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आर्थिक दृष्टि से हिंदी-चीनी की है जरूरत : प्रो. पाण्‍डा

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में ‘भारत-चीन के रिश्‍तों में हिंदी व चीनी भाषा की भूमिका’ विषय पर आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह के दौरान बतौर विशिष्‍ट अतिथि पंजाब विश्‍वविद्यालय, चंडीगढ़ के चीनी व तिब्‍बती भाषा विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. दामोदर पाण्‍डा ने कहा कि वैश्विक परिदृश्‍य में आर्थिक दृष्टिकोण से चीन और भारत के संबंधों में मजबूती लाने के लिए दोनों भाषाओं की महती भूमिका है। विवि के भाषा विद्यापीठ में आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह की अध्‍यक्षता विवि के प्रो. रामशरण जोशी ने की। इस दौरान वरिष्‍ठ साहित्‍यकार व विवि‍ के राइटर-इन-रेजीडेंस से.रा.यात्री तथा चीनी भाषा के असिस्‍टेंट प्रोफेसर अनिर्बाण घोष मंचस्‍थ थे। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में प्रो.जोशी ने कहा कि भारत और चीन दोनों ही आर्थिक ताकत के रूप में उभरता हुआ देश है। दोनों के बीच आर्थिक-व्‍यापार की दृष्टि से हिंदी-चीनी भाषा को लोग रोजगार पाने के ख्‍याल से इसे अपना रहे हैं।

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में ‘भारत-चीन के रिश्‍तों में हिंदी व चीनी भाषा की भूमिका’ विषय पर आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह के दौरान बतौर विशिष्‍ट अतिथि पंजाब विश्‍वविद्यालय, चंडीगढ़ के चीनी व तिब्‍बती भाषा विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. दामोदर पाण्‍डा ने कहा कि वैश्विक परिदृश्‍य में आर्थिक दृष्टिकोण से चीन और भारत के संबंधों में मजबूती लाने के लिए दोनों भाषाओं की महती भूमिका है। विवि के भाषा विद्यापीठ में आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह की अध्‍यक्षता विवि के प्रो. रामशरण जोशी ने की। इस दौरान वरिष्‍ठ साहित्‍यकार व विवि‍ के राइटर-इन-रेजीडेंस से.रा.यात्री तथा चीनी भाषा के असिस्‍टेंट प्रोफेसर अनिर्बाण घोष मंचस्‍थ थे। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में प्रो.जोशी ने कहा कि भारत और चीन दोनों ही आर्थिक ताकत के रूप में उभरता हुआ देश है। दोनों के बीच आर्थिक-व्‍यापार की दृष्टि से हिंदी-चीनी भाषा को लोग रोजगार पाने के ख्‍याल से इसे अपना रहे हैं।

हिंदी-चीनी के बीच के मैत्रीपूर्ण संबंधों का जिक्र करते हुए अनिर्बाण घोष ने कहा कि सन 1917 में चीन में हिंदी भाषा की पढ़ाई शुरू हुई और 1918 ई. में कोलकाता विश्‍वविद्यालय में चीनी भाषा की पढ़ाई की शुरूआत हुई। दोनों देशों के मैत्रीपूर्ण संबंधों में हिंदी-चीनी भाषा की भूमिका महती रही है। सन् 1954 में चीन और भारत के बीच छात्र और अध्‍यापकों का आदान-प्रदान शुरू हुआ जिसमें चीन से कुछ छात्र हिंदी सीखने के लिए भारत आए थे। बाद में ये विद्यार्थी चीन में इंडोलॉजी और हिंदी के विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्‍होंने बताया कि पीकिंग विवि के हिंदी विभाग में हिंदी भाषा पर बहुत काम हो रहा है, हिंदी व्‍याकरण, वृहत हिंदी-चीनी शब्‍दकोष, हिंदी मुहावरे शब्‍दकोष प्रकाशित कर चीन में हिंदी के प्रति रूचि बढ़ायी है। अभी चीन के करीब 10 विश्‍वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में चीन से 13 विद्यार्थी हिंदी सीखने आए हैं। ये विद्यार्थी यहां से हिंदी सीखकर चीन लौटेंगे तो यहां की संस्‍कृति को भी साथ ले जाएंगे और हम भी वहां की संस्‍कृति से रू-ब-रू हो रहे हैं। संयोजन एवं संचालन अनिर्बाण घोष ने किया। इस अवसर पर विवि के डॉ. जयप्रकाश ‘धूमकेतु’, डॉ.रवि कुमार, डॉ. अनिल दूबे, डॉ. अनवर सिद्दीकी सहित बड़ी संख्‍या में चीनी विद्यार्थी, शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी मौजूद थे।

अमित विश्‍वास की रिपोर्ट.

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