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आरक्षण पर विरोध-समर्थन से बेफिक्र हैं लखनऊ के जूता-तराश मोची

लखनऊ : आरक्षण के समर्थन और विरोध से अलग लखनऊ में एक मोचियों का बड़ा कुनबा न सिर्फ बेफिक्र है, बल्कि लखनऊ समेत आसपास के जिलों में अपनी एक अनोखी पहचान भी बनाने में जुटा है। उत्‍पादन के मामले में लगातार सिकुड़ती जा रही राजधानी में इस जीनगर कुनबे में छोटा ही सही, मगर उथल-पुथल किया है। हालत यह है कि लखनऊ की मशहूर रेवड़ी और गजक तथा पॉटरी यानी कुम्‍हारी जैसे पुश्‍तैनी स्‍थानीय कारोबार की पहचान भले ही धूमल पड़ रही हो, यह कुनबा तेजी से अपने पांव मजबूत कर रहा है। जी हां, जूता-तराश। चाहे अमीनाबाद, आलमबाग, सदर, निशातगंज हो या चौक के तंग बाजार। या फिर साप्‍ताहिक तर्ज पर लगनी वाली बाजारें।

लखनऊ : आरक्षण के समर्थन और विरोध से अलग लखनऊ में एक मोचियों का बड़ा कुनबा न सिर्फ बेफिक्र है, बल्कि लखनऊ समेत आसपास के जिलों में अपनी एक अनोखी पहचान भी बनाने में जुटा है। उत्‍पादन के मामले में लगातार सिकुड़ती जा रही राजधानी में इस जीनगर कुनबे में छोटा ही सही, मगर उथल-पुथल किया है। हालत यह है कि लखनऊ की मशहूर रेवड़ी और गजक तथा पॉटरी यानी कुम्‍हारी जैसे पुश्‍तैनी स्‍थानीय कारोबार की पहचान भले ही धूमल पड़ रही हो, यह कुनबा तेजी से अपने पांव मजबूत कर रहा है। जी हां, जूता-तराश। चाहे अमीनाबाद, आलमबाग, सदर, निशातगंज हो या चौक के तंग बाजार। या फिर साप्‍ताहिक तर्ज पर लगनी वाली बाजारें।

गोंडा, श्रावस्‍ती-बहराइच से लेकर फैजाबाद, रायबरेली, उन्‍नाव, हरदोई, सीतापुर जैसी बाजारों में फैंसी जूतों का जो अम्‍बार दीखता है, वह इसी जीनगर समाज की देन ही है। यह दीगर बात है कि इस बाजार पर इस कुनबे का कब्‍जा नहीं है, लेकिन उसके निर्माण का पूरा-पूरा धंधा केवल इस कुनबे के बल पर ही है। हैरत की बात है कि जीनगर समाज के अलावा अभी तक कोई भी शख्‍स इस धंधे में नहीं आया। एक हैरतअंगेज बात और भी कि इस काम और अपने हुनर के बावजूद यह कुनबा खुद को केवल जूता-तराशी के एकक्षत्र आधिपत्‍य तक ही समेटा रखा, बिक्री के मोर्चे पर नहीं। हालांकि अब इस खोल से बाहर निकालने की कवायदें शुरू हो गयी हैं। रानीगंज और बशीरतगंज में खुली दो दूकानें जीनगर समाज के लोगों ने शुरू की हैं।

करीब 62 साल पहले बनकट चवान ने अपने परिवार को भुखमरी से बचाने के लिए राजस्‍थान के नागौर से अपना डेरा लखनऊ में डाला था। काम था वही पुश्‍तैनी मोची का। बनकट वही नागौरी या नागरा जूतों को तराशते थे। चमड़ा साफ करने के बाद उसे धुलने और रंगने के बाद तैयार चमड़ा से खूबसूरत जूतों और जूतियों तथा सैंडिलें में यह राजस्‍थानी नागौरी मोचियों ने खुद को निर्माण पर हस्‍तक्षेप करना शुरू किया। कहा जाता है कि 80 के दशक से ही मध्‍यमवर्ग के उपभोक्‍ताओं के लिए नागरा जूतों पर जीनगर समाज का बड़ा योगदान रहा। इसके बाद से ही फैंसी मालों की खपत जूता बाजार में पटनी शुरू हो गयी। 30 साल पहले तक लखनऊ की बाजारों में स्‍थायी उत्‍पादनों के बजाय अस्‍थायीत्‍व का बोलबाला शुरू हुआ, तो इन मोचियों ने अपने हुनर को नये दौर में खुद को ढालना शुरू कर दिया। संपतलाल सोनगरा के मुताबिक इस धंधे-कौशल में आते बदलाव के अनुसार जब महारत हासिल हुई तो जुझारू कामगरों की जरूरत पड़ी। निदान, कामगारों की आपूर्ति अपने खानदान नागौर कुनबे से होने लगी। कामगरों ने केवल अपने गोत्र को ही अपनाया, बल्कि सोनगरा, निर्वाण, असेरी, सांखला, खत्री, गहलौत, डाभी, जोइया, चवान आदि परिवार भी इस कुनबे में प्रमुख तौर पर शमिल हैं।

आज लखनऊ के रानीगंज, बशीरतगंज, कच्‍ची भुइयन, हरीनगर, गोकुल गली और मालवीय नगर मोहल्‍लों में 250 से ज्‍यादा परिवार मौजूद हैं। हर परिवार में 8 से 10 सदस्‍य हैं और हर सदस्‍य रोजाना काम की जरूरत के मुताबिक 12 से 15 जोड़ी माल तैयार करता है। दिनचर्या है तड़के सुबह से देर शाम तक। हफ्ते भर का कच्‍चा माल नक्‍खास की बड़ी दूकानों से खरीदा जाता है और माल तैयार करने के बाद उसे नक्‍खास के थोक दूकानों पर बेचा जाता है। वहीं से ही खुदरा व्‍यवसायी उसे बाजारों में रौशन करते हैं। मतलब यह कि इस निर्माण की मजदूरी पर ही पूरा कुनबा आश्रित है। जूता-तराश नटवरलाल बताते हैं कि हम केवल जूता बनाते हैं, बिक्री पर हमारा दखल नहीं है। व्‍यापारी से कच्‍चा माल खरीदना और पक्‍का माल उसे वापस बेचना हमारी नियति है। यानी हमारी ही जूती, हमारे ही सिर पे। बिक्री में हाथ डालने के सवाल पर उनका कहना है कि पहली बात तो यह हमारे पास इतना पैसा नहीं है। और अगर हो भी तो सेल्‍स-फेल्‍स टैक्‍स जैसे झंझट में कौन फंसे। हैरत की बात है कि इस जीनगर समाज के किसी भी पास बैंक-खाता नहीं है, लेकिन महिलाओं के पास सोने के आभूषण तो खूब हैं। चांदी का इस्‍तेमाल तो यह समाज हर्गिज पसंद नहीं करता। बाल-विवाह वर्जित है, ठीक वैसे ही जैसे लड़कियों की शिक्षा।

एक अन्‍य जूता-तराश पप्‍पू सोनगरा बताते हैं कि वोट के लिए हमारी तादात को इस्‍तेमाल किया जाता है। जीनगर समाज के पास 2000 से ज्‍यादा वोट हैं। हमारे समाज के मंदिर के लिए 15 साल से स्‍थानीय सभासद सतीश साहू ने दावे किये, लेकिन अब तक कुछ नहीं किया। अब तो वे हमारी ओर झांकने तक नहीं आते हैं। मोतीझील वाले मांगीलाल निर्वाण के भाई बाबूलाल का अपहरण के बाद हत्‍या कर दी गयी, लेकिन पुलिस अब तक खुलासा तक नहीं कर पायी है। कुछ भी हो, जीनगर समाज अपने हुनर को तो तराश ही रहा है। अपने अराध्‍य-देव रामदेव की यह पंक्तियां उसे लगातार ऊर्जावान बनाये रखती हैं। वे तो मातम में भी दर्शन देखते और सवाल खोजते रहते हैं। मसलन, जीनगर समाज का यह मातम-गीत है:- हंसा निकल गये काया से, पूनी पड़ी तस्‍वीर। वो हंसा सतलोक सिधाये, धर्मदास धर धीर। धर्मदास पूछै हंसे को किस विध रखे सरीर।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के जाने माने और वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. यह लेख डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में प्रकाशित हो चुका है.

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