वर्ष 2011 के अक्टूबर महीने में फारवर्ड प्रेस में प्रेम कुमार मणि का लेख ‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन’ प्रकाशित हुआ। पत्रिका के कवर पेज पर भैंसा पर सवार महिषासुर की हत्या का बहुप्रचलित फोटो प्रकाशित था। बचपन में दुर्गा पूजा के पंडालों में भैसे पर सवार महिषासुर को देखकर अपनत्व महसूस होता था। महिषासुर जैसे कद-काठी के कई लोग हमारे गांव में थे परंतु दुर्गा जैसी एक भी महिला हमें अभी तक देखने को नहीं मिली थी। पशु पालन पारंपरिक पेशा होने के कारण भैंस/भैंसें से आत्मीय लगाव बचपन से ही था। भैंस की पीठ पर चढ़ कर गांव से चारागाह की तरफ प्रस्थान करते हुए हम एक दूसरे को चिढ़ाने के लिए कहते कि -‘ तुम महिषासुर जैसे लग रहे हो!’ बाद के दिनों में मैंने देखा कि पिछड़ों के नेता लालू प्रसाद को कार्टूनिस्ट हमेशा भैंस के साथ दिखाते हैं। जिस समय वे रेल मंत्री थे, उस समय उन्हें रेल में सींग लगाकर उसके उपर उन्हें सवारी करते दिखाया जाता। प्रेम कुमार मणि का लेख ‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन’ पढ़ने के बाद मुझे लगा जैसे तीसरी आंख खुल गई, और दिखाई दिया कि महिषासुर से इस देश के पिछड़ लोगों का खून का रिश्ता है, वे हमारे पूर्वज हैं।
महिषासुर और दुर्गा का मिथक – महिषासुर बंग प्रदेश के महाप्रतापी राजा थे। बंग प्रदेश अर्थात गंगा युमुना के दोआब में बसा हुआ उपजाउ मैदान जिसे आज बंगाल, बिहार और उड़ीसा के नाम से जाना जाता है। आर्यों ने जब बाहर से आक्रमण किया तो उनका सबसे पहला निशाना उपजाउ जमीन ही थी। आर्यों में भंडारण की प्रवृति सबसे ज्यादा थी। कृषि आधारित समाज में भूमि का वही महत्व था जो आज उर्जा के स्रोतों का है। आर्य इस प्रदेश पर कब्जा जमाना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने कई बार हमले किए परंतु प्रत्येक बार उन्हें राजा महिषासुर की संगठित सेना से हारना पड़ा था। महिषासुर का प्रण था कि महिलाओं पर हाथ नहीं उठाएंगे और और पशुओं का वध नहीं करेंगे क्योंकि वे स्वयं पशुपालक समाज से आते थे। परंतु यही मानवीय गुण ही महिषासुर की कमजोरी बन गई। मणि जी ने अपने लेख में बहुत सही लिखा था – ‘बल नहीं तो छल, छल का बल।’ महिषासुर की हत्या पशु पर सवार एक महिला के हाथों की गई। दुर्गा को राजा महिषासुर की हत्या करने में नौ दिन लगे। इन दिनों में देवता महिषासुर के किले के चारों तरफ जंगलों में भूखे-प्यासे छिपे रहे। जिसके कारण दुर्गा को मानने वाले लोगों में आठ दिनों के व्रत-उपवास का प्रचलन है। आठ दिनों तक दुर्गा महिषासुर के किला में रही और और नौवे दिन उसने द्वार खोल दिये और महिषासुर की हत्या हुई। महिषासुर की हत्या को आज तक वध कह कर न्यायसंगत ठहराया जाता रहा परंतु वह एक प्रतापी राजा की नृशंस हत्या थी।
असुर कौन थे? : असुर शब्द से भयानक और विकराल मनुष्येत्तर तस्वीर सामने आती है। राक्षस, दानव आदि उपनामों से जाने वाले असुर भी मनुष्य ही थे इस सत्य को आज तक छुपाया जाता रहा है। प्रेम कुमार मणि के अनुसार ‘असुर यानी जो सुर नहीं है। सुर काम नहीं करते असुर काम करते हैं। दरअसल इस देश के बैकवर्ड जिन्हें संवैधानिक भाषा में एसटी, एससी और ओबीसी कहा जाता है और जिन्हें हिन्दू धर्म ने शूद्र और अछूत की संज्ञा दिया, वे सभी लोगों का पौराणिक नाम असुर है। झारखंड में असुर नाम की एक आदिवासी जाति पाई जाती है जो आज भी महिषासुर और अन्य असुरों को अपना पूर्वज मानते हुए उनकी पूजा करती है। असुर ब्राम्हण धर्म विरोधी अनार्य लोग थे। हिन्दू धर्मग्रंथ असुर और सुर की कहानियों से भरे पड़े हैं। इन सभी कहानियों में असुर लोगों को बलशाली और सुखी-संपन्न दिखाया गया है। रावण का तो सम्पूर्ण प्रदेश ही सोने का था। असुर अथवा कथित राक्षसों के चाल-चरित्र से लगता है कि वे लोग बेहद मानवीय लोग थे। देवताओं/आर्यों से उनका विरोध था जिसके कारण वे उनके द्वारा किये जा रहे यज्ञ आदि ब्राम्हण कर्मकांडों का विरोध करते थे। पूरी कहानियों में कहीं भी असुरों ने किसी के साथ छल नहीं किया है। इसके विपरीत देवता/सूर/आर्यों ने हमेशा इन असुर कही जाने वाली जातियों को छला है। सभी हिन्दू पौराणिक कहानियों में इनकी जीत का आधार छल/झूठ और फरेब ही है।
दरअसल अनार्यों, जो यहां के मूल निवासी थे, के पास प्राकृतिक संसाधनों का अपार भंडार था, जिस पर आर्य कब्जा करना चाहते थे। जिसमें यज्ञ सबसे बड़ा हथियार का काम करता था। यज्ञ आर्यों द्वारा किए जाने वाला एक जलसा का नाम था जिसमें जंगलों की लकडियों को काट कर जलाया जाता था। जिसका वन प्रदेश में रहने वाले अनार्य विरोध करते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके जंगलों को जलाया जाय। गौरतलब है कि देवताओं के समस्त नायकों के अवतार का एक मात्र कारण यज्ञ-रक्षा ही है। दरअसल असुर, राक्षस, दानव आदि शब्दों में घृणा भर दी गयी है। कोई भी जाति जब किसी दूसरी जाति के संसाधनों पर कब्जा करती है तो उसके पहले वह उसे बर्बर घोषित करती है। आज अमेरिका भी आतंकवाद के नाम पर इराक, आफगानिस्तान समेत पूरे अरब मुल्कों पर घात लगाये हुए है। मुसलमान शब्द आज के समय में खौफ और घृणा का पर्याय बना हुआ हैं। दरअसल महिषासुर की हत्या के पीछे संसाधनों की लड़ाई ही है। उनकी हत्या के बाद बंग प्रदेश के उपजाउ भूमि पर आर्यों का कब्जा हो गया और उनकी प्रजा को गुलाम बना लिया गया। आज पिछड़ों की दीनदशा का कारण ही उनके नायक की हत्या के परिणामस्वरूप उनकी गुलामी ही है।
क्या है महिशासुर का आंदोलन? : ‘हम गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं।’ ऐसा विरोधियों के साथ-साथ अपने लोगों के भी सवाल हैं। यह सवाल मुझे जेएनयू के प्रेसिडेंटिएट डिवेट में भी किया गया। दरअसल महिषासुर को याद करना अपनी जड़ों की तरफ लौटने का प्रयास है। आज तक हमारे अनपढ़ पूर्वजों को अपने ही लोगों के खिलाफ खड़ा किया जाता रहा। आरक्षण के फलस्वरूप उच्च शिक्षा प्राप्त ओबीसी के युवा अपने को इतिहास के साथ-साथ मिथकों में भी ढूढ रहे हैं। अपने नायकों की तलाश का प्रतिफल ही महिषासुर की शहादत दिवस के रूप में परिणत हुआ है। हम जानाना चाहते है कि आखिर समुद्र मंथन में जो लोग शेशनाग के फन की तरफ थे और जो हजारों की संख्या में मारे गए, उन्हें विष क्यों दे दिया गया? क्या आज हमें विष नहीं दिया जा रहा है? एक रूपक के रूप में आजादी की लड़ाई को यदि समुद्र मंथन कहे और आजाद भारत के संसाधनों को अमृत, तो पिछड़ों के हिस्से में तो आज भी विष ही मिल रहा है। देश के सभी साधनों-संसाधनों और नौकरियों पर ‘देवताओं’ का ही कब्जा है। प्रेसिडेंटिएल डिवेट में मैंने जेएनयू के सवर्ण छात्रों से कहा था कि आप मेरी भावनाओं को समझने का प्रयास कीजिए। हम इतिहास के साथ-साथ मिथकों में भी अपने नायकों को ढूंढ रहे हैं। हमारे इतिहास और मिथकों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
श्याम वर्ण के राम और कृष्ण जो हिन्दू धर्म के सबसे बडे़ अवतार है धर्मग्रंथों में उन्हें विष्णु का अवतार कहा गया हैं। दरअसल, राम-कृष्ण जैसे लोग अनार्यों के नायक रहे होंगे। बाद के दिनों में अनार्य लोगों का हिन्दुकरण करने के लिए उनके नायकों के नाम पर झूठ किस्से-कहानियां गढ़ी गईं, जिसमें उनके चरित्र पर आर्यों के देवता विष्णु का प्रक्षेप कर दिया गया। बुद्ध को विष्णु का अवतार कहना इसका तत्कालीन उदाहरण है। यह बड़ा सवाल है कि आखिर शिव असुरों की पूजा से ही प्रसन्न क्यों होते हैं?
महिषासुर की शहादत दिवस का आयोजन : जेएनयू में महिषासुर की शहादत दिवस मनाने की घोषणा के साथ ही संघियों-सवर्णों के हमले तेज हो गए। हम कार्यक्रम के पोस्टर लगाते और वे उसे फाड़ देते। एक दिन माही-माण्डवी छात्रावास के सामने बैकवर्ड फोरम और विद्यार्थी परिषद के छात्रों के बीच जमकर मार-पीट हो गई। दोनों तरफ से चोटें आई। मुकदमा हुआ और विश्वविद्यालय प्रशासन में बैठे सवर्णों ने मुझे धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में कारण बताओं नोटिस जारी कर दिए। यह मामला लगभग दो महीने तक चला जिसमें अंततः बैकवर्ड छात्रों की विजय हुई। इस संबंध में जेएनयू प्रशासन को माफी मांगनी पड़ी और बैकवर्ड फोरम के बैनर तले 24 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर महिषासुर का आयोजन किया गया। यह सांस्कृतिक क्रांति की पहली सफलता थी। दूसरे साल का आयोजन आश्विन पूर्णिमा 29 अक्टूबर को मनाया गया, जिसमें संगठन को काफी जनसमर्थन मिला। विभिन्न माध्यमों से मिलने वाले बधाई संदेश इस बात का संदेश है कि हम अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं।
माना जाता है कि राजा महिषासुर की हत्या के बाद अश्विन पूर्णिमा की चांदनी रात में उनकी प्रजा इकट्ठा होकर शोक सभा थी। संगठन इस दिन को महिषासुर शहादत दिवस के रूप में प्रत्येक व मनाएगा। हर वर्ष हमारा यह प्रयास होगा कि अगले पांच सालों में उत्तर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में महिषासुर शहादत दिवस मनाया जाय।
लेखक जितेंद्र कुमार यादव जेएनयू के छात्र हैं.


