अरविन्द केजरीवाल जैसे लोग सिर्फ बातों के वीर हैं, धन लेकर ही कार्यक्रम करवाने वाले ये लोग सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के संघर्षमयी जीवन को क्या जाने? अपराधियों को कोई अच्छा नहीं मानता लेकिन जन संघर्षों में दर्ज मुकदमों से कोई अपराधी नहीं होता, वो तो जन नेता और जन प्रतिनिधि बन जाता है और जो अपराधी है उसको कोई बलिदानी नहीं मानता है। जनता जिसको ज्यादा पसंद करती है उसको अपना प्रतिनिधि चुनती है, जनता के चयन के आधार क्या है यह सोचने की बात है। जनता अपने रोजमर्रा के सवालों को हल करने वालों को, अपने लोगों को -भले ही उसका आधार जाति-धर्म हो, नेता मानती है। संसद पर, लोकतंत्र पर बार-बार प्रहार व कुठाराघात करने से बेहतर है कि अपने को तीस मार खां समझने वाले और विदेशी धन पर संस्था चलाने वाले लोग आम जनता के बीच, किसानों-मजदूरों के बीच उनके जीवन से जुड़ी समस्याओं के लिए लड़े।
डॉ. लोहिया या और भी तमाम सामाजिक-राजनीतिक लोगों ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था की खामियों और भ्रष्ट व तानाशाह सरकारों के खिलाफ हल्ला बोला था। जनता को जगाने के लिए अपने विचार दिये और राजनीतिक संगठन बना कर लड़ाई लड़ी ना कि भारत के आम जन को भड़काने व बरगलाने की कुचेष्ठा की जैसा कि ये लोग कर रहे हैं। राजनीतिक चेतना के बिना क्या मनमानी और तानाशाही का राज्य स्थापित करना चाहते हैं अरविन्द केजरीवाल जैसे लोग। अभी चुनावों में भागीदारी करनी चाहिए थी या आगे एक राजनीतिक दल बनाके अपने मुद्दों के साथ निर्वाचन के मैदान में आयें और व्यवस्था परिवर्तन की लडाई लड़ें, किसने रोका है? जनता को जगा कर जनप्रतिनिधि बनने में क्या दिक्कत है? एक बात सत्य है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाना कभी भी जनता को बरगलाना नहीं कहा जा सकता है। आज भारत की आम जनता तक की रक्त में भ्रष्टाचार जाने अनजाने प्रवाहित हो रहा है। जनता को सुधारने के लिए चरित्रवान नेतृत्व की जरूरत है जो आम जनता के बीच से ही संघर्षों से निकलेगा।
अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी आदि कितने ईमानदार हैं ये सबके सामने आ चुका है। जो व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग ना कर सके, ये ना सुनिश्चित कर सके कि उसका नाम मतदाता सूची में है की नहीं, उससे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में कोई आशा रखना व्यर्थ है। भ्रष्ट गैर सरकारी संगठनों के लोगों, आपराधिक चरित्र के नेताओं के विषय में सिर्फ चर्चा की अपेक्षा राजनीतिक सुधार के लिए काम करना बेहतर है। ध्यान यह भी रखना है कि अन्याय-शोषण के खिलाफ लड़ना और अपने को बेहतर-बुद्धिमान साबित करने के लिए सिर्फ अपनी व अपने समूह की बात मनवाने के लिए काम करने में, दबाव डालने में अंतर होता है। अपने स्वार्थ सिद्धि के प्रयास में जुटे हैं ये गैर सरकारी संगठनों के कर्ता-धर्ता। कितना हास्यास्पद है कि लोगों को जागरूक बनाने निकले अरविन्द केजरीवाल खुद कितना जागरूक हैं ये सभी ने देखा। अपना नाम है कि नहीं ये सुनिश्चित ना कर पाना गैर जिम्मेदारी है। एक साधारण ग्रामीण तक अपना नाम बढ़वाने में कोई कसर नहीं रखता है, यह पता करता है कि नयी मतदाता सूची में नाम है कि नहीं, किसी ने कटवा तो नहीं दिया, इतना जागरूक है आम जन। अपने मत पर नज़र नहीं और दूसरों को प्रेरित करते घूम रहे हैं, अच्छा मजाक है। ये मिथ्या अहंकार में मदमस्त गैर जिम्मेदार, लोकतंत्र विरोधी, सामाजिक न्याय के विरोधी चरित्र के हैं और सामंतवादी मानसिकता के पोषक हैं। इनका विरोध जारी रहेगा। ये कोई जनता की आशा के चिराग नहीं, पूंजीवादियों की लगायी आग है और ऐसी आग जिससे भारत भूमि के आमजन घर जले, तबाही आये और लोकतंत्र कमजोर हो।
लेखक अरविंद विद्रोही पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


