फतेहपुर के पास कालका मेल की दुर्घटना के साथ ही इलेक्ट्रानिक मीडिया ने एक एक बार फिर यह जताया है कि पुलिसियों की तरह उनके पास भी धैर्य की अपार कमी है। थाना-कचहरी के चक्कर में पड़ने के बदले अपने पुलिस-बहादुर अक्सर तुरंत फैसला करते हुए “अपराधी” को गोली मार देते हैं, इससे मुकदमे वगैरह का फालतू का झंझट बच जाता है। अपने अधिकांश चैनल वालों ने भी दुर्घटना के तुरंत बाद जांच वगैरह की झंझट में पड़े बगैर फैसला सुना दिया कि रेल दुर्घटना गाड़ी चालक द्वारा इमरजेंसी ब्रेक लगाने के कारण हुई। कमोबेश सभी चैनल यह राग अलापने में लगे हुए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह खबर कोई श्री प्रकाश जायसवाल के हवाले से चला रहा है, कोई किसी यात्री के बयान के आधार पर तो कोई बगैर किसी हवाला दिये इनवर्टेड कामा की आड़ में।
जिस तरह रेल चलाने वाला ड्राइवर “रन डाउन”, “फोनो” या “इनपुट-आउटपुट” का चक्कर नहीं समझ सकता उसी तरह मीडिया कर्मी भी रेल इंजन की तकनीकी बातें नहीं समझ सकते। ऐसे में कोई जांच हुए बगैर या किसी अधिकारिक बयान के आने से पहले ही चैनलों का इस तरह से गैर-जिम्मेदाराना बयान देना रेल अधिकारियों, नौकरशाहों व मंत्रियों के नापाक मंसूबों को बल प्रदान करता है, जो दुर्घटना के बाद “साफ्ट टारगेट” या बलि का बकरा ढूंढते हैं व सबसे सस्ते कर्मचारी पर दोष मढ़कर खुद अपना हाथ झाड़ लेते हैं। यह तो गनीमत है कि गाड़ी का चालक अभी जिंदा है, वरना रेलवे की तरफ से अधिकारिक बयान आ गया होता है दुर्घटना के लिये रेल चालक जिम्मेदार है। अब मरा हुआ आदमी तो गवाही देने के लिये आने से रहा।
किसी भी बड़े रेल अथवा विमान हादसे में चालक या पायलट को दोषी ठहराने की विभागों की काफी समृद्ध परंपरा रही है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में इनकी जान पहले ही चली जाती है। बाद में दुर्घटना का असली कारण क्या था, यह कभी किसी को पता नहीं चलता क्योंकि अपने यहां के लोगों की याददाश्त काफी कमजोर है। जब कोई दूसरी बड़ी दुर्घटना होती है तभी कुछ दिनो के लिये गड़े मुर्दे उखाड़े जाते हैं। क्या आपको याद है कि गाइसल रेल दुर्घटना में किसे दोषी पाया गया? या फिरोजाबाद रेल दुर्घटना के बाद रेलवे ने क्या सबक लिया। हकीकतन भारतीय रेल जिस तरह से चलती है और चल रही है वह अपने -आप में प्रभु का चमत्कार है। अगर आपकी ईश्वर के प्रति आस्था नहीं है तो आप ऊपर वाले के साथ नमकहरामी-जैसी कर रहे हैं, वरना जितनी तादाद में व जिस अव्यवस्था में रेलगाडियां चल रही हैं उसमें तो रोज एक दुर्घटना होनी चाहिये। सैलूनों में ऐश करते घूमने वाले रेल अफसरों-नौकरशाहों -मंत्रियों को आम जनता की सुरक्षित रेल यात्रा से कोई सरोकार नहीं है। आपको याद होगा कि रेलवे ने सेफ्टी फंड के नाम पर यात्रियों से प्रति टिकट जमकर पैसे वसूले थे, इसके बदले में यात्रियों को क्या सुरक्षा मिली, यह निकम्मे रेल अधिकारियों को बताना चाहिये जो हर बड़ी दुर्घटना के बाद तीसरे या चौथे दर्जे के कर्मचारियों पर सारा दोष मढ़कर खुद बेदाग निकल जाते हैं और चैनलों की बयानबाजी इस काम में उनकी मदद करती है।
रेलवे में एक सेफ्टी विभाग भी होता है, जिसकी हैसियत उस श्वान की तरह है जो भौंक तो सकता है पर काट नहीं सकता। चलती है आपरेटिंग विभाग की, जो मनमाने ढंग से नियम-कानूनों को ताक में रखकर जैसी मर्जी वैसी गाड़ियां चलवाता है और सेफ्टी डिपार्टमेंट “हिंदी दिवस” की तरह सेफ्टी सेमीनार करता है, दीवार पर नारे लिखवाता है, भाषण देने वालों के लिये चाय-बिस्किट का इंतजाम करता है और गाड़ियां ठीक उसके विपरीत चलती हैं, जो इनके नारों में कहा गया होता है। यह बात रेलवे में काम करने वाले सभी लोग जानते हैं, पर कहता कोई नहीं क्योंकि सबको अपनी नौकरी बचानी होती है।
रहा सवाल इमरजेंसी ब्रेक का तो यह दिया ही इसलिए जाता है कि आपातकाल में चालक इसका इस्तेमाल करे। इमरजेंसी ब्रेक दुर्घटना को बचाने के लिये है न कि इमरजेंसी ब्रेक से दुर्घटना होती है। रेलवे के अनुसंधान, अभिकल्प व मानक संगठन ने अपने अनेक निष्कर्षों में यह पाया है कि आपात ब्रेक के कारण कभी भी रेल दुर्घटना नहीं होती है। रेलवे का ए.सी. कर्षण मेनुअल भी इस बात की पुष्टि करता है। पाठकों की सुविधा के लिये यहां पर यह बताना

दिनेश चौधरी
लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्टा, डोगरगढ़ के अध्यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


