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उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस की शाम का अजब-गजब फसाना

रुद्रपुर (उत्तराखण्ड)। इस बार राज्य स्थापना दिवस राज्य के औद्योगिक और व्यापारिक दृष्टि से प्रमुख नगर रुद्रपुर और आसपास के लोगों के लिए काफी खास रहा। जिले भर से लाखों रुपये चंदा एकत्र कर जिला प्रशासन ने राज्य स्थापना दिवस पर विशेष रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें उत्तराखण्ड राज्य के एक मण्डल कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य, जाने-माने गजल गायक मानस राज तिवारी और कैलाश जोशी का गजल गायन कार्यक्रम के साथ ही प्रमुख रूप से मुशायरा रखा गया। मुशायरे के लिए पद्मश्री गोपालदास नीरज और ‘स्कूल ऑफ थॉट्स’ कहे जाने वाले प्रो. वसीम बरेलवी को बुलाया गया।

रुद्रपुर (उत्तराखण्ड)। इस बार राज्य स्थापना दिवस राज्य के औद्योगिक और व्यापारिक दृष्टि से प्रमुख नगर रुद्रपुर और आसपास के लोगों के लिए काफी खास रहा। जिले भर से लाखों रुपये चंदा एकत्र कर जिला प्रशासन ने राज्य स्थापना दिवस पर विशेष रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें उत्तराखण्ड राज्य के एक मण्डल कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य, जाने-माने गजल गायक मानस राज तिवारी और कैलाश जोशी का गजल गायन कार्यक्रम के साथ ही प्रमुख रूप से मुशायरा रखा गया। मुशायरे के लिए पद्मश्री गोपालदास नीरज और ‘स्कूल ऑफ थॉट्स’ कहे जाने वाले प्रो. वसीम बरेलवी को बुलाया गया।

 

बताया जाता है कि जिलाधिकारी बृजेश कुमार संत अलीगढ़ के रहने वाले हैं और काव्य में उनकी गहरी रुचि है। वहीं के वयोवृद्ध कवि गोपाल दास नीरज को वे विशेष अनुनय विनय कर लाए। बताया यह भी जाता है कि पूर्व जिलाधिकारी, नैनीताल (स्व.) की पत्नी श्रीमती निधि यादव (अपर जिलाधिकारी, नजूल) ने भी मुशायरे के लिए शायरों को रुद्रपुर बुलाने के लिए विशेष प्रयास किए। इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि जब नीरज जी की कार पंडाल के पास आकर रुकी तो एडीएम निधि उनके स्वागत को पहुंचीं, जिनसे शायद नीरज जी ने उन्हें मंच तक की करीब बीस कदम की दूरी अपने पैरों से नापने में असमर्थता व्यक्त की तो निधि ने कार चालक को मंच के पीछे मंच के करीब गाड़ी लगाने को कहा। कार मंच के करीब लगी तो नीरज के सहायक रामसिंह उन्हें गोद में उठाकर मंच पर लाए।

जो सरकारी मुलाजिम मंच संचालन कर रहे थे, वे बड़े खुश्कमिजाज थे और जबरदस्ती की रस्म अदायगी कर रहे थे। कैलाश जोशी और मानस राज तिवारी का गजल गायन साउंड और संगीत उपकरणों के शोर में श्रोताओं के पल्ले आधा ही पड़ा। और आधे का कोई मतलब नहीं होता है। उसके बाद संचालक ने कवियों-शायरों को मंच पर पहुंचने की खुश्क अपील कर दी। कायदे से ससम्मान उन्हें मंच पर आमंत्रित किया जाता। कई थे, जो यह दायित्व निभा सकते थे। जिले के प्रभारी मंत्री, राज्य के पेयजल और शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी, डीएम संत, कांग्रेस जिलाध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट आदि। माइक संचालक ने मुशायरे के संचालक डॉ. निर्मल दर्शन को पकड़ा दिया। इस मैनेजर ने भी शायद पूरी तैयारी नहीं की थी। यह भी बार-बार डीएम, एडीएम का ही नाम लेते रहे। और कार्यक्रम शुरु कर दिया। बीच में किसी ने याद दिलाया कि अदीबों का बुके और शॉल से सम्मान होना है तो संचालक ने डीएम संत को पुकारा। डीएम संत मंच पर गये और निर्मल दर्शन से चुपके से कुछ कहा जिस पर उन्होंने मंत्री प्रसाद नैथानी को याद किया। इसके बाद अव्यवस्थित तरीके से डीएम संत, पूर्व विधायक तिलक राज बेहड़ और मंत्री महोदय ने अदीबों का सम्मान किया। इससे पहले शाम को पूर्व विधायक तिलक राज बेहड़, पेयजल और शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी और डीएम संत ने विधिवत दीप प्रज्ज्वलित कर सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम का शुभारंभ किया था।

रिपोर्टरों ने सरस्वती वंदना का फोटो लेकर पूरे मुशायरे की खबर मुशायरा होने से पहले ही रात करीब 9ः30 बजे तक अपने अखबारों को भेज दी। खबरों में पेश किए गये कलाम का जिक्र कहीं नहीं था, एक ही लाइन थी कि कवियों ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। नाम भी आधे-अधूरे छपे, जैसे राहत इंदौरी को डॉ0 राहत, तारिक कमर को तारिक लिखा गया। जाहिल और खुदगर्ज ब्यूरोचीफों की वजह से कार्यक्रम की रिपोर्टिंग नहीं हो पाई। यह अग्रणी अखबारों के ब्यूरोचीफ खबर लिखने में रुचि नहीं रखते, इनका मुख्य काम सेटिंग-गेटिंग का है। खुद भी माल काटते हैं, अपने संपादकों, मैनेजरों को नजराने पेश करते रहते हैं और विज्ञापन के रूप में अखबार प्रबंधन की भी खूब सेवा करते रहते हैं, तो दीपावली का समय था, इसलिए जल-जंगल-जमीन और मजदूरों के शोषकों, तरह-तरह के माफियाओं, नेताओं इत्यादि से गिफ्ट बटोरने में लगे थे।

जिन स्टाफरों की ड्यूटी कार्यक्रम की रिपोर्टिंग में लगाई थी वह इसलिए ब्यूरोचीफों से खार खाए हुए थे कि उनके हिस्से के जो गिफ्ट ब्यूरो दफ्तरों में आ रहे थे उन्हें भी ब्यूरोचीफ अपने घरों की ओर चुपचाप बढ़ा रहे थे। इन स्टाफरों को इस बात का भी रंज रहता है कि बड़ी मेहनत कर, जगह-जगह धक्के खाकर खबरें वह लिखते हैं और क्रेडिट ब्यूरोचीफ लेते हैं। कुंठित रिपोर्टरों से इतनी ही सूचना मिल जाए कि कोई कार्यक्रम हुआ, इतनी भी गनीमत समझिए।

अधिकतर पत्रकार किसी कार्यक्रम को कवर इसलिए नहीं करते कि उन्हें निमंत्रण नहीं मिला होता है। उनके पत्रकारिता के सिद्धांतों में शायद यह है कि कोई बुलाएगा तभी वे रिपोर्टिंग को जाएंगे। इसके बाद भी आव-भगत ढंग से न हुई तो खबर नहीं लिखंेंगे। बहुतों को ऐसे कार्यक्रमों में कोई रुचि नहीं होती। बहुत से पत्रकार पत्रकार तो अपने आपको कहते हैं लेकिन न खबरें लिखते हैं, न खबरों के लिए कोई मेहनत करते हैं और न ही अपने इर्द-गिर्द के घटनाक्रम की जानकारी रखते हैं। साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता में उल्लेखनीय काम कर रहे एक प्रमुख पत्रकार से जब मुशायरे पर प्रतिक्रिया जानने के लिए फोन किया तो उनका सवाल था कौन-सा मुशायरा? कब कहां हुआ ? मुझे तो पता ही नहीं। खैर प्रशासन ने जो किया वह कुछ कमियों के बावजूद बहुत काबिले तारीफ था। मुशायरा जैसा भी कुछ था वह फिल्म, टीवी, थिएटर, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में मुंबई में काम कर रहे ललित मोहन तिवारी के अंदाज में यहां प्रस्तुत है-

एक शाम खुशनसीबों, कवि सम्मलेन और मुशायरे के नाम

शायरी के दीपों से रोशन हुई रुद्रपुर की एक खुशनसीब शाम

दिवाली से पहले जले रुद्रपुर में शायरी के दिए

उत्तराखंड स्थापना दिवस पर रुद्रपुर हुआ शायराना  

उत्तराखंड स्थापना दिवस की 12 वीं वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर स्थानीय गांधी पार्क में एक सांस्..तिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. शाम 5 बजे के समीप शुरू हुए कार्यक्रम के आरम्भ में अल्मोड़ा के पूरन बोरा एंड पार्टी के कलाकारों द्वारा बहुत शानदार छोलिया नृत्य की प्रस्तुति दी गयी. इसके बाद मुंबई से आये कलाकारों ने गज्लें पेश कीं. अपरिपक्व साउंड संचालक गज्लों के पूरे कार्यक्रम में साउंड सही नहीं कर पाया. इस तरह एक सुन्दर गायन खराब साउंड व्यवस्था की भेंट चढ़ गया. श्रोता संगीत का आनंद नहीं उठा पाए.

मुशायरे के लिए साउंड में बैलेंस की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए साउंड वाले के पाप धुल गए. लोग गज्लों में साउंड की घटिया बैलेन्सिंग को भूल शायरों और कवियों की वाणी के जादू में खोते चले गए. लगभग 10 बजे शुरू हुआ मुशायरा रात के 2 बजे समाप्त हुआ.

मुशायरे की शुरुआत शायरा ‘शबीना अदीब’ के द्वारा गाये सरस्वती वंदना से हुई. इसके बाद कार्यक्रम के संचालक डॉक्टर निर्मल दर्शन ने सबसे पहले डॉक्टर तारिक कमर को उनके कलाम पेश करने के लिए आमंत्रित किया. डॉक्टर तारिक कमर ने अपने शेर कुछ इस तरह पढ़े-

रिश्तों की तहजीब निभाते रहते हैं, दोनों रस्मन आते जाते रहते हैं

तेज हवा चुपचाप गुजरती रहती है, सूखे पत्ते शोर मचाते रहते हैं।

कागज की एक नाव आर पार हो गयी, इसमें समन्दरों की कहाँ हार हो गयी

तारिक तुम्हारे मिटने से दुश्मन ही खुश नहीं, कुछ दोस्तों की राह भी हमवार हो गयी।

डॉक्टर तारिक कमर के बाद शशांक प्रभाकर को बुलाया गया उनका अंदाज-ए-बयां कुछ यूँ रहा-

मौत तो मैंने इस मिट्टी में दबा रक्खी है, और ये जिंदगी गीतों में सजा रक्खी है

कोई तलवार मुझे काट नहीं सकती है, मेरे माथे पे मेरी माँ की दुआ रक्खी है।

चराग अब तो अंधेरों की जुबां बोलते हैं, लोग चांदी की तराजू में धरम तोलते हैं।

शशांक प्रभाकर के बाद बारी आयी शायरा शबीना अदीब की-

हमें बना के तुम अपनी चाहत, खुशी को दिल के करीब कर लो

तुम्हें हम अपना नसीब कर लें, हमें तुम अपना नसीब कर लो

गरीब लोगों की उम्र भर की गरीबी मिट जाए ऐ अमीरों

बस एक दिन के लिए तुम जरा सा खुद को गरीब कर लो।                                   

तुम्हारा चेहरा चिरागों में कौन रखता है, मेरी तरह तुम्हें आँखों में कौन रखता है

खुदा की जात पे हमको यकीन है वर्ना, दिए जला के हवाओं में कौन रखता है

इन शेरों के बाद शबीना अदीब ने एक नज्म पढ़ी-                                         

खामोश लब है झुकी हैं पलकें

दिलों में उल्फत नयी-नयी है

अभी तकल्लुफ है गुफ्तगू में

अभी मुहब्बत नयी-नयी है

अभी न आयेगी नीद तुमको

अभी न हमको सुकूं मिलेगा

अभी तो धड्केगा ये दिल ज्यादा

अभी मुहब्बत नयी-नयी है

जो खानदानी रईस हैं वो मिजाज रखते हैं नर्म अपना

तुम्हारा लहजा बता रहा है तुम्हारी दौलत नयी-नयी है

इसके बाद एक नज्म पढ़ी-

तू किसी रास्ते का मुसाफिर रहे

मैं एक-एक ठोकर उठा लाऊंगी

अपनी बेचैन पलकों से चुन-चुन के मैं

तेरे रस्ते से पत्थर उठा लाऊंगी

मैं बरक प्यार का मोड़ सकती नहीं

जिंदगी में तुझे छोड़ सकती नहीं

तू अगर मेरे घर तक नहीं आयेगा

मैं तेरे पास ही घर उठा लाऊंगी

एक गीत मुंबई शहर की कट्टरवादिता के खिलाफ पेश किया-

‘आग धुंआ फैली और जीत हुई शैतान की, ये कैसी तस्वीर बना दी तुमने हिन्दुस्तान की’

इसी गीत में आगे कहा-

हिन्दुस्तान का कोना-कोना हर हिन्दी का सपना है

कन्याकुमारी से कश्मीर तक सब अपना है

ये धरती जागीर है धरती के हर इंसान की

शबीना अदीब के बाद इटावा से आये कुमार मनोज ने अपने काव्य की शुरुआत कुछ इस तरह की-

पसीना पोछने की भी जिन्हें मोहलत नहीं मिलती

उन्हीं के पेट को रोटी सरों को छत नहीं मिलती

हिन्दुओं में फिराक, मोमिनों में रसखान मिल जाते हैं

गोकुल की गलियों में गाय चराते भगवान् मिल जाते हैं  

कुमार मनोज के बाद बारी थी डॉक्टर पॉपुलर मेरठी के जिन्होंने हर श्रोता को जी भर के हंसने पर मजबूर कर दिया-

मैं हूँ जिस हाल में मेरे सनम रहने दे

चाकू मत दे मेरे हाथ में कलम रहने दे

मैं तो शायर हूँ मेरा दिल बहुत नाजुक है

मैं तो पठाखे से ही मर जाऊँगा बम रहने दे

राग तोड़ी क्या था जाने क्या गाते रहे

प्यार का इजहार करने को जिंदगी भर,

वो भी हकलाते रहे, हम भी हकलाते रहे।

खबर ये अजब-गजब है, खबर ये आम हो जाए तो कोहराम हो जाए,

इश्क हो गया है डाकू सुलताना की बेटी से, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए                                                             

डॉक्टर पॉपुलर मेरठी के बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे डॉक्टर निर्मल दर्शन ने अपनी रचनाएँ सुनाई-

ये दिल सब कुछ गवाना चाहता है, न जाने क्या ये पाना चाहता है

वो आँसू तो बहाना चाहता है, मगर कोई बहाना चाहता है

कफस हो या कोइ ठिकाना, परिंदा तो आशियाना चाहता है

वो बैठा है गमों को भुलाने, वो शायद मुस्कुराना चाहता है

तुम इस तरह मेरी यादों के दरमियान उगे

कि जैसे जर्रे के अन्दर से एक जहाँन उगे

इसके बाद एक गीत प्रस्तुत किया-

जो तुम भी करते मुझसे प्यार,

तुम माझी के गीतों को गाते, मैं खेता पतवार…

स्वप्न हमारे आज नहीं तो कल पूरे हो जाते

आशाओं के महल कभी तो हम तामीर कराते

तुम होते तो स्वर्ग से सुन्दर लगता ये संसार

जो तुम भी…

मैं भी अकेला तुम भी अकेले, राह कठिन जीवन की

और व्यथा भी एक ही जैसी, हम दोनों के मन की

अधरों पर आने को आतुर अंतस के उदगार

याद तुम्हें भी आती होंगी वो मद्पूरित यादें

बिना कहे ही हो जाती थीं कितनी सारी बातें

क्यूँ होता उस सुखमय युग का अर्थरहित व्यापार

एकाकी जीवन क्या देगा कुछ सोचो तो निर्मल

गरजे लेकिन बरस न पाए नीर बिना ये बादल

मैं बैठा हूँ तुम भी आओ स्वप्न महल के द्वार

जो तुम भी…

डॉक्टर निर्मल दर्शन के बाद अगले शायर थे जौहर कानपुरी-

मुहब्बत आज भी जिंदा है इन कच्चे घरानों में

मेरा बेटा बड़ा होकर भी मेरा सर दबाता है।

बहन हो भाई हो बेटा हो बीवी हो या महबूबा, किसी का प्यार माँ के जैसे हो नहीं सकता

मैं मर भी जाऊँ तो ये धरती माँ गोदी में रखती है, अब इतना गैर का बच्चा तो प्यारा हो नहीं सकता

जौहर कानपुरी के बाद डॉक्टर सुरेन्द्र दुबे ने अपने अनोखे अंदाज से श्रोताओं को खूब हंसाया हँसाया-

सुखी रहो आनंद में जियो बरस हजार, तुम ऐसे फूलो फलो जैसे भ्रष्टाचार

नारी के मन में मिली दो इच्छाएं खास, श्रुत तो श्रवण कुमार हो पति हो तुलसीदास

नवयुग की फितरत नयी आज गए सब भाँप, कौवा काटे झूठ पर सत्य कहो तो सांप

केवल होते ही नहीं दीवारों के कान, होती हर दीवार में चुगुलखोर जुबान

डॉक्टर राहत इन्दौरी को उनकी शायरी पर श्रोताओं की खूब दाद मिली-

किसने दस्तक दी ये दिल पर कौन है, आप तो अन्दर हैं बाहर कौन है

शहर में तो बारूदों का मौसम है, गाँव चलो अमरूदों का मौसम है

सरहदों पर बहुत तनाव है क्या, कुछ पता करो चुनाव है क्या

मेरी साँसों में समाया भी बहुत लगता है, और शख्स पराया भी बहुत लगता है,

उससे मिलने की तमन्ना भी बहुत है, लेकिन आने जाने में किराया भी बहुत लगता है

जुबां तो खोल नजर तो मिला, जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे

तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव, में तुझे पढूंगा मुझको किताब तो दे

फैसला कुछ भी हो मंजूर होना चाहिए, जंग हो या इश्क भरपूर होना चाहिए

भूलना भी है जरूरी याद रखने के लिए, पास रहना है तो थोड़ा दूर होना चाहिए

कट चुकी है उम्र सारी जिनकी पत्थर तोड़ते, अब तो इन हाथों में कोहिनूर होना चाहिए

नयी हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती है, कबतूरों को खुली छत बिगाड़ देती है

जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते, सजा न दे के अदालत बिगाड़ देती है

कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया, इस पार के थपेड़ों ने उस पार कर दिया

अफवाह थी कि मेरी तबीयत खराब थी, लोगों ने पूछ-पूछ के बीमार कर दिया

दो गज सही मगर ये मेरी मिलकियत तो है, ए मौत तूने मुझको जमींदार कर दिया                 

रोज वही कोशिश जिंदा रहने की, मरने की भी कुछ तय्यारी किया करो

चाँद ज्यादा रोशन है तो हो, जुगनू भय्या जी मत भारी किया करो

उंगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो, खर्च करने से पहले कमाया करो

जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे, बारिशों में पतंगें उड़ाया करो

चाँद सूरज कहाँ, अपनी मंजिल कहाँ, ऐसे वैसों को मुंह मत लगाया करो

मेरे हुजरे कुटिया, में नहीं और कहीं पर रख दो, आसमाँ लाये हो, ले आओ जमीं पर रख दो

अब कहाँ जाओगे ढूँढने हमारे कातिल, आप तो कत्ल का इल्जाम हमीं पर रख दो

हो वो जमना का किनारा ये कोइ शर्त नहीं, मिट्टी-मिट्टी ही में रखनी है कहीं पर रख दो

मैंने जिस ताक पे कुछ दिए रक्खे हैं, चाँद तारों को भी ले जाकर वहीं पर रख दो  

डॉक्टर राहत इन्दौरी के बाद एक और विश्वप्रसिद्ध शायर डॉक्टर वसीम बरेलवी का रुद्रपुर जैसे शहर के मुशायरे में एक के बाद एक कई शेरों को पढ़ना मुशायरे में चार चाँद लगाता रहा. रुद्रपुर में संजीदा शायरी के कद्रदानों की भारी कमी है. लेकिन इस महफिल में उपस्थित श्रोताओं ने उन्हें बड़ी तन्मयता के साथ सुना.

तआल्लुक के तकाजे कितने पीछे छूट जाते हैं, बहुत दिन साथ रहने से भी रिश्ते टूट जाते हैं.

तुम्हारे हुस्न की तफसील कौन बतलाये, जो देखता है वो आँखों में डूब जाता है

ये हममें तुममें जो दूरियां हैं तो आओ इसका सबब भी जानें,

किसी के हाथों में तुम भी खेले हुए किसी के शिकार हम भी

कतरा अब एह्तजाज आन्दोलन, करे भी तो क्या मिले,

अरे दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले

हर शख्स दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ,

फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले

इस दौरे मुंसिफी में जरूरी नहीं वसीम

जिस शख्स की सजा हो उसी को सजा मिले

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है,

सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है

शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ

कीजिये मुझे कुबूल मेरी हर कमीं के साथ

जरा सा कतरा कहीं आज अगर उभरता है

समन्दरों के लहजे में बात करता है

खुली छतों के दिए कब के बुझ गए होते

कोइ तो है जो हवाओं के पर कुतरता है

शराफतों की यहाँ कोई एहमियत ही नहीं

किसी का कुछ ना बिगाड़ो तो कौन डरता है

जमीं की कौमी वकालत हो फिर नहीं चलती

जब आसमां से कोई फैसला उतरता है

तुम आ गए हो तो चाँदनी सी बातें हों

जमी पे चाँद कहाँ रोज-रोज उतरता है

शाम तक सुबह की नजरों से उतर जाते हैं

इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं

फिर वही तल्खिए हालात मुकद्दर ठहरी

नशे कैसे भी हों कुछ दिन में उतर जाते हैं

एक जुदाई का वो लम्हा जो मरता ही नहीं

लोग कहते हैं की सब वक्त गुजर जाते हैं

घर की गिरती हुई दीवारें ही मुझसे अच्छी हैं

रास्ता चलते हुए लोग ठहर जाते हैं

हम तो बेनाम इरादों के मुसाफिर हैं ‘वसीम’

कुछ पता हो तो बताएं किधर जाते हैं

खुद को मनवाने का मुझको हुनर आता है,

में वो कतरा हूँ समंदर मेरे घर आता है

मेरी नजरों को बरतना कोइ तुमसे सीखे

जितना मैं देख सकूँ उतना नजर आता है

गीत ‘पछतावे’

सपने जैसा यौवन तितली जैसा प्यार

कहीं मिल जाए फिर एक बार

फूलों में बस कर रह जाऊँ, खुशबू के पर कतरूं

पायल की आवाज को अपने पाँव से बाँध के रक्खूं

पतझड़ पर अब कभी न खुलने दूंगी अपने द्वार

कहीं मिल जाए फिर एक बार…

सावन को चुनरी कर लूं , साँसों में रख लूं बूँदें

बांहों के घर में ले लूं चाँद की प्यारी किरणें

उम्र से अबके चीन लूंगी ढलने का अधिकार

कहीं मिल जाए फिर एक बार…

कैसे-कैसे भावुक पल अभिमान की भेंट चढ़ाए

साजन मैं खुद सोई और तुझे तारे गिनवाए

अब न कभी जीतूंगी मैंने मानी ऐसी हार

कहीं मिल जाए फिर एक बार…

कार्यक्रम के अंत में पद्मविभूषण गोपाल दास नीरज ने मंच संभाला. लोग उनके गीतों का इन्तेजार शुरू से ही कर रहे थे. जब नीरज जी ने माइक की तरफ कदम बढ़ाए तो उस क्षण मंच संचालक डॉक्टर निर्मल दर्शन ने उन पलों अत्यंत दुर्लभ और सभी श्रोताओं के लिए सौभाग्य की बात कहा. नीरजजी ने भी देर न करते हुए तुरंत अपना काव्य पाठ शुरू कर दिया. 88 बरस की उम्र में भी उन्हें सब याद था एक प्रवाह में वह अपने चिरपरिचित अंदाज में अपने गीत सुनाते गए. संचालक ने बीच में जब उन्हें जिलाधिकारी, ऊधम सिंह नगर बृजेश कुमार संत की ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ की फरमाइश से अवगत कराया तो उन्होंने अपनी धुन में कहा-

पहले इसे सुनो-

जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा

जब तक भारी बक्सा होगा, तब तक तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमकिन है जब तक खुद में ध्यान रहेगा

हाथ मिले हों और दिल न मिले हों, ऐसे में नुक्सान रहेगा

समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है,

जला के घर हमने रोशनी की है

सुबूत हैं मेरे घर के ये धब्बे

कभी यहाँ उजालों ने खुदखुशी की है

कभी भी वक्त ने उनको नहीं माफ किया

जिन्होंने गरीबों से दिल्लगी की है 

हर धर्म के आदेश को माना मैंने

दर्शन के हर सूत्र को छाना मैंने

जब जान लिया सब कुछ

मैं कुछ भी नहीं जानता ये जाना मैंने

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य

मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य

तन से भारी सांस है इसे संभालो खूब

मुर्दा जल में तैरता जिंदा जाता डूब

अब तो एक ऐसा वरक मेरा तेरा ईमान हो

एक तरफ गीता हो एक तरफ कुरान हो

गीत-

हाय ये कैसा मौसम आया, पंछी गाना भूल गए

बुलबुल भूली गज्लें पपीहे प्रेम तराना भूल गए

जाने हवा चली ये कैसी कैक्टस उगे गुलाबों में

नफरत पढ़ने लगी पीढियां खुशबू भरी किताबों में

बम और बारूद की भाषा इतनी भाई दुनिया को

कि आग लगाना याद रहा हम आग लगाना भूल गए

दूध दही वाली धरती पर बारूदों के दाग मिले

और बुझते हुए चिराग मिले

इधर बिलखती है ये गुड़िया तडपे उधर खिलौना वो

कौन है वो जो बच्चों को भी गोद उठाना भूल गए

हाय ये कैसा…

पूजा बनी अर्थ की सेवा मजहब एक जूनून हुआ

मंदिर मस्जिद के दरवाजे इंसानों का खून हुआ

झूठे क्षेत्रवाद ने बढ़कर यूँ भरमाया लोगों को

ईंटों का घर याद रहा हम दिल का ठिकाना भूल गए

हाय ये कैसा…

लड़ना हमें गरीबी से था और हम लड़े गरीबों से,

जिन्हें मिलाना दिल हमसे था वो जा मिले रकीबों से

नानक और चिश्ती के बेटे सूर तुलसी के वंशज

ऐसे बने विदेशी अपना गाँव पुराना भूल गए

हाय ये कैसा…

कौन हिन्दू कौन मुस्लिम कौन सिख इसाई रे

एक तरह से ही होती है सब की यहाँ विदाई रे

जब तक डेरा पडा यहाँ पर धरती का कुछ कर्ज चुका

उनका जीना क्या जो माँ का कर्ज चुकाना भूल गए

हाय ये कैसा…

गजल-

हम तेरी चाह में ए यार वहां तक पहुंचे

होश ये भी न रहा है कहाँ तक पहुंचे

सदियों सदियों न वहां पहुंचेगी दुनिया सारी

एक ही घूँट में मस्ताने जहां तक पहुंचे

वो न ज्ञानी न ध्यानी न बिरहमन न शेख

वो कोइ और थे जो तेरे मकान तक पहुंचे

चाँद को छू के चले आये हैं विज्ञान के पंख

देखना है की इंसान कहाँ तक पहुंचे

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई

मेरा घर छोड़ कर कुल शहर में बरसात हुई

जिंदगी भर तो हुई गैरों से मगर

आज तक हमसे हमारी न मुलाकात हुई

आप मत पूछिए क्या हम पे सफर में गुजरी

था लुटेरों का जहां गाँव वहीं रात हुई

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी

कोइ बताये कहाँ जा के नहाया जाए

मेरा मकसद है ये महफिल रहे रोशन यूँ ही

खून चाहे मेरा दीपों में जलाया जाए

मेरे दुःख दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा

मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए

फौलाद की मूरत भी पिघल सकती है

पत्थर से भी रसधार निकल सकती है

इंसान अगर अपनी पे आ जाए

तो कैसी भी हो तकदीर बदल सकती है

चुप-चुप अश्रु बहाने वालो मोती व्यर्थ लुटाने वालो

कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

सपना क्या है नैन सेज पर सोया हुआ आँख का पानी

कुछ भी मिटता नहीं यहाँ पर, केवल जिल्द बदलती पोथी

जैसे रात उतार चांदनी, पहने सुबह धुप की धोती

चाल बदल कर जाने वालो, वस्त्र बदल कर आने वालो

चंद् खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है

लाखों बार गगरिया फूटी, शिकन न पर आयी पनघट पर

लाखों बार कश्तियाँ डूबीं चहल-पहल वही है तट पर

तन की उम्र बढ़ाने वालो…

अब फरमाइश पूरी करने की बारी थी इसलिए अंत में नीरज जी ने अपना मशहूर गीत ‘ए भाई जरा देख के चलो’ सुनाया, साथ ही उसकी व्याख्या भी की और अभिनेता और फिल्मकार स्वर्गीय राज कपूर से जुड़े अपने संस्मरण सुनाए. यह गीत नीरजजी ने राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए लिखा था. उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने इसे संगीत से सजाया था.

रुद्रपुर में यह कार्यक्रम पूरी तरह एक सरकारी कार्यक्रम था. परन्तु मुशायरे में जो समां बंधा वो कम ही बंध पाता है. सुनने वाले बहुत कम थे. क्यूंकि कार्यक्रम का प्रचार घोर गरीबी के साथ किया गया था. वर्ना तराई के नाम से जाने जाने वाले परन्तु संस्कृतिप्रेमियों के घोर अकाल वाले इस क्षेत्र में सुनने वाले कुछ और भी थे. प्रचार की कमी के कारण एक कमाल का मुशायरा चंद सरकारी कर्मचारियों और कुछ बाद खुशनसीबों तक सिमट कर रह गया.

लेखक अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ पीपुल्स फ्रैंड (साप्ताहिक) के संपादक हैं. उनसे संपर्क 09897791822 के जरिए किया जा सकता है.

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