दिल्ली विश्वविद्यालय का नया सत्र 21 जुलाई से शुरू होने वाला है। बीते वर्ष सेमेस्टर सिस्टम को लेकर तमाम विवादों के पश्चात अन्ततः न्यायालय के आदेश के बाद इसे लागू कर दिया गया है और इस सत्र से दिल्ली विश्वविद्यालय एक नए रंग-ढंग से छात्र-छात्राओं का स्वागत करने के लिए तैयार है। लेकिन आवेदन के पहले दिन से ही ये सत्र खासा चर्चा में रहा। कुछ तथ्य ऐसे भी रहे जो वास्तव में चौंकाने वाले थे। जहां एक छात्र के शत प्रतिशत अंक आने पर ताज्जुब हुआ, वहीं हैरत इस बात पर हुई कि 90 प्रतिशत पाने वाले छात्रों को भी उनका मन चाहा कोर्स नहीं मिल सका।
फिलहाल एडमिशन की सारी कवायद लगभग खत्म हो चुकी है, पर कई कॉलेजों में सीटें अभी तक खाली हैं। ये वो सीटें हैं जो जनरल के लिए नहीं हैं, आरक्षित हैं। सात कट-ऑफ निकाले जाने के बाद भी अभी तक इन सीटों के लिए उत्तराधिकारी नहीं मिल सके हैं। जब आवेदन का दौर शुरू हुआ तो प्रशासन की ओर से ऐसे दावे किये जा रहे थे कि इस बार चौथी या पांचवी कट-ऑफ भी बमुश्किल ही निकले लेकिन वर्तमान हालात तो कुछ और ही बयां कर रहे हैं। हालांकि ये सही है कि प्रत्येक कॉलेज में ये आरक्षित सीटें (27 प्रतिशत) शुरू से जनरल कैटगरी से अलग रखी गयीं हैं, जिस पर सिर्फ आरक्षण पाने वालों का ही हक है।
सोचने वाली बात ये है कि यदि उसके लिए आरक्षित वर्ग से कोई आवेदन नहीं है तो क्या उसे जनरल के लिए खोल नहीं देना चाहिए। ये बात कुछ इसी तरह है कि आपका पेट भरा हुआ है और आपके पास अब भी रोटी है लेकिन आप किसी भूखे को दे नहीं सकते। आरक्षण के खिलाफ कोई नहीं है, निश्चित रूप से हर उस वर्ग को आरक्षण मिलना चाहिए जो जरूरतमंद हैं, लेकिन वर्तमान में आरक्षण मिल किसे रहा है और उसकी मार कौन झेल रहा है…बताने की जरूरत नहीं। एडमिशन के दौरान कई ऐसे छात्र रहे जिन्हें या तो दिल्ली विश्वविद्यालय का मोह छोड़ किसी और विश्वविद्यालय में दाखिला लेना पड़ा और अगर दाखिला मिला भी तो विषय के साथ कॉम्प्रोमाइज करना पड़ा। ऐसे में यदि इन सीटों को अनारक्षित वर्ग के लिए ओपन कर दिया जाता है तो निश्चित रूप से यह एक अच्छी पहल होगी और उन छात्र-छात्राओं के लिए भी, जिन्हें अच्छे अंक आने के बावजूद एडमिशन नहीं मिल सका।
लेखिका भूमिका राय दिल्ली विश्वविद्यालय के कम्युनिटी रेडियो में बतौर कार्यक्रम उदघोषक कार्यरत हैं.


