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आखिरकार! हमें इन प्रश्‍नों के उत्‍तर ढूंढ़ने ही होंगे

आखिरकार 29.12.12 की काली गहरी रात। समय 2 बजकर 15 मिनट माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल। ‘‘दामिनी’’ हॉं हमारी बहन, हमारी बेटी, हमारा हिस्सा! हमें सदा-सदा के लिए छोड़, मुक्ति को प्राप्त हो गई। न्यूज चैनलों पर प्रसारण का नया दौर शुरू। नेताओं के चेहरे एवं सांत्वना एवं दुखःदर्शाती बाइट। शायद यही हश्र है, एक दुखी, पीड़ित एवं त्रस्त आत्मा के मोक्ष का। मुनारिका का बस स्टॉप, समय रात के 9:00 बजे, समय उस काली रात का गवाह बना जिसने दामिनी जैसी होनहार पैरामेडिकल की छात्रा का सबसे बुरा हश्र देखा। पिछले 13 दिनों से कुछ तथा कथित जनप्रतिनिधियों का दुस्साहसपूर्ण टीवी उवाच, पुलिसिया दमन का वीभत्स चेहरा एवं टीवी चैनलों द्वारा पैनलों के नोंक-झोंक का प्रसारण आखिर क्या मिला। सिर्फ सतही आश्‍वासन, ठोस कदम, उठाने के वादे, मंत्रियों की खीझ एवं पत्रकारों के चुभते प्रश्‍न। खोया क्या-2 एक साहसी मां की दुलारी, पिता के ऑंखों का तारा, भाई की प्यारी बहना एवं परिवार की उम्मीदें-‘‘दामिनी’’। इन्हीं हालत को देखकर मानसिक झंझावात से उठते सवाल। हमें इन प्रश्‍नों का उत्तर ढूंढ़ना होगा।

आखिरकार 29.12.12 की काली गहरी रात। समय 2 बजकर 15 मिनट माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल। ‘‘दामिनी’’ हॉं हमारी बहन, हमारी बेटी, हमारा हिस्सा! हमें सदा-सदा के लिए छोड़, मुक्ति को प्राप्त हो गई। न्यूज चैनलों पर प्रसारण का नया दौर शुरू। नेताओं के चेहरे एवं सांत्वना एवं दुखःदर्शाती बाइट। शायद यही हश्र है, एक दुखी, पीड़ित एवं त्रस्त आत्मा के मोक्ष का। मुनारिका का बस स्टॉप, समय रात के 9:00 बजे, समय उस काली रात का गवाह बना जिसने दामिनी जैसी होनहार पैरामेडिकल की छात्रा का सबसे बुरा हश्र देखा। पिछले 13 दिनों से कुछ तथा कथित जनप्रतिनिधियों का दुस्साहसपूर्ण टीवी उवाच, पुलिसिया दमन का वीभत्स चेहरा एवं टीवी चैनलों द्वारा पैनलों के नोंक-झोंक का प्रसारण आखिर क्या मिला। सिर्फ सतही आश्‍वासन, ठोस कदम, उठाने के वादे, मंत्रियों की खीझ एवं पत्रकारों के चुभते प्रश्‍न। खोया क्या-2 एक साहसी मां की दुलारी, पिता के ऑंखों का तारा, भाई की प्यारी बहना एवं परिवार की उम्मीदें-‘‘दामिनी’’। इन्हीं हालत को देखकर मानसिक झंझावात से उठते सवाल। हमें इन प्रश्‍नों का उत्तर ढूंढ़ना होगा।

प्रथम यह कि दामिनी जैसी लाखों महिलाओं के शोषण का जिम्मेदार कौन, बलात्कार जैसी ‘‘कुत्सित’’ सोच का केन्द्र क्या है, शायद हमारी बदलती सामाजिक संस्कृति। हमारी जरुरतों एवं समस्याओं का हल अब सतही संस्कृति में मिलने लगा है। सुसभ्य समाज की कमजोर पड़ती जड़ें। इनको मजबूती प्रदान करने वाली वैदिक संस्कृति, धार्मिक मूल्यों में हृलास, संस्कारों में होता संक्रमण ऐसे कुछ कारक है जिन्होंने हमारी सोच को विकृत मोड़ दे दिया है। अब कहॉं ऐसा होता है कि जब घरों में धार्मिक संस्कार हो रहे हों तो हमारे बच्चे उसमें शरीक हो। इतना ही नहीं अब कहॉं वेद मन्त्रों या नातों के कैसेट घरों में बजते हैं। हम आप अपने बच्चों द्वारा द्विअर्थी गाने सुनकर, उन्हें इन गानों पर डॉंस करते देख एवं मीडिया चैनलों में ऐसे सीरियलों की भरमार जो कि दमनकारी या शोषण को नए-नए हथकण्डे अपना कर बलशाली होते समाज में सम्मान पाते कई एपीसोड तक, शोषित का क्षणिक सुखदोत देखकर, अपने आपको मार्डन होने के नाम धन बल की चर्चा एवं शिक्षिक एंव शिक्षिकाओं के द्वारा गलत बात पर दंडित किये जाने पर घरों में अपशब्द से बच्चों का प्रोत्साहन करते हैं। शायद यही है हमारी युवा भ्रमित, कुत्सित मानसिकता जो लाखों दामिनियों, बहुओं, बेटियों के शोषण एवं उनके प्रति हिंसक दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं। हमारी सोच एवं मानसिक विकार। ऐसी संस्कृति में दामिनी एक नहीं थी अनेक दामिनियॉं संत्रास झेलती जीवित है सिसकती जीती रहेंगी।

दूसरा प्रश्‍न यह उठता है कि समाज में श्‍वेत वस्त्रधारी ‘‘दबंग’’ एवं ‘‘बाहुबली’’ संस्कृति को बढ़ावा देने वाले ‘‘निडर’’, ‘‘निरंकुश’’ एवं ‘‘मेरा कोई क्या कर लेगा’’ जैसी सोच के पोषक, चमचों, गुण्डों एवं बन्दूकधारियों से आच्छादित, पलपल को स्वयं सुरक्षा कवच से ढंक कर दूसरों को डराने वाले एवं चुनावों में धर्म, जाति, रिश्‍वतखोरी एवं डर पैदा करने वाले कुछ जनप्रतिनिधि ‘‘दामिनी’’ जैसी हजारों की दामिनियों को रोज कुत्सित जीवन जीने के लिए मजबूर कर रहे हैं। भ्रष्‍टाचार का सबल हथकंडा इनसे शासकीय भय से आच्छादित रखता है। हमारी युवा पीड़ी में कुंठा, निराशा एवं असुरक्षा का माहौल पैदा करने वाले ही उन्हें दामिनी जैसी महिलाओं के प्रति हिंसक एवं घटिया सोच बनाने वाले हैं। क्या हम ऐसे प्रतिनिधियों को अपना नेतृत्व देते रहेंगे जो बगैर सुरक्षा कवच के हमसे मिल तक नहीं सकते, जो हमारे समाज को बॉंट रहे हैं, जो बिना गुण्डों, वाहनों की फौज एवं बन्दूकधारियों के बगैर घर से बाहर नहीं निकल सकते। हमारी दामिनी अगर आज मरती है तो उसका जिम्मेदार हमारी सोच, हमारी नेतृत्व चयन की समझ है। ऐसे ही कुछ मानिन्दों का आश्रय लेने वाले अपराध कर आम आदमी का दमन करते हैं। हम सिर्फ ऑंसू बहाते रहेंगे और ‘‘दामिनी’’ इसी तरह से रोज शोषित, पीड़ित एवं मरती रहेगी।

तीसरा प्रश्‍न पुलिस एवं प्रशासन को लेकर उठा है, भ्रष्‍टाचार की गहरी जड़ों से प्रभावित व्यवस्था जो स्वयं किसी नेता, मंत्री के दबाव से ग्रस्त है, उसे आम आदमी की शिकायत पर एफआईआर करने के लिए शिकायत कर्ता की हैसियत के अनुसार विश्‍लेषण करना पड़ता है। ईमानदार कर्तव्य निष्‍ठ पुलिस एवं अधिकारी शोषण दमन एवं तबादलों के शिकार होते हैं। इन पर मोहल्ले के सभासद से लेकर बड़े-बडे नेता का दबाव इस कदर होता है कि वे चाहकर भी कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकते हैं। इनका अधिकतर साहब के बंगलों से लेकर साहब की सुरक्षा में लगा हुआ है। आश्‍चर्य है वे असुरक्षित हैं जिन्हें हम चुनते हैं, जिन्हें हमारी सुरक्षा करनी है, दामिनी को बचाना है शायद ऐसा सोचा जा सकता परन्तु व्यवहार में बिल्कुल नहीं। इन्सानों का दिल रखने वाली पुलिस जिसका हाथ आदमी के साथ होना चाहिए, अपने दबाव का आक्रोश पुलिसिया कार्रवाई में दिखाती है। हमें समझना होगा। समाज का बहुमूल्य केन्द्र परिवार हमारे प्रश्‍नों का चौथा केन्द्र है। हम हमेशा दूसरों को आसानी से किसी भी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। क्या कभी सोचा है लड़कों के प्रति हमारा रवैया कैसा है। उनकी हर जिद को पूरा करना, उनकी दिनचर्या न जानना, उनकी संगति से अनभिज्ञ रहना, उन्हें उन्मुक्त जीवन की छूट देना, गलती करने पर उन्हें सुरक्षा कवच देना उनकी ऊर्जावान, उर्वरक शक्ति जो कि राश्ट्र का एक मजबूत स्तम्भ बनती है का अनाचारी बनने की ओर हमारा कदम है। हम ‘‘क्या करें’’ जैसी मजबूर संस्कृति से ‘‘हमें करना है’’ जैसी नियंत्रक संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। लड़कियों का पीछा करना, फिकरे कसना, बेहूदा इशारे करना, मोबाइल से मिसकाल करना, फेसबुक, आर्कुट कल्चर जैसे संचार का गलत उपयोग करना आखिर किसकी देन है। हम अपनी औलादों से आखिर क्यों मजबूर हैं। उनपर अतिविश्‍वास क्यों, उनके गलत कामों में सहयोग क्यों, शायद ऐसी मानसिक बाहुबली सोच का शिकार हुई ‘‘दामिनी’’ नहीं रही और इसी प्रकार मरती रहेगी।

आखिर में हमारे जनप्रतिनिधि जो सर्वोच्च है कि टीवी पर ‘‘मेरी तीन बेटियों’’ से नहीं ‘‘मेरी हर भारतीय लड़की दामिनी’’ की सोच में परिमार्जन, ‘‘सरकार हर किसी से नहीं मिल सकती’’ जैसे टीवी बाइट को बदलकर हर आक्रोषित तक पहुंचकर उसकी पुकार को समझना होगा। जनप्रतिनिधि महोदय आप हमसे हैं, हम आपसे नहीं। आप सुरक्षा बलों की आड़ से अपने बंगलों से टीवी बाइट देते हैं। आपके पास हमारे लिए समय नहीं तो आने वाला एवं जनशक्ति आपको आपकी बात का मतलब बतायेगी। आप तो जनाक्रोश से डरे हैं, धारा 144 लगाकर, ट्रेनें रोक कर, रास्तों पर पुलिस बल लगाकर, आप जनाक्रोश को कुचल सकते हैं पर कानून बनाने, न्याय दिलाने, बार-बार सोच, हमारे आक्रोश को दबा नहीं पायेंगे। समय आपको बतायेगा। कानून का सख्ती से पालन बहुत जरुरी है। हमें अपने बच्चों में संस्कार की जड़े मजबूत करनी होगी। सिर्फ कानून बनाने से नहीं। यत्र नारयस्त पूजयन्ते की जड़े मजबूत करनी होगी।

हे दामिनी तुम्हें मेरी श्रद्धांजलि।

लेखक प्रदीप कुमार श्रीवास्‍तव सुल्‍तानपुर के रहने वाले हैं.

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