शहर के मौसम में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। एक तरफ जहां जयपुर में प्रवासी भारतीय दिवस की तैयारियां जोरों पर है वहीं दूसरी ओर गरीब, बेघर सर्दी की सर्द रातों में ठिठुरन मरने को मजबूर हैं। प्रवासी भारतीय दिवस जो कि 7 से 9 जनवरी 2012 तक मनाया जा रहा है जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आ रहे हैं। उनको दिखाने के लिए एक तरफ करोड़ों रुपए खर्च करके बढ़िया सड़कों को तोड़कर दुबारा बनाया जा रहा है। सरकारी इमारतें सजाई जा रही है। निजी कम्पनियों ने सारे बोर्ड प्रवासियों के स्वागत में पलक पावड़े बिछाकर लगा दिये हैं। सरकारी अफसर सारे दिन प्रवासी दिवस के नाम पर सिर्फ मीटिंग करते हैं।
फुटपाथ व्यापारियों को हटा रहे हैं, पुलिस सड़क पर सोने वालों का सामान उठाकर ले जा रही है। अशोक मार्ग पर रहने वाली एक महिला जो कि फुटपाथ पर रह कर अपना जीवन गुजार रही है, पुलिस वाले उसका सामान उठाकर ले गये और मांगने पर उसे सिटी पैलेस, नगर निगम ने इतना भगाया फिर भी उसे सामान नहीं मिला। आखिर मिले भी क्यों, हमारी सरकार को प्रवासियों को दिखाना जो है हम कितने विकसित हो गये हैं। हमारे यहां कोई फुटपाथ पर नहीं रहता और अधिकारियों का क्या उनका सामान थोडे गया है और वैसे भी इस शहर में गरीब होना एक अपराध है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार पर सरकार ने जयपुर में 28 रैन बसेरों की व्यवस्था तो कर दी और कागजों में सारी व्यवस्था भी कर दी आखिर हमारे सारे काम कागजों में ही तो होते हैं, परन्तु रैन बसेरों में जाकर देखने पर वहां लोगों से बात करने पर बाहर सो रहे लोगों से बात करने पर सारे सिस्टम की पोल खुल जाती है। पी.यू.सी.एल. टीम के सदस्य होने नाते सर्वे करने पर ये सच सामने आए तो मैं अंदर से एकदम हिल गया। सोचने पर मजबूर हो गया आखिर हम कौन से सिस्टम में जी रहे हैं। इण्डिया और भारत में फर्क आँखों के सामने दिखने लगा। समझने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
खासा कोठी पुलिया के नीचे स्थित रैन बसेरा जिसकी क्षमता सरकारी आंकड़ों में 25 है। 4.1.2012 की गार्ड अशोक व 5.1.2012 को गार्ड प्रदीप वहां मिला। दोनों के ठेकेदार अलग-अलग हैं। परन्तु वहां सो रहे लोगों की संख्या 1 जनवरी को 83, 2 जनवरी को 90, 3 जनवरी को 91, 4 जनवरी को 80 व 5 जनवरी को संख्या 82 रिकार्ड रजिस्टर के मुताबिक है, जो कि क्षमता से 3 गुना से ज्यादा है। वहां गद्दों की संख्या मात्र 24, रजाई 23 है, जिनमें से अधिकतर ऐसे हैं जो फेंकने की स्थिति में हैं। ठेकेदार ऐसे सप्लाई कर रहे हैं जो कहीं काम न आए उन्हें रैनबसेरों में काम ले लें। सोच सकते हैं 23 रजाई और सोने वाले 82 कैसे सम्भव है। यह तो सिर्फ एक झलक है। सांगानेर पुलिस के नीचे व हर जगह जितने रैन बसेरों में हैं उससे ज्यादा बाहर सड़कों पर सो रहे हैं। कोई सिर्फ पतली चादर ओढ़ कर तो कोई प्लास्टिक ओढ़ कर सो रहा है।
कारण पूछने पर कि आप रैन बसेरों के अंदर क्यों नहीं सोते, जवाब ये मिलता है कि कुछ जगह गार्ड रुपए मांगते हैं, कुछ जगह गार्ड अंदर नहीं जाने देते, कुछ जगह भरे हुए मिलते हैं। खाने की बात आने पर 3 जनवरी को परमानंद हॉल अशोक मार्ग में खाना ही नहीं आया। सारे लोग भूखे सोए, खासाकोठी पुलिया के नीचे खाने वालों ने 80 की एंट्री की और सिर्फ 40 का खाना देकर गए। दाल के नाम पर पानी। मेरे से जब बचे लोगों ने खाना मांगा तो मेरे पास कोई जवाब नहीं था, मैं सिर्फ सुन रहा था और कहीं खो गया था। हम मंदिरों में दान के नाम पर करोड़ों रुपए दे देते हैं, सरकार अरबों का टैक्स काट लेती है आखिर हमारी भी कुछ जवाबदारी बनती है या नहीं, या गरीब भूखा मर जाए हम अपने अधिकारों की बहुत बात करते हैं, परन्तु अपने दायित्व को भूल जाते हैं। वहां वैजयन्ती नाम की महिला है जिसका पुत्र उसे पीटता है। रैन बसेरे में महिला कक्ष में खाना खा रही थी। कोई चुपके से 2 रोटी उसे दे आया और खाली दोना उसके पास रख आया। जब देखा सिर्फ सूखी रोटी खा रही है तो रहा नहीं गया और गार्ड को कहने पर उसने अपनी दाल से थोड़ी दी जो कि सिर्फ ऐसा लग रही थी जैसे पानी मिला कर उसमें थोड़े से मसाले डालकर जीरा डाल दिया है। उनसे मैंने पूछा अम्मा आप कैसे खा लेती हैं, उसने कहा बेटा अब तो आदत हो गई है। बस उसे देखकर आँखों से आंसू की धार निकल पड़ी पर वहां रोऊं तो भी कैसे। उन सबको वहां सबसे बड़ा जो लग रहा था, सोच रहा था कितने किस्मत वाले हैं हम जो हमें सब कुछ मिला है। महिला कक्ष में शराब के पाउच पड़े थे, घड़े में पानी नहीं था। टेंट पूरा नीचे ही रखा था, पूरा कक्ष गंदा, महिला पुरुष कक्ष में कोई फर्क नहीं। क्या यही है हमारे देश में महिलाओं की इज्जत या हम सिर्फ अब बातें करने तक सीमित हो गए हैं।
सफाई व्यवस्था का तो कहना ही क्या, उसके नाम पर कुछ नहीं है, मिट्टी ही मिट्टी और बदबू महेश नगर स्थित रैन बसेरे में इतनी बदबू कि आप सो ही ना सके। मेडिकल व्यवस्था के नाम पर सिर्फ कागजों में ऑर्डर है। डॉक्टर का चेकअप के लिए आना तो बहुत दूर की बात है। किसी भी रैन बसेरे में प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स ही नहीं है। यदि किसी के चोट लग जाए या सर्दी का मौसम है। सिर दर्द करे, बुखार ही हो जाए तो कोई दवा नहीं वह बस सारी रात तड़पता रहे। आखिर वह करे भी तो क्या आखिर गरीब है और वो भी बेघर और हमारे शहर में यही तो अपराध है।
पानी व्यवस्था के नाम पर सभी रैनबसेरों में टंकी खुली रहती है जिसमें कभी भी कोई भी जहरीला जानवर गिर सकता है, और तो और हमारी फायर ब्रिगेड चाहे आग बुझाने वक्त पर ना पहुंचा परन्तु रैन बसेरों में पानी जरूर वक्त पर पहुंचा देती है शौचालयों के नाम पर बहुत कम जगह व्यवस्था है जहां है वहां इतने गंदे की जा भी ना सके। नहाने के लिए गरम पानी की व्यवस्था क्या इस सर्दी में हमारे अफसर 6 डिग्री सेन्टिग्रेड तापमान पर ठण्डे पानी में खुले में नहा सकते हैं। मोबाइल चार्ज करने तथा अपना सामान रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। नशामुक्ति और काउंसिल सेल के नाम पर कुछ भी नहीं है। जबकि सुप्रिम कोर्ट के आदेश के अनुसार ये सब होना चाहिए। आखिर हो भी क्यों इस शहर में गरीब होना पाप जो है।
हमारी ठेके देने की व्यवस्था का तो कोई जवाब नहीं है। हमने तो ठेका दे दिया बस ठेकेदार जाने। चाहे सुरक्षा के नाम पर हर रैनबेसरों में 24 घण्टे 8 घण्टे की ड्यूटी के हिसाब से 3 गार्ड होते हैं। परन्तु हर जगह सिर्फ 1 गार्ड वो भी 24 घंटे के लिए और तनख्वाह के नाम पर 6000 रुपए। खासाकोठी पुलिस के नीचे स्थित रेन बसेरों में प्रदीपजी जो कि ठेकेदार रतनसिंह के पास हैं उसे 24 घंटे ड्यूटी के मात्र 6000 रुपए मिलते हैं। उससे पहली जो अशोक था वह भी 24 घंटे की ड्यूटी के लिए बाकी सारे रुपए ठेकेदार और नगर निगम कर्मचारियों की जेब में जाते हैं। इंस्पेक्टर के प्रति गार्ड प्रति माह 1000 रु. लेता है। प्रदीप जो कि पहले दूसरे रैनबसेरे में था वहां ठेकेदार ओमवीर जी के पास था। उसने इसकी 1 महीने की तनख्वाह रोककर देने से मना कर दिया। वजह सिर्फ इतनी सी वहां 24 घंटे के 4500 रुपये मिलते थे। यहां 24 घंटों के 6000 इसलिए छोड़कर यहां आ गया। गरीबी आदमी से क्या नहीं करवाती है। गोपालपुरा रैनबेसेरा इतना सा कि उसमें रात में पांव रखने की भी जगह नहीं बचती। बिस्तर व्यवस्था का हाल बेहाल है। क्या हम इस ठेकेदारी व्यवस्था से निजात पा सकते हैं। परन्तु मिले तो क्यों आखिर गरीबी का मामला है और इस शहर में गरीब होना अपराध है।
ये सारा मंजर तब है जब सरकारी अफसरों से बात हो चुकी है। बात सभी प्रवासी दिवस की तैयारियों में व्यस्त हैं। उन्हें दिखना चाहिए कि आज भी उनके देश में गरीब फुटपाथ पर सोता है। आज भी उसे खाने को रोटी ओढ़ने को चादर नहीं मिलती है। समझ में नहीं आता हमारा देश क्या दिखाना चाहता है। वह भारत को खत्म करना चाहता है।
परन्तु इन सबके बीच एक चीज जो नजर रैनबेसेरों में कोई जाति के लोग नहीं रहते हैं यहां इंसान रहते हैं। बाहर जरूर अलग-अलग जाति के लोग रहते हैं। अंदर ब्राह्मण और दलित एक साथ एक रजाई में सोता है। एक साथ खाना खाते हैं। क्योंकि गरीब की कोई जात नहीं होती है। सिर्फ इंसान होता है। और वहां उनके अंदर एक चिनगारी भड़क रही है, हमारा ध्यान तो उस तरफ है ही नहीं हम तो चकाचौंध भरे सूचकांकों में और मॉलों में खो रहे हैं। पर वह ज्वाला एक दिन फट जाएगी और उस दिन इंसानियत के ठेकेदारों को उनकी बात समझ में आ जाएगी। उनके लिए बस सिर्फ एक शेर मुंह से जाता है-
ये तेरी खोमाश मिजाजी तुझे जीने ना देगी,
आज के दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो।
क्योंकि इस शहर में गरीब होना अपराध है, परन्तु एक दिन यह सब बदल जाएगा, उस दिन ना कोई अमीर होगा, ना गरीब। बस होंगे तो इंसान, ना कोई जात ना पात होगा, सभी समान होंगे, चाहे पुरुष हो या महिला, और सभी के अधिकार बराबर होंगे और सभी अपने दायित्व समझेंगे। होगी सिर्फ समानता, एकता, प्रगति, इंसानियत की बात। उस दिन के इंतजार में और प्रयास में।
निर्मल मोर की रिपोर्ट


