सालों में एक भी परमाणु बिजली घर नहीं लगाया गया है। अमेरिकी लोगों का कहना है कि हम यहां के परमाणु बिजली कचरे को फेंकने नहीं देंगे हमें तो डर है कि वह कचरा भारत में भेज देंगे। परमाणु के कचरे से जो रेडियो धर्मी पदार्थ निकलते हैं वह बहुत खतरनाक है। यूरेनियम और प्लूटोनियम से ही परमाणु बम बनाए जाते हैं। परमाणु उर्जा का ताल्लुक परमाणु बम से है। परमाणु से जुड़े जानकारी के बारे में न तो संसद में बताया जाता है और न ही सूचना के अधिकार में भी इसके बारे में जानकारी दी जाती है। सरकार का कहना है कि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।
स्वागत वक्तव्य देते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि ताकतवर देशों द्वारा जापान में परमाणु बम गिराया जाना हथियार का परीक्षण करना रहा होगा। उन्होंने साहिल लुधियानवी की पंक्तियों का जिक्र करते हुए कहा पिछले युद्ध में कुछ मनुष्यों का विनाश हुआ अब जो युद्ध होगा संपूर्ण मानवजाति का विनाश हो जाएगा। अब जंग जरूरी नहीं रह गया है बिजली बनाने के नाम पर परमाणु संयंत्र लगाये जा रहे हैं। बिजली की जरूरत और परमाणु की जोखिम पर भी विचार करने की जरूरत है। विकसित मुल्क के लोग भारत जैसे देश में अपना बाजार तलाश रहे हैं। परमाणु संयंत्र लगाने से पहले विस्थापन ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों को भी देखना चाहिए।
वैशाली पाटील, राजू फतरफेकर ने जैतापुर परियोजना : संघर्ष और मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन स्त्री अध्ययन विभाग की प्रोफेसर व सीएनडीपी कार्यकर्ता प्रो.इलीना सेन ने किया। इस अवसर पर विजय जावंधिया, अमीर अली अजानी, प्रो.अनिल के.राय अंकित, प्रो.मनोज कुमार, डॉ.नृपेन्द्र प्रसाद मोदी, डॉ.डी.एन.प्रसाद, डॉ.शंभू गुप्त, बैंक ऑफ इंडिया, हिंदी विवि के शाखा प्रबंधक बांदे, विमर्श के संयोजक शरद जायसवाल, डॉ. प्रवीण वानखेडे, धनंजय सोनटक्के, एकनाथ मुरकुटे, अरविंद धोंगडे सहित हिंदी विवि के कर्मी, शोधार्थी, विधार्थी शहर के महाविद्यालय के विधार्थी व देशभर के करीब 200 प्रतिभागी उपस्थित थे।


