देश में घटती बाघों की संख्या के बीच छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में एक बाघ फिर ग्रामीणों के आक्रोश का शिकार बन गया। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इस पूरे वाकया में वन महकमें की टीम तमाशबीन बनी रही। सवाल उठता है कि सभी परिस्थितयों को जानने के बाद भी वन विभाग इस मसले पर असंवेदनशील क्यों बना रहा? ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हुआ बाघ पिछले डेढ़ महीने से छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर घूम रहा था। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाघ के आतंक से इलाके के ग्रामीण ख़ौफ़ज़दा थे। लेकिन सवाल फिर वही खड़ा होता है कि वन विभाग की टीम बाघ को तलाशने और उसे पकड़ने के साथ-साथ प्रभावित इलाके के लोगों को विश्वास में लेने का प्रयास क्यों नहीं किया?
आखिर क्यों बाघ को पकड़ने में एक्सपर्ट की सलाह नहीं ली गई, जबकि एनटीसीए, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड, डब्ल्यूटीआई जैसे संगठनों से मदद ली जा सकती थी। लेकिन इस पूरे मामले में वन विभाग की टीम ने कभी भी सतर्कता नहीं दिखाई, परिणामस्वरूप देश से एक और बाघ कम हो गया। पूरे विश्व में खासकर भारत में बाघों की घटती संख्या के बीच ऐसी वारदातों का होना वाकई चिंताजनक है। बाघों की घटती संख्या पर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपनी गंभीर चिंता जता चुके हैं। यह विडंबना ही है कि बाघों को बचाने के लिए जितनी योजनाएं चल रही है अथवा बन रही हैं, उतनी ही बाघों की संख्या भी कम होती जा रही है। कभी देश में बाघों की संख्या 40 हजार हुआ करती थी, जिसे आज सरकार महज 1411 बता रही है।
उल्लेखनीय है सन 1972 में बाघों की संख्या 1827 थी जबकि प्रतिष्ठित प्रत्रिका नेशनल ज्योग्राफिक यह आंकड़ा 3750 बताती है। सबसे मजेदार बात ये है कि देश में 1980 के दशक में 1300 बाघों की जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई। लेकिन अफसोस यह है कि सन 1990 के दशक में 600-650 बाघ आश्चर्यजनक ढंग से कम हो गए। बाघों की संख्या में अचानक इतनी कमी कैसे हुई इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। वन्य जीवों के संरक्षण और उनके अवैध शिकार को रोकने के लिए ढेरों योजनाएं चलाई जा रही है। मसलन बाघ संरक्षण और वन विकास हेतु 246 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। यही नहीं 11वीं पंचवर्षीय योजना में भी बाघ संरक्षण के खातिर 650 करोड़ रुपये खर्च किया गया है। लेकिन इतनी राशि कहां, कितना और कैसे खर्च होती है। इसका कोई अतापता नहीं रहता। काम करने का वही पुराना और गोपनीय तरीका जंगल के राजा के लिए आज अभिषाप बन गया है।
सवाल उठता है कि बाघ संरक्षण के नाम पर ढेरों योजनाओं के चलाने और इतनी भारी भरकम राशि खर्चा करने के बाद भी जंगल का राजा आज असुरक्षित कैसे है? जाहिर है बाघों का अवैध शिकार बड़े पैमाने पर हो रहा है। यह दुखद ही है कि सरकार वन्य जीवों के संरक्षण के लिए लाखों-करोड़ों
रुपये पानी की तरह बहाती है। बावजूद इसके देश में वन्य जीवों के संरक्षण और उसके अवैध शिकार को रोकने के लिए महज खानापूर्ती हो रही है। सन 1950 से लेकर अबतक वन्य जीवों की तीस सौ से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी है। सवाल उठता है इसके लिए जिम्मेदार हम हैं या सरकार? जो रोज नये कानून तो बनाती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है। बहरहाल कहीं ऐसा न हो कि प्रकृति का बेहद शानदार जीव बाघ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रहजाए और हम कहें…“एक था बाघ”।
लेखक शिशिर कुमार दास रायपुर में जी24 घंटे छत्तीसगढ़ से जुड़े हुए हैं.


