Nazim Naqvi : 12 दिन दामिनी अस्पताल में अपनी सासों से लड़ती रही… और हम अपने अंदर लड़ते रहे… दामिनी की आत्मा ने उस शरीर को आख़िर छोड़ ही दिया जो उसका सबसे बड़ा दुश्मन था… जिसकी चाहत किसी को दरिंदा बना सकती थी… वो हार गई तो क्या हम जीत गये???… क्या अब कोई दामिनी वासना का शिकार नहीं होगी… वो 12 दिन क्या बस हमारे लिए एक याद बनकर रह जायेंगे… या हम ख़ुद को सोचने पर मजबूर करेंगे कि क्यों ऐसे होता है कि एक लड़की अपनी तमाम आज़ादियों के साथ इस समाज में इज़्ज़त को साथ नहीं रह सकती… जो बलात्कार सामने नहीं आते… जिन पर पर्दा डाला जाता है… वो बलात्कारी जो घर की चारदीवारी के अंदर ही बैठा है… उससे कैसे बचा जाय…
जिस समाज में महिलाओं को इस्तेमाल की चीज़ समझा जाता है वहां बलात्कारियों को फांसी की सज़ा देना क्या कोई जवाब हो सकता है… और सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या इस अपराध की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन मर्दों पर है जिन्हें ये पता ही नहीं कि वो क्या कर हे हैं या फिर उन औरतों पर भी है जो अपने बेटों की… अपने पिताओं की… अपने भाइयों की… और अपने पतियों की ऐसी हरकतों पर सदियों से पर्दा डालती आ रही हैं… दरअसल सच्चाई ये है कि हमने जो नहीं सीख के सीखा है वो ये कि मानव सभ्यता की इस लंबी दौड़ में चीज़ों को नज़रअंदाज़ करते रहना ही शायद सबके लिए बेहतर है…
और इस सच्चाई के पैमाने पर ये एक दामिनी नहीं है… इस वक़्त… जब हम और आप ये बातें कर रहे हैं… किसी मोहल्ले… किसी घर के अंधेरे कोने में… किसी होटल के क़ीमती कमरे में कोई दामिनी किसी वहशी की बाहों में मजबूर होकर ख़ामोश हो चुकी होगी… उसकी आंखें चारों तरफ़ ये देख रही होंगी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा… क्योंकि वो अकेली नहीं है… पूरे घर की इज़्ज़त का बोझ सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके ही कंधों पर है… उसे मजबूरी का दर्द इस तरह से सहना है कि किसी को पता न चले… उसे बाप की मूछ… भाई का अहंकार… ख़ानदान की लाज… सबका ख़याल हर क़ीमत पर रखना है… अब आप ही बताइये… इतने झूठे समाज में दामिनी की हिमायत करने वाले हम और आप क्या कभी अपने गिरेबान में झांकने की हिम्मत करेंगे??? या बस इंडिया-गेट पर नारे लगाकर ये साबित करने की कोशिश करेंगे कि देखिये हम उन जैसों में से नहीं हैं… जिन्होंने 17 दिसंबर की रात एक बस में दामिनी के साथ….
वरिष्ठ पत्रकार नाज़िम नक़वी Nazim Naqvi के फेसबुक वॉल से.


