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आओ गरीब गरीब खेलें

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को अनर्थशास्त्र बताने की होड़ लगी है। निशाने पर हैं उनकी अध्यक्षता वाले योजना आयोग के वो आंकड़े जो गरीबी रेखा के बारे में आए हैं। सरकार पर चौतरफा हमला होते देख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इतना तो कह डाला कि गरीबी रेखा के आंकड़े नाकाफी हैं। इस पर नए सिरे से आकलन की जरूरत है। हालांकि, गरीबी रेखा के मानकों को लेकर पहले भी सवाल खड़े होते रहे हैं। आरोप है कि सरकार की मंशा गरीबों की असली हालत को छिपाने की होती है। चाहे इस खेल में गरीब ही क्यों न निपटा दिए जाएं?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को अनर्थशास्त्र बताने की होड़ लगी है। निशाने पर हैं उनकी अध्यक्षता वाले योजना आयोग के वो आंकड़े जो गरीबी रेखा के बारे में आए हैं। सरकार पर चौतरफा हमला होते देख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इतना तो कह डाला कि गरीबी रेखा के आंकड़े नाकाफी हैं। इस पर नए सिरे से आकलन की जरूरत है। हालांकि, गरीबी रेखा के मानकों को लेकर पहले भी सवाल खड़े होते रहे हैं। आरोप है कि सरकार की मंशा गरीबों की असली हालत को छिपाने की होती है। चाहे इस खेल में गरीब ही क्यों न निपटा दिए जाएं?

योजना आयोग ने सुरेश तेंदुलकर कमिटी की सिफारिश को आधार मानकर गरीबी रेखा की नई परिभाषा रचते हुए जो आंकड़े पेश किए हैं, वह लोगों को पच नहीं रहा है। आंकड़ों को लेकर संसद से सड़क तक, आर्थिक जगत से लेकर गैरसरकारी संगठनों तक, चाय की दुकान से घर के ड्राइंग रूम तक चर्चाओं का दौर गर्म हो चला है। गरीबी के आंकड़े ने एक बार फिर उस बहस को छेड़ दिया है, जिसका दारोमदार इस बात पर है कि भारत के शहरी और ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा की परिभाषा आखिर क्या हो? योजना आयोग के साल 2009-2010 के गरीबी आंकड़े कहते हैं कि पिछले पांच साल के दौरान देश में गरीबी 37.2 फीसदी से घटकर 29.8 फीसदी पर आ गई है। यानी, अब शहर में 28 रुपये 65 पैसे प्रतिदिन और गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता। नए फामूर्ले के अनुसार शहरों में महीने में 859 रुपये 60 पैसे और ग्रामीण क्षेत्रों में 672 रुपये 80 पैसे से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है।

सरकार की ओर से जैसे ही ये आंकड़े संसद में पेश हुए विपक्षी दलों की धड़कनें, एकाएक बढ़ गईं। उन्हें सरकार को घेरने और कोसने का एक और बेहतरीन मौका हाथ लग गया। भाजपा, जदयू, बसपा, अन्नाद्रमुक और भाकपा एक साथ बावेला काटने लगे। उन्हें जैसे मनचाही मुराद मिल गई है। सभी एक साथ चिल्लाने लगे, यह आंकड़ा गरीबों के साथ न सिर्फ मजाक है, बल्कि गरीबों से छल करने का एक प्रपंच भी। यूपीए सरकार ने गरीबों को कहीं का नहीं छोड़ा।

भाजपा के एसएस अहलुवालिया गरीबी के इस नए आंकड़े पर तैश में आ गए। कहने लगे, क्या कोई भी आदमी 28 रुपये और 22 रुपये खर्च करके अमीर बन सकता है? गरीबी की यह नई परिभाषा किसी मजाक से कम नहीं। उधर, जदयू के राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी, बसपा के सतीश चंद्र मिश्र और भाकपा के डी. राजा ने गरीबी रेखा की इस परिभाषा का विरोध किया। इन लोगों ने कहा कि सरकार की गलत नीति की वजह से देश में गरीबों की आबादी कम होने के बजाए बढ़ी है। सरकार गरीबी रेखा के मानक को कम करके कम गरीब दिखाने का खेल कर रही है। जदयू के शिवानंद तिवारी कहते हैं कि अभी कुछ हफ्ते पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र के जरिए कहा था कि शहरों में 32 रुपये और गांवों में 26 रुपये रोजाना खर्च करने वाला आदमी गरीब है, लेकिन अब सरकार ने यह सीमा और कम कर दी है। लगता है, सरकार को गरीबी से चिढ़ है और अब वे गरीब को ही जमींदोज करने पर तुली हुई है।

गरीबी की इस नई परिभाषा गढ़ने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया अब आर्थिक जानकारों, राजनीतिक दलों और गैर सरकारी संगठनों के निशाने पर आ गए है। संभव है, मोंटेक सिंह को इस बार गरीब और गरीबी रेखा ले डूबे। अब मोंटेक भी थोड़े असहज दिख रहे हैं। वे कहते फिर रहे हैं कि नेशनल सैंपल सर्वे संगठन और नेशनल एकाउंट्स के आंकड़ों में असमानता है, जिसे ठीक करने की जरूरत है । उनके बॉस, यानी योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी गरीबी को फिर से आंकने की बात कह चुके हैं। नतीजन, मोंटेक को एहसास हो गया है कि सरकार के इशारे पर उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसे सहज रूप में पचाना कठिन है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है, जब यूपीए सरकार दो कदम आगे बढ़ाकर, चार कदम पीछे हटने पर बाध्य हुई हो। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में तो जैसे यह उसका चरित्र बन गया हो। कई आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि सरकार के लोगों ने और खासकर योजना आयोग ने देश और गरीब जनता के साथ धोखा किया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारी सरकार वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के इशारे पर चल रही है? क्या सुरेश तेंदुलकर अंतर्राष्‍ट्रीय वित्त संस्थानों के दलाल हैं? प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस के निदेशक कमल नयन काबरा सबसे ज्यादा दु:खी सुरेश तेंदुलकर की रिपोर्ट को लेकर है। कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि डॉ. मनमोहन सिंह और मोटेंक सिंह अहलुवालिया की सेवाएं वर्ल्ड बैंक और विश्व की दूसरी आर्थिक संस्थान अपनी स्थिति सुधारने के लिए लेते रहे हैं, लेकिन वे दोनों अपने देश में क्यों सफल नहीं हो पा रहे हैं? कहीं इसके पीछे राजनीतिक कारण तो नहीं हैं? नई गरीबी रेखा के निर्धारण को लेकर आगे भी कई तरह की राजनीति सामने आएगी। फिलहाल, हम आपको ले चलते हैं देश के आर्थिक हालात की तरफ, जिसे बताकर सरकार देश में गरीबी कम होने और लोगों के अमीर बनने का ढोल पीट रही है।

आगे बढ़ने से पहले हम कुछ आंकड़ों की तस्दीक कर लें। ये आंकड़े आगे का गणित समझने में काम आएगा। गरीबी पर सरकार के पिछले दावे कुछ इस प्रकार थे-

2004-05 में देश में गरीबों की आबादी 40.7 करोड़ थी और उनका प्रतिशत 37.2 था। इस आंकड़े के मुताबिक हर पांच सदस्यीय शहरी परिवार, जिसकी मासिक आमदनी 4824 रुपये थी, वह गरीब नहीं था। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में 3905 रुपये मासिक कमाने वाला परिवार गरीबी रेखा से ऊपर था। अब सरकार इस आंकड़े को नहीं मान रही है। नए सरकारी दावे के अनुसार, अब गरीबों की आबादी घटकर 34.46 करोड़, यानी 29.8 फीसदी हो गई है। सरकार के ये आंकड़े वर्ष 2009-10 के हैं, जिसे आधार मानकर गरीबी की नई परिभाषा दी गई है। सरकार का दावा है कि पिछले पांच सालों में कोई 6 करोड़ गरीब कम हुए हैं। गरीबों की कमी दिखाने वाली यही संख्या विपक्ष और अर्थशास्त्रियों को पच नहीं रही है। मामला इतना ही नहीं है। सरकारी दावे बता रहे हैं कि पिछले पांच सालों में गांव की गरीबी शहरों से ज्यादा कम हुई है। ग्रामीण इलाकों में पहले गरीबी 41.8 फीसदी थी, जो अब 33.85 फीसदी हो गई है। यानी, ग्रामीण गरीबी में 8 फीसदी की कमी आई है। शहरी इलाकों में पहले गरीबी 25.7 फीसदी थी, अब घटकर 20.9 फीसदी पर आ गई है। यानी, पहले की तुलना में 4.8 फीसदी की कमी। कुल मिलाकर सरकार का दावा है कि वर्ष 2004-05 में 37.2 फीसदी लोग गरीब थे, जो अब घटकर 29.8 फीसदी हो गए हैं।

दरअसल, ये सारा खेल योजना आयोग ने बैठकर तैयार किया है। आयोग ने गरीबों के प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय के आधार पर राज्यवार सूची जारी की है। ये प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े एक परिवार में औसतन पांच लोग के हिसाब से माने गए हैं। आंकड़ों के इस खेल से सब चकित हैं। योजना आयोग के हालिया सरकारी आंकड़े सरकार को ही घेर रहे हैं। एक तरफ सरकार कह रही है कि पिछले पांच सालों में गरीबी घटी है, दूसरी ओर राज्यों में जो गरीबी की आंकड़े हैं वे चौंका रहे हैं। बिहार में गरीबों की आबादी अभी 53.3 फीसदी है, जबकि छत्तीसगढ़ में 48.7 फीसदी, मणिपुर में 47 फीसदी, झारखंड में 39 फीसदी, असम में 37.9 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 37.7 फीसदी लोग अभी गरीबी का दंश झेल रहे हैं। इसके अलावा देश में 50 फीसदी खेतिहर मजदूर और 40 फीसदी अन्य श्रमिक शहरी इलाके में गरीबी में फंसे हुए हैं। जरा उस राज्य की तस्वीर देखें, जो विकास के पैमाने पर सबसे आगे जाने की बात करते हैं। हरियाणा में 55.9 फीसदी खेतिहर मजदूर और पंजाब में 35.6 फीसदी खेतिहर किसान गरीबी से कराह रहे हैं। मुसलमानों , आदिवासियों और दलितों की राजनीति तो इस देश में खूब की जाती है, लेकिन इनके हालत अभी सुधरे नहीं हैं। सरकार देश से गरीबी कम होने की बात चाहे जितना कर ले, सच्चाई चीख-चीख कर कह रही है कि ग्रामीण इलाकों में मुसलमानों की हालत बेहद दयनीय है। असम में 53.6 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 44.4 फीसदी, बंगाल में 34.4 फीसदी और गुजरात में 31.4 फीसदी मुसलमान अभी गरीबी रेखा से नीचे हैं। शहरी इलाके में 33.9 फीसदी मुसलमान गरीब हैं। देश के 47.4 फीसदी आदिवासी और 42.3 फीसदी दलित गरीब हैं।

अब, जरा इन आंकड़ों से इतर सरकार की उस अमीरी वाले आंकड़े की बात करें, जिसको लेकर सरकार सभी आम आदमी को भोजन मिलने का दावा करती फिर रही है। कृषि मंत्री शरद पवार कहते फिर रहे हैं कि देश में अनाज की कोई कमी नहीं हैं। देश में 250 करोड़ टन से ज्यादा अनाज उत्पादन हो रहा है। यह सही है कि पिछले सालों में अनाज उत्पादन खूब हुआ है। वर्ष 1972 से 1991 तक प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता 440.7 ग्राम प्रतिदिन थी। इसमें दाल उपलब्धता 39 ग्राम और कुल अनाज की उपलब्धता 480 ग्राम थी। लेकिन 1992 से 1996 के बीच में अनाज उपलब्धता घटकर 439.3 ग्राम और दाल उपलब्धता घटकर 35.6 ग्राम रह गई। यानी, कुल उपलब्धता 474.9 ग्राम की हो गई। फिर 1997 से 2001 के बीच में कुल उपलब्धता घटकर 457.3 ग्राम हो गई। 2002से 2006 के बीच में इसमें और गिरावट आ गई। यह आंकड़ा 452.4 ग्राम होकर रह गया। वर्ष 2007 से 2010 में कुल अनाज उपलब्धता 440 ग्राम रह गई है। क्या सरकार बता सकती है कि 28 या 22 रुपये प्रति दिन कमाने वाले लोग करीब आधा किलो अनाज खाकर जी सकते हैं? अगर ऐसा संभव भी है, तो इसे कुपोषित भारत की नई तस्वीर ही कहा जा सकता है।

वित्त मंत्रालय ने अभी हाल में स्वीकार किया था कि विकास की दर इस साल सात प्रतिशत नहीं छु पाई और महंगाई का बढ़ना भी लगातार जारी है। इसके बावजूद सरकार का दावा है कि देश में गरीबी कम हुई है। समाजसेवी संगठनों ने सरकार से सवाल पूछा था कि यह किस फॉर्मूले से तय किया गया है? इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए तेंदुलकर समिति ने जो फॉमूर्ला दिया है, उसके मुताबिक, भारत में पिछले छह साल में लगभग छह करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए हैं। इस समिति ने प्रति व्यक्ति कैलोरी के हिसाब के अलावा सेहत और शिक्षा पर खर्च को भी जोड़ा है। इन आंकड़ों को समझने के लिए अगर एक मिसाल ली जाए, तो सरकार जिन शहरी इलाकों की बात करती है, उसी के एक शहर दिल्ली के परिवहन किराए की चर्चा की जा सकती है। सबसे सस्ते साधन मेट्रो में औसत दूरी तय करने के लिए 15 रुपये किराया लगता है। यानी, अगर कोई कामगार घर से काम के लिए दूसरी जगह जाता है, तो उसे 30 रुपये किराए के तौर पर खर्च करना होगा। सरकार का दावा है कि खुद पर 28 रुपये की खपत कर लेने वाला गरीब नहीं है। मजेदार बात यह है कि इन आंकड़ों के साथ भारत की महंगाई दर के ताजा आंकड़े भी आ गए। इसके मुताबिक रिटेल सेक्टर में महंगाई 8.83 प्रतिशत बढ़ गई। दूध, अंडे, मीट और मछली की कीमत बढ़ गई। जनवरी में रिटेल महंगाई की दर 7.56 प्रतिशत थी। पूरी दुनिया भारत के विकास की तुलना चीन से करती है। अब इन दोनों देशों में तुलना की जा सकती है। चीन में प्रति व्यक्ति औसत आय 4720 डॉलर है, करीब ढाई लाख रुपये। भारत में यह 911 डॉलर है (करीब 45,000 रुपये)।

सरकार की इस दलील से गरीबों की चिंता करने वालों के माथे पर बल पड़ना लाजिमी है। क्या सरकार ये बता पाने की स्थिति में है कि 28 रुपये में दो वक्त की रोटी का इंतजाम किस तरह किया जाएगा? क्या गरीबी का संबंध महज पेट से है? क्या गरीब खाना-कपड़ा नहीं मांगती? क्या गरीब को एक छत की जरूरत नहीं होती? दरअसल, गरीबी के पैमाने तय करना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। महज एक आंकड़ा देकर आप इस सच से मुंह नहीं मोड़ सकते कि देश में गरीब की समस्याएं खत्म होने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। सरकारी योजनाओं को आम आदमी तक पहुंचाने में नाकाम रही सरकार लगता है गरीबों की संख्या में कमी बताकर लोगों की संख्या में कमी करना चाहती है, ताकि उसके खर्चों में कमी आ सके। आज के दौर में महंगाई का आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ रहा है, शहरों में 28 रुपये प्रतिदिन का खर्च ऊंट के मुंह में जीरा के अलावा और कुछ नहीं है। गांवों के लिए तो ये रकम 22 रुपये तय की गई है। अब ये तो सरकार ही बता सकती है कि गांव में रहनेवाला शख्स भी अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए शहर पर ही निर्भर होता है। फिर चाहे वह भोजन हो कपड़ा या फिर कोई और जरूरत?

गरीबी के आंकड़े

देश में गरीबी को लेकर पांच अनुमान लगाए जा रहे हैं। योजना आयेग के ही दो अनुमान हैं। योजना आयोग के अनुसार 21.8 और 27.5 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। जबकि इसी सरकार द्वारा बनाई गई अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी ने साबित किया है कि 78 फीसदी लोगों की क्रय शक्ति 20 रुपये से कम है। यानी 78 फीसदी लोग गरीब हैं। विश्व बैंक का मानना है कि भारत में भारत में उदारीकरण के 20 साल बाद भी 42 फीसदी लोग अत्यंत गरीबी में जी रहे हैं । सुरेश तेंदुलकर कमेटी ने इसे 37 फीसदी बताया था। गौरतलब है कि यूएनडीपी की नजर में गरीब का मतलब वह परिवार है, जो हर दिन एक डालर से कम पर गुजारा करता है।

आंकड़ों के अनुसार देश में 2004-05 की तुलना में 2009-10 में गरीबों की संख्या 7.3 प्रतिशत कम हुई है। इस प्रकार करीब पांच करोड लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ गए।

। यूएनडीपी ह्यूमन डिवेलपमेंट रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सबसे अधिक गरीब रहते हैं। देश में कुल गरीबों की संख्या 42 करोड़ है, जो 26 अफ्रीकी देशों के गरीबों से एक करोड़ ज्यादा हैं।

। ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिदिन 22 रुपये 43 पैसे और शहरों में 28 रुपये 65 पैसे से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर है।

। इससे पहले भी जब योजना आयोग ने ये रकम 32 रुपये और 24 रुपये तय की थी, तो हो-हल्ला मचा था!

। सरकार ने ये भी साफ किया कि खाद्य सुरक्षा योजना से गरीबी रेखा को नहीं जोड़ा जाएगा।

। फिलहाल सिर्फ ग्रामीण विकास मंत्रालय की कम से कम 25 योजनाएं हैं, जो शहरों में 17 रुपये प्रतिदिन और गांव में 11 रुपये रोजाना के मानक पर चल रही है।

। सरकार वर्ल्ड बैंक के सामने ये आंकड़े रखकर वाहवाही लूटना चाहती है, ताकि उसे मिलने वाली आर्थिक मदद में और इजाफा हो सके।

। देश में गरीब हमेशा से ही उपेक्षा के शिकार रहे हैं। आंकड़ों में भले ही गरीबों का खर्च 28 रुपये और 22 रुपये तय कर दिया गया हो, लेकिन असलियत यह है कि गरीब आज भी गरीब हैं और अमीरी की तो सीमा ही तय नहीं है।

यूपीए सरकार कहती है कि हाल के वर्षों में देश अमीरी की ओर बढ़ा है। गरीबों की आबादी कम हुई है और यह सब केंद्र सरकार की योजनाओं की वजह से संभव हो पाया है। न तो विपक्ष और न ही निष्पक्ष अर्थशास्त्री सरकार के इस दावे को मानने को तैयार हैं। घटती गरीबी और बढ़ती अमीरी के आंकड़ों की सच्चाई जानने के लिए अखिलेश अखिल ने भारतीय वित्त संस्थान के निदेशक व प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. जे.डी. अग्रवाल से लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश-

सवाल : क्या देश वाकई अमीर हुआ है?

जवाब : हां, ऐसा आप कह सकते हैं। लोगों की

क्रय-शक्ति बढ़ी है, आय बढ़ी है और जीडीपी में वृद्धि हुई है। इसके अलावा रहन-सहन से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य के मामले में हम पहले से बेहतर हुए हैं। रोजगार का सृजन हुआ है। कुल मिलाकर देश की एक बड़ी आबादी के पास अब धन की कोई कमी नहीं रह गई है। लेकिन यह भी सही है कि अमीरी के इस खेल में देश की पूरी जनता शामिल नहीं है।

सवाल : अभी सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे की जो नई परिभाषा दी है और जो आंकड़े पेश किए हैं, उससे आप सहमत हैं?

जवाब : हम ऐसे आंकड़ों से सहमत नहीं हैं। ये आंकड़े बेकार और बकवास से ज्यादा कुछ भी नहीं। योजना आयोग से जुड़े लोग आखिर क्या बताना चाह रहे हैं, समझ से परे की बात है। मोंटेक सिंह अहलुवालिया कह रहे हैं कि शहरी इलाकों में 28 रुपये और गांवों में 22 रुपये खर्च करने वाले लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं। इस प्रकार सरकार अब देश में 35 करोड़ लोगों को ही गरीबी रेखा से नीचे मान रही है। इस तरह के फीगर का कोई औचित्य नहीं है। सरकार को तो यह जस्टिस करना चाहिए कि 22 से 28 रुपये में कोई आदमी क्या कुछ कर सकता है? क्या इतने पैसे से कोई हर रोज रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था कर सकता है? इसके अलावा बीमारी और शिक्षा की बात अलग से। आकाश के नीचे सोने वाला आदमी भी इतने पैसों में जी नहीं सकता। फिर वह बीपीएल से ऊपर कैसे हो सकता है?

सवाल : आखिर गरीब किसे माना जाए?

जवाब : अगर कोई आदमी कम से कम 1500 से 2000 कैलोरी प्रति दिन उपभोग नहीं करता है। रहने के लिए उसके पास छत नहीं है। पीने के लिए पानी नहीं है। सैनिटेशन की व्यवस्था नहीं है। पहनने के लिए कपड़ा नहीं है और शिक्षा और इलाज के पैसे नहीं हैं, तो उसे गरीब कह सकते हैं। और, आपको बता दें कि देश में इस तरह की आबादी 40 करोड़ से ज्यादा की है। जब देश में अभी 40 फीसदी लोगों के पास शौच जाने की व्यवस्था नहीं हैं, तो कायदे से 48 फीसदी लोग गरीब हैं। आपको मालूम है कि जितनी दूरी धरती से चांद की है, उससे भी ज्यादा दूरी हमारे देश की महिलाएं पानी की खोज में दौड़ती रहती है। इसी देश में बच्चों और प्रसूताओं की मृत्यु दर सबसे ज्यादा है, जिस पर प्रधानमंत्री खुद खेद व्यक्त कर चुके हैं। क्या 22 और 28 रुपये में ये सारी समस्याएं हर रोज खत्म की जा सकती हैं?

सवाल : इस आंकड़े के पीछे सरकार की मंशा क्या हो सकती है?

जवाब: सरकार की चाहे जो भी राजनीतिक मंशा हो, लेकिन इतना तय है कि योजना आयोग के आंकड़े गलत और झूठे हैं। सरकार की मंशा तो यही होगी कि वह लोगों को बता सके कि उसकी योजनाएं सफल रही हैंै। वास्तव में ऐसा नहीं है। केवल यह कह देने से कि देश में 35 करोड़ लोग ही बीपीएल से नीचे हैं और 85 करोड़ लोग बीपीएल से ऊपर जा चुके हैं, इससे कोई अर्थपूर्ण काम नहीं होने वाला। लगता है, सरकार अपनी उपलब्धियों को काल्पनिक तरीके से उभारने की कोशिश कर रही है । इसका उल्टा असर सरकार पर पड़ेगा। इससे हम देश दुनिया में मजाक के पात्र हो जाएंगे।

सवाल : इस तरह के आंकड़ों का असर क्या होगा?

जवाब : संभव है कि इसका असर न्यूनतम मजदूरी पर पड़े। संभव है कि राज्य सरकारें जो न्यूनतम मजदूरी देती है, वह कम हो जाए। अब नरेगा में जो मजदूरी दी जाती है, वह इसी के अनुकूल दी जाएगी। इसके अलावा गरीबी शमन के नाम पर राज्यों को जो धन दिए जाते हैं, उसमें कटौती हो सकती है। आप कह सकते हैं कि गरीबी शमन के मद में कमी आ सकती है।

सवाल : योजना आयोग को देश की सच्चाई से मतलब होता है?

जवाब : देखिए, योजना आयोग को तो देश की सही तस्वीर रखनी ही चाहिए। इसके अलावा सरकार की उपलब्धियों को भी सही तरीके से दिखाने की जरूरत है। लेकिन ये जो बनावटी आंकड़े हैं, इससे कुछ होने वाला नहीं हैं। योजना आयोग आर्थिक दृष्टि से एक थिंक टैंक है। उसे राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर सच्चाई की बात करनी चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रधानमंत्री इस आयोग के अध्यक्ष हैं, उन्हें भी इस तरह के गलत आंकड़ों पर अपनी राय देनी चाहिए।

सवाल : योजना आयोग के आंकड़े में गैरबराबर आय के साथ ही क्षेत्रीय असमानता की बात भी सामने आई है?

जवाब : देखिए, मार्केट इकॉनोमी में असमानताएं स्वाभाविक है। कम्युनिज्म और सोसलिस्टिक पैटर्न आॅफ सोसाइटी का जन्म असमानता दूर करने के लिए ही हुआ था। लेकिन पूरी दुनिया में देखा गया कि इससे इकॉनोमी पिछड़ती गई है। मार्केट इकॉनोमी में असमानताएं तो होती हैं, लेकिन सामाजिक रूप से अर्थव्यवस्था में विकास ठीक हो जाता है। हमारा मानना है कि हर आदमी गरीब आदमी की सहायता करे और उसे आगे बढ़ाने में अग्रसर हो, तो ऐसी असमानता खत्म हो सकती है। सरकार इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

सवाल : यूपीए-एक और यूपीए-दो में आपको क्या अंतर लग रहा है?

जवाब : यूपीए-एक की आर्थिक नीति सफल थी। सरकार भी सफल थी। यूपीए-दो की सरकार, एक असफल सरकार है। भ्रष्टाचार में डूबी रही है यह सरकार। यूपीए-दो में आपसी खींचतान ज्यादा है। असफलता का एक बड़ा कारण है यह। घटक दलों में किसी के प्रति न तो विश्वास है और न ही आदर। इससे आर्थिक नीतियां और सुधार के उपाय प्रभावित हो रहे हैं। आर्थिक सुधार इस सरकार में शून्य पर आ गए हैं। कमजोर सरकार की वजह से अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर जो मंदी के बादल छाए और यूरो जोन की वित्तीय क्राइसिस हुई, उसका असर भी देश में देखने को मिला है। सरकार मुद्रास्फीति को रोक पाने में असफल रही है।

सवाल : एनडीए और यूपीए की आर्थिक नीति में क्या अंतर पाते हैं?

जवाब : एनडीए की आर्थिक नीति राष्ट्रवादी थी। यूपीए की आर्थिक नीति विदेशी बॉर्डर से आ रही है। रुपये की कीमत को एनडीए ने संभाल रखा था। उस समय एक डॉलर की कीमत 35 से 40 रुपये के बीच थी, जिससे मुद्रास्फीति में कमी थी। लोगों को राहत भी मिली थी। अभी एक डॉलर 52 रुपये तक पहुंच गया है। महंगाई भी चरम पर है ।

सवाल : यानी रुपये का अवमूल्यन देश के लिए घातक है?

जवाब : अवमूल्यन से विदेशी अर्थव्यवस्था का संचालन होता है, जबकि अपनी अर्थव्यवस्था का दु:संचालन हो जाता है। देखिए, ये बड़ी ही जटिल बात है कि रुपये का अवमूल्यन फिर सरकार क्यों करती है? इससे आरबीआई और वित्त विभाग को फायदा होता है, जबकि देश और जनता को नुकसान। इसे समझना होगा। पता नहीं, देश की सरकार ने लोगों को झांसे में क्यों रखा है?

सवाल : आखिरी सवाल, फिर गरीबों का उत्थान कैसे हो?

जवाब : उत्थान तो योजनाओं के जरिए ही होना है। असल बात ये है कि योजनाएं कितनी सार्थक हैं। उन योजनाओं का लाभ उन्हें मिल रहा है कि नहीं, इस पर नजर रखने की बात है। फिर भ्रष्टाचार और दलालों से लेकर विचौलियों पर नजर रखनी होगी। जो संभवत: यहां नहीं हो पा रहा है। सिर्फ आंकड़ों के जरिए न तो हम किसी का विकास कर सकते हैं और न ही अमीर बना सकते हैं । गलत आंकडे़ देश को रसातल की ओर भी ले जा सकते हैं।

तेंदुलकर वर्ल्ड बैंक के दलाल हैं : कमल नयन काबरा

सवाल : योजना आयोग के गरीबी पर आए नवीनतम आंकड़ों को आप किस रूप में देख रहे हैं?

जवाब : यह आंकड़ा नहीं, कारीगरी है। पुराने नॉर्म को नई कीमतों पर रिवाइज करने की बात है। ये आम लोगों की समझ से परे की बात है। जो बात लोग समझ नहीं सकते वह बात करना लोगों को ठगने जैसा है। यह गरीबों के साथ मजाक किया गया है। इस रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए।

सवाल : लेकिन इस रिपोर्ट को तो सुरेश तेंदुलकर ने तैयार की थी?

जवाब : ये लोग वर्ल्ड बैंक के दलाल हैं। अपने आकाओं के इशारे पर काम करते हैं और अपने ही देश को चूना लगाते हैं। तेंदुलकर सही में देश के बारे में सोचते और गरीबी की सही जायजा लेते, तो कुछ और ही बात होती।

सवाल : फिर गरीबी रेखा का निर्धारण क्या होना चाहिए?

जवाब : देखिए, गरीबी रेखा का सही निर्धारण रथ और दांडेकर जैसे अर्थशास्त्रियों ने सही किया था। कैलोरी वाले भोजन के आधार पर उन्होंने गरीबी का निर्धारण किया था। आज सबसे ज्यादा जरूरत है ऊपरी आय वाले जो लोग हैं, उनके उपभोग स्तर को घटाना पड़ेगा। पांचवीं योजना में प्रख्यात अर्थशास्त्री सुखमय चक्रवर्ती ने साफ-साफ कह दिया था कि अगर देश से गरीबी दूर करनी है, तो अधिक आय वाले लोगों की संपत्ति और उपभोग स्तर को हटाना होगा।

सवाल : गरीबों और गरीबी के बारे में जवाहरलाल नेहरू के कैसे विचार थे?

जवाब : नेहरूजी ने 1950 में जब नेशनल प्लानिंग कमेटी की बैठक की थी, उन्होंने गरीबी रेखा की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अगर देश का कोई भी आदमी अपने लिए कपड़ा, मकान, भोजन, दवा और शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकता है, तो सरकार उसे आगे बढ़ाने में मदद करे। उन्होंने इसके लिए एक न्यूनतम आय की भी बात कही थी। पंडित नेहरू ने जो न्यूनतम आय रखी थी, आज 65 साल बाद भी उस आय से भी कम की बात तेंदुलकर कर रहे हैं। हम आपको यह भी बता दें कि तब भी योजना आयोग में तमाम तरह के उद्योगपति थे और वे नेहरू की बात को सही मान रहे थे। इसके बाद बंबे प्लान में भी गरीबी रेखा का निर्धारण हुआ। अगर वही मापदंड रहता, तो आज गरीबी खत्म हो गई होती।

सवाल : आखिर सरकार चाहती क्या है?

जवाब : सरकार की बात तो हम नहीं जानते। लेकिन सरकार कहती है कि जीडीपी में बढ़ोतरी हुई है। यह सही भी है । ऐसे में सवाल उठता है कि जिस अनुपात में जीडीपी बढ़ी है, उसी अनुपात में गरीबों के बीच वितरण ब्यवस्था क्यों नहीं हो रही है? अगर पहले की तुलना में जीडीपी 60 फीसदी बढ़ी है, तो उसी अनुपात में गरीबों के बीच वितरण भी होने चाहिए। जो वितरण हुए हैं, वे सभी दलाल और लुटेरे खा गए। गरीब वहीं के वहीं हैं। ऐसे कैसे चलेगा?

सवाल : आपकी नजर में गरीबी रेखा का निर्धारण कैसे हो?

जवाब : गरीबी रेखा निर्धारण का समय जा चुका है। अब, जीवन यापन रेखा बनाने की जरूरत है । एक आदमी को जीवन जीने के लिए जो धन चाहिए, वह उसके पास नहीं है, तो वह गरीब है। उसके लिए सरकार और समाज को आगे बढ़ने की जरूरत है। एसी कमरों में बैठकर जो लोग आंकड़े पेश कर रहे हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि उन्हें जीवन यापन के लिए कितने पैसे चाहिए? पहले वे अपना तय कर लें, फिर गरीबों का तय कर दें।

रद्दी की टोकरी में डाल दो आंकड़े

इन आंकड़ों को रद्दी की टोकरी में फेंक देना चाहिए। गरीबी निर्धारण के जो तरीके होने चाहिए, उसे नहीं अपना कर बेकार की बातें देश के सामने पेश कर दी गई हैं। इससे किसी समस्या का समाधान नहीं होने वाला। तेंदुलकर साहब का खेल तो पहले ही गलत था और उसका काफी विरोध भी हुआ था। अब सरकार उसी खेल को अपनाकर एक नया खेल करना चाह रही है। ये जो प्रयास किए गए हैं, वह आरबीर्टी है। बिल्कुल ही अवैज्ञानिक तरीका। इसे एक शर्मनाक आंकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है। – प्रो. प्रवीण झा, वरिष्ठ अर्थशास्त्री, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

सरकार ने हद कर दी!

रथ और दांडेकर जैसे अर्थशास्त्री ग्रामीण इलाकों में 2100 कैलोरी और शहरी इलाकों में 2400 कैलोरी आहार पाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर मानने की बात कही थी और वह सही भी था। इस सरकार ने तो हद ही कर दी। क्या कोई आदमी 28 या 22 रुपये में कुछ खा-पी सकता है? अगर खा भी ले, तो जीवन की और जरूरतें कैसे पूरी होंगी? यह सब मजाक से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। सरकार दिखाना चाहती है कि पिछले पांच सालों में 6 करोड़ लोग अमीर हो गए हैं। वास्तविकता में ऐसा कुछ भी नहीं है। बिहार में 50 लाख लोग बीपीएल से नीचे चले गए हैं। पूरा नॉर्थ-ईस्ट और आंध्र प्रदेश से लेकर नेपाल की सीमा तक के इलाके में गरीबी का विस्तार हुआ है । जिस देश में महिलाओं और बच्चों की कुपोषण की कहानी सुनकर प्रधानमंत्री भी चकित हैं, उस देश में गरीबी का आंकड़ा घटाने का खेल बर्दाश्त से बाहर है। यह कैसा विकास है कि पिछले 15 सालों से हर प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर के विकास के नाम पर भरपूर पैकेज देते हैं और उन प्रदेशों में गरीबी और बढ़ी है। – प्रो. आनंद कुमार, प्रसिद्ध समाजशास्त्री

 

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक हमवतन से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख हमवतन से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

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