चौतरफा हम मिलकर टूटें कुछ तुम लूटो कुछ हम लूटें। लाइसेन्स-टेण्डर परमिट कोटा। बहुत बड़ा हो या छोटा। सब अपने ही लोगों में हो। कोई रिश्तेदार न छूटे। ट्रान्सफर पोस्टिंग घूस दलाली में भी अपनी भागीदारी। जनता अपने करम की मारी। अतिक्रमण अभियान चलाएं। बने बनाए घर गिरवाएं। सुख, समरसता, शांति सुरक्षा। स्वास्थ्य, सफाई, सड़कें, शिक्षा। नहीं किसी को मिलने पाए। आओ इसकी कसम उठाएं। भूकम्प बाढ़ भूस्खलन सरीखी आएं जब-जब भी विपदाएं। हम हैलीकाप्टर से जाएं। सर्वेक्षण कर वापस आएं। बाकी डूबे या उतराएं। आओ मिलकर देश चलाएं। बने हमेशा बात के पक्के। वी.आई.पी हों चोर उचक्कें। गुण्डों को सम्मान दिलाएं।
जो है अटके भूले भटके। उनको गैस्ट्रो हैजा गटके। दीनःदुखी निबलों विकलों को नकली कडुआ तेल पिलाएं। जल्दी से ऊपर पहुंचाएं। आबादी अनुपात घटाएं। छल दम्भ द्वेष पाखण्ड झूठ अन्याय में निषि दिन चूर रहें। हम जाति-धर्म में बांटे सबकों। जगह-जगह देशी दारू के बडे़-बड़े अड्डे चलवाएं। और कहें उठ जाग मुसाफिर भोर भई-अब मंजन कर ठेके पर चल। जी भर के पी, छूरा निकाल। फिर चेन खींच या बैंक लूट। है खुली छूट। मेरा हिस्सा मुझको दे जा। जा मौज मना। तू भविष्य है पीढ़ी का। तू है समाज का स्वाभिमान। स्मैक बेच। स्मगलिंग कर। जिससे होवे भारत महान।
ऐ मेरे वतन के लोगों लो पी लो मिनरल पानी। जो मरे भूख से जनता इसमें कैसी हैरानी। कोई सिख कोई जाट मराठा कोई गोरखा कोई मद्रासी। घोटाला करने वाला हर वीर है भारत वासी। जब देश में होवे होली तब हर घर में फाका। जब सब बैठे हो घरों में हम डाल रहे हो डाका। सूरज निकला चिड़िया बोली। ए.के सैंतालिस की गोली। उग्रवाद की खूनी होली। मंहगाई की छाए मस्ती। आटा महंगा कारें सस्ती। सब्जी सूंघे, दाल देखकर। बच्चों को सल्फास खिलाएं। आओं मिलकर देश चलाएं। फ्रिज से थोड़ा परमाणु निकालों। उसमें भगवा रंग मिला लो। एक बड़ा बैनर बनवा लो बड़ी-बड़ी फोटो खिंचवा लो। नंगी-भूखी आबादी को फिर उसके दर्शन करवा दो। चलकर गौरव दिवस मनाएं। सत्य अहिंसा सदाचार को मार भगा दें। भाई चारा। हो बेचारा। नैतिकता रोए शर्माए। हिंसा की भठ्ठी गरमाए। तब होवे प्रण पूर्ण हमारा। अन्याय की डगर पर हम सब दिखाएं चल के। ये देश है हमारा खा जाएं इसको तल के।
लेखक पीयूष त्रिपाठी लखनऊ में साप्ताहिक पत्रिका इतवार के ब्यूरोचीफ हैं.


