इंटरनेट एक माध्यम है जो पूरे विश्व को एक ऐसा मंच उपलब्ध कराता है जहां अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है। लेकिन पिछले कुछ सालों में इंटरनेट का जिस तरह दुरुपयोग कह लें या फिर स्वच्छंदता से इस्तेमाल हुआ है उसकी वजह से पूरे विश्व समुदाय में यह बात उठनी स्वाभाविक है अब समय आ गया है कि इंटरनेट पर नकेल कसी जाए। वैसे इंटरनेट पर लगाम लगाने के लिए जेनेवा में वर्ल्ड समिट ऑन इंफॉरमेशन सोसाइटी की जो बैठक हुई है, वह अपने आप में कोई नई पहल नहीं है और न ही आखिरी, क्योंकि इस क्रम में संयुक्त राष्ट्र कमेटी ऑन इंटरनेट रिलेटेड पॉलिसी की सिफारिशों की भी वकालत की गई है, जिसके माध्यम से ही इंटरनेट सम्बंधित नीतियों का नियमन होगा और उन 50 देशों के लिए बाध्यकारी होगा, जो संयुक्त राष्ट्र सीआइआरपी के सदस्य हैं।
वैसे इन परिस्थितियों में सवाल यह खड़ा होता है कि इंटरनेट से सम्बंधित नियमन प्रणाली इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नम्बर्स पहले से कार्य कर रही है, तब अचानक से अन्य और नीतियों के गठन की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल इसके पीछे भी एक संयुक्त वैश्विक सोच हावी है, जो लगभग सभी देशों की पेशानी पर बल पैदा कर देती है और ये सोच अरब क्रांति के बाद से और भी ज्यादा बलवती हो गई है। पूरे विश्व ने देखा कि अरब क्रांति का प्रचार-प्रसार मिस्र, लीबिया, यमन, सीरिया जैसे देशों में इंटरनेट के माध्यम से कितनी सहजता से प्रवाहित होता रहा। ऐसे में कोई भी देश इस तरह की नौबत आने से पहले हर उस माध्यम पर नकेल कस देना चाहेगा, जो उसके लिए चुनौती पेश करेगा। जहां तक इस मुद्दे पर होने वाली बहस की बात है तो इतना तो तय है कि इंटरनेट या सोशल नेटवर्किंग जैसे किसी भी मंच पर लगाम लगाने की बात कही गई है न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे वैश्विक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता की दुहाई दी गई है। बात जब भारतीय परिप्रेक्ष्य में की जाती है तो इस तरह की नकेल कसने की बात ज्यादा मौकों पर व्यक्तिगत हितों तक ही सिमट कर रह जाती है। जैसा कि पिछले कुछ महीनों से कार्टून और फेसबुक पर उपलब्ध सामग्री को लेकर जो बहस छिड़ी है वह इसी की एक कड़ी है। लेकिन जो असली मुद्दा है वह वहीं का वहीं रह जाता है।
दरअसल भारत में दस करोड़ लोग इंटरनेट यूजर और 80 करोड़ मोबाइल यूजर हैं। ऐसे में जब इस तरह इंटरनेट पर लगाम लगाने की बात होती है तो इनके हित और देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़ा होता है, ऐसे में भारत भी उन देशों की श्रेणी में खड़ा नजर आता है, जो देश अपने यहां अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश करते हैं। जहां तक सरकार की बात है तो वह कहती है कि इंटरनेट के नियमन को लेकर किसी भी प्रकार की सेंसरशिप नहीं लगाएगी और अगर किसी भी प्रकार की पहल की भी जाएगी, तो उससे पहले आम राय बनाई जाएगी, लेकिन इसे सरकार की मनमानी कहें या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने की साजिश जब उसने सीआईआरपी मुद्दे पर सहमति देने से पहले किसी भी प्रकार की बैठक तक नहीं की। बहरहाल इंटरनेट या इस जैसे जितने भी सार्वजनिक मंच है वो अभिव्यक्ति के माध्यम अवश्य हैं, लेकिन इसकी सीमा अवश्य निर्धारित होनी चाहिए और अगर इसके लिए संतुलित नियम बनाए जाते हैं तो उसका स्वागत होना चाहिए।
लेखक अजय पांडेय अमर भारती समाचार पत्र में उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं.


