आदरणीय संपादक, नमस्कार. आपकी वेबसाइट पर पहली पुण्यतिथि पर याद किए गए गिर्दा, पर चुभन छोड़ गया आयोजन शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई थी. यह खबर बेबुनियाद है, जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की पहली पुण्यतिथि के बारे में इस समाचार को पढक़र उन सभी लोगों का आहत होना स्वाभाविक है, जो अपने अग्रजों का याद करने के लिये ऐसे आयोजन करते हैं। इस कार्यक्रम के आयोजन के बारे में दी गयी उक्त जानकारियों पर न केवल तरस आ रहा है, बल्कि यह लेखक के मानसिक दिवालियेपन का सबूत भी है। इस कार्यक्रम के आयोजक होने के नाते हम अपना विरोध निम्न बिन्दुओं पर दर्ज कराना चाहते हैं:-
इस कार्यक्रम का आयोजन पहाड़ की कई संस्थाओं ने मिलकर किया था।
इन संस्थाओं में लंबे समय से युवाओं के बीच काम कर रही संस्था क्रियेटिव उत्तराखण्ड, गरीब बच्चों के लिये काम करने वाली हमारे साथियों की संस्था सार्थक प्रयास, पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत के लिये काम करने वाली संस्था अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा, लंबे समय से पहाड़ के सवालों का उठाने वाले पाक्षिक समाचार पत्र उत्तराखण्ड प्रभात, उत्तराखण्ड की नवगठित पार्टी उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी और पहाड़ के सवालों को अपने तरीके से उठाने वाला उत्तराखण्ड चिन्तन थे।
इस कार्यक्रम में कोई मंच नहीं बना था, जैसा कि इस खबर में बताया गया है।
इस कार्यक्रम में सत्ता का कोई ऐसा प्रतिनिधि नहीं था, जिसने संबोधित किया हो।
इस पूरे कार्यक्रम में एक सौ उन्नीस लोग आये थे। ये सब गिर्दा के जानने वाले, उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले और जनसंघर्षों में उनके साथ रहे हुए लोग थे।
इस मौके पर गिर्दा के अलावा प्रकृति के चितेरे कवि चन्द्रकुंवर बत्रवाल के पोस्टर का विमोचन भी किया गया था।
इस कार्यक्रम में पिछले साल आयी आपदा में सुमगढ़ में मारे गये अठारह बच्चों को भी श्रद्धांजलि दी गयी।
पिछले वर्ष गिर्दा के निधन पर इसी सभागार में हम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।
जिन लोगों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की उनमें से कुछ नाम इस प्रकार हैं- सर्वश्री सुरेश नौटियाल, प्रेम सुन्दरियाल, प्रताप शाही, भूपेन्द्र सिंह, हेमा उनियाल, चन्द्र सिंह राही, दिनेश ध्यानी, पूरन काण्डपाल, केएम पांडे, व्योमेश जुगराण, सत्येन्द्र रावत, प्रयासी जी, शिवचरण मुण्डेपी, धीरेंद्र प्रताप, पूरन चंद्र नैलवाल, जयसिंह रावत, डॉ. हरिसुमन बिष्ट आदि-आदि। इन नामों का जिक्र इसलिये किया जा रहा है कि आप भी शायद इन सभी लोगों को कई लोग व्यक्तिगत रूप से जानते होंगे। इनके अलावा हमारे कई साथी संगठन इसमें शामिल थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हमारे बहुत सारे साथी इस आयोजन में आये थे।
गिर्दा को याद करने वाले आयोजकों में उपरोक्त लेख में जिस माफिया का जिक्र किया गया है, उसके बारे में बताने का कष्ट करें। अप्रत्यक्ष रूप से जिस पत्रिका का जिक्र किया है, उसके किसी पचड़े में न पड़ते हुये हमें यह जानने के अधिकार है कि इन संस्थाओं और उपरोक्त लिखित या उस आयोजन में शामिल कौन लोग माफिया थे। हम इस बात को भी जानना चाहेंगे कि इस रिपोर्ट को लिखने वाला व्यक्ति उस दिन वहां मौजूदा था भी या नहीं। यदि होता तो शायद उसे माफिया नहीं दिखाई देते। चूंकि आयोजन के माध्यम से पूरी पहाड़ की अस्मिता को समाप्त करने वाला बताया गया है, इसलिये यह जरूरी हो गया है इस पूरी खबर के आलोक में उन लोगों को जाना जाये जो ऐसे आयोजनों से पहाड़ की अस्मिता का सौदा कर रहे हैं।
हां, एक व्यक्ति उस मौके पर जरूर मौजूद था उनका नाम है चारु तिवारी। वे उत्तराखण्ड की एक पत्रिका ‘जनपक्ष आजकल’ में काम करते हैं। उन्होंने गिर्दा के बारे में पूरी बात रखी। वे गिर्दा को लंबे समय से जानते हैं। यदि आपका आशय चारु तिवारी की उस कार्यक्रम में उपस्थिति से है तो यह आपके विवेक पर निर्भर करता है कि आप उनको किस श्रेणी में रखते हैं। वह अपनी पत्रिका में माफियाओं को मुखपृष्ठ पर छापकर कितना संरक्षण देते हैं, यह आप अलग से बात करें। कृपा कर पहाड़ के महापुरुषों को इतना न गिरायें जिससे हम, आप और हमारा समाज शर्मसार हो। बेसिर पैर की बातें लिखकर आखिर यहां कौन सी कुंठा निकालना चाहते हो।
नासमझ लेखक को गिर्दा की पुण्यतिथि पर आयोजित इस कार्यक्रम की महत्ता को समझना चाहिए। वह इसलिये कि जब आपाधापी के इस दौर में किसी के पास किसी को याद करने का समय नहीं है, हम लोग बड़े कष्टों में ऐसे आयोजन करते हैं। अंत में एक बात की ओर और ध्यान दिलाना चाहता हूं कि इस खबर में गिर्दा का निधन लखनऊ में बताया गया है, जबकि वे पिछले साल २२ अगस्त को हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल में हमसे अलविदा कह गये थे। गिर्दा का जीवन संघर्ष पीलीभीत में शुरू हुआ। बाद में वे लोनिवि की नौकरी करने लगे। वर्ष १९७२ में गीत एवं नाट्य प्रभाग में आ गये।
इस तरह के बेहूदा लेख से आयोजन में शामिल संगठनों की जो छवि बनाने की कोशिश की गयी है, वह बहुत तकलीफदेह है। उपरोक्त खबर को कितने पूर्वाग्रह से लिखा गया है, उसका प्रमाण इसके साथ संलग्र कार्यक्रम का बैनर है, जिसमें उल्लिखित पत्रिका या उस भू-माफिया का कहीं जिक्र तक नहीं है। तब इस तरह की खबरों की मंशा को समझा जाना चाहिए जो कुंठाग्रस्त होकर लिखी जाती हैं।
दयाल पाण्डे
संयोजक, क्रियेटिव उत्तराखण्ड-म्यर पहाड़
मो- ९९६८५३४९९३
उमेश पंत
संयोजक, सार्थक प्रयास
जेएस रावत
संयोजक, उत्तराखण्ड महासभा


