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उत्तराखण्ड में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद में बसा है एक गांव

: जयंती पर विशेष : भारत रत्न नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारतीय इतिहास में एक बहेद महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेता जी का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, उड़ीसा में हुआ था, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि उड़ीसा से हजारों किलोमीटर दूर उत्तराखण्ड में नेताजी की याद में उनके नाम से एक गांव बसा हुआ है, जहां की मिट्टी में आज भी नेताजी की मौजूदगी का एहसास होता है। उत्तराखण्ड राज्य के जिला एवं तहसील हरिद्वार के इस गांव का नाम है सुभाषगढ़। उत्तर रेलवे के लक्सर जंक्‍शन से रेल जब हरिद्वार के लिए बढ़ती है तो पहला स्टेशन ऐथल पड़ता है। ऐथल स्टेशन से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम दिशा में अवस्थित है गांव सुभाषगढ़। सड़क मार्ग से लक्सर और हरिद्वार से गांव सीधे जुड़ा है। जिला मुख्यालय लगभग 23 किलोमीटर और राज्य की राजधानी देहरादून से लगभग 63 की दूरी पर गांव स्थित है। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि उत्तराखण्ड में नेताजी के नाम का गांव क्यों और कैसे बसा है। किसने इस गांव को बसाया है और नेताजी का गांव से आखिरकर क्या संबंध है।

: जयंती पर विशेष : भारत रत्न नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारतीय इतिहास में एक बहेद महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेता जी का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, उड़ीसा में हुआ था, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि उड़ीसा से हजारों किलोमीटर दूर उत्तराखण्ड में नेताजी की याद में उनके नाम से एक गांव बसा हुआ है, जहां की मिट्टी में आज भी नेताजी की मौजूदगी का एहसास होता है। उत्तराखण्ड राज्य के जिला एवं तहसील हरिद्वार के इस गांव का नाम है सुभाषगढ़। उत्तर रेलवे के लक्सर जंक्‍शन से रेल जब हरिद्वार के लिए बढ़ती है तो पहला स्टेशन ऐथल पड़ता है। ऐथल स्टेशन से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम दिशा में अवस्थित है गांव सुभाषगढ़। सड़क मार्ग से लक्सर और हरिद्वार से गांव सीधे जुड़ा है। जिला मुख्यालय लगभग 23 किलोमीटर और राज्य की राजधानी देहरादून से लगभग 63 की दूरी पर गांव स्थित है। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि उत्तराखण्ड में नेताजी के नाम का गांव क्यों और कैसे बसा है। किसने इस गांव को बसाया है और नेताजी का गांव से आखिरकर क्या संबंध है।

स्थानीय निवासी ओंकार नाथ शर्मा के अनुसार गांव को बसाने में आजाद हिंद फौज के गर्वनर जनरल शाहनवाज खान की प्रेरणा और योगदान है। जनरल खान का जन्म 24 जनवरी 1914 को गांव मटौर, जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। फौजी परिवार के शाहनवाज ने भी अपने लिए देश सेवा का रास्ता चुना और ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए और दूसरे विश्‍व युद्व में भाग लिया। वर्ष 1943 में नेताजी से प्रभावित होकर जनरल खान ने आजाद हिंद फौज को ज्वाइन कर लिया। जनरल खान की गिनती नेताजी के करीबियों में होती थी। जनरल शाहनवाज खान के साथ उनके पुश्‍तैनी गांव और आस-पास के क्षेत्र के सैंकड़ों सैनिक आजाद हिंद फौज के झण्डे तले देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। 1947 में आजादी के बाद हुए बंटवारे में आजाद हिंद फौज के सैंकड़ों सैनिक उनके परिवार पाकिस्तान छोड़कर हिन्दुस्तान चले आये थे। जनरल शाहनवाज खान ने इन बहादुर सैनिकों को हरिद्वार के निकट बसाने का नेक काम किया और गांव का नामकरण महान स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम से किया।

गांव के बुजुर्गों के अनुसार बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान आने पर सब लोगों ने सरकार द्वारा चलाये जा रहे रिफ्यूजी कैम्पों में शरण ली थी। हालात सामान्य होने पर एक-दूसरे की खोज-खबर पता चली और सम्पर्क स्थापित हो पाया। जनरल खान अपने साथ कंधे से कंधे मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ने वाले वीर सैनिकों और भारत माता के सच्चे सपूतों को भूले नहीं थे। जनरल खान प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ गहरी घनिष्ठता थी। गांधी जी और नेहरू की प्रेरणा से जनरल खान ने राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश किया और 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर मेरठ से जीत दर्ज की और पॉलियामेंट्री सेक्रेटी और डिप्टी मिनिस्टर रेलवे बने। जनरल खान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को आजाद हिंद फौज के इन बहादुर सैनिकों की आजादी की लड़ाई में योगदान और शहादत की दास्तां बताई और उनकों सम्मानपर्वूक जीने के लिए रहने और खेती-बाड़ी के लिए जमीन देने का आग्रह किया। पंडित जी ने जनरल खान के आग्रह को स्वीकार करते हुए इन बहादुर सैनिकों को तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य के हरिद्वार जिले में घर और खेती की जगह दी। गांव की स्थापना 1952 में हुई थी।

गांव में तकरीबन ढाई सौ घर हैं। गांव की आबादी 1700 के आसपास और 1100 मतदाता हैं। ज्वालापुर (सु0) विधानसभा सीट के तहत गांव आता है। ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधान महिला सीट है। पूरे जिले में सारस्वत ब्राहम्णों का यह सबसे बड़ा और इकलौता गांव है। गांव के हर घर में सैनिक हैं। मूलतः पाकिस्तान के जिला रावलपिण्डी (तत्कालीन भारत) के विभिन्न गावों के ये वाशिंदे और उनके पूर्वज सैनिक और किसान थे। ब्रिटिश आर्मी में काम करते हुए इन सैनिकों ने द्वितीय विश्‍व युद्व में भाग लिया। युद्व के दौरान सैनिकों को जापनी फौज ने रंगून की जेलों में बंदी बना दिया था। उस समय नेताजी ने जेलें तोड़कर इन सैनिकों को आजाद करवाया और आजाद हिंद फौज में शामिल होने का आह्वान किया। नेताजी के प्रेरणा से इन बहादुर सैनिकों ने पूरे जोश और हिम्मत के साथ आजादी की लड़ाई में बढ़-चढकर हिस्सा लिया और देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई।

गंाव के घर-घर में सैनिक मौजूद हैं। बदले समय के साथ गांव के युवा सेना के अलावा दूसरी नौकरियां भी कर रहे हैं। गावं में मवेशियों की अच्छी खासी संख्या के कारण अधिकतर निवासी दूध के व्यवसाय से जुड़े हैं। हरिद्वार शहर में दूध की लगभग 60 फीसदी सप्लाई इसी गांव से होती है। गांव में चावल व गन्ने की खेती अधिक होती है। गांव में स्कूल, डाकघर आदि की सुविधाएं हैं। हरिद्वार शहर के करीब बसे होने के कारण गांव में जरूरत की हर वस्तु उपलब्ध है। गांव के बीचों बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा स्थापित है। जनरल खान का घर और खेती ऐथल रेलवे स्टेशन के नजदीक है। जनरल खान की मृत्यु 9 दिसंबर 1983 को हो गयी थी। जनरल खान के परिवारीजन आज भी पूरी आत्मीयता से गांव वासियों से मिलते-जुलते हैं। गांववासी भी जनरल खान के परिवार को अपने संरक्षक की तरह मानते हैं। मशहूर उद्योगपति ब्रिगेडियर डा0 कपिल मोहन ने अपने खास दोस्त जनरल खान की प्रेरणा से गांव में एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया है। गांव को राष्ट्रपति द्वारा निर्मल गांव का पुरस्कार मिल चुका है। हरिद्वार जनपद में क्षेत्र में इस गावं को फौजियों के गांव के रूप में जाना जाता है, और गांव के काफी युवा वर्तमान में सेना और अर्धसैनिक बलों में कार्यरत हैं अर्थात सैनिक परंपरा आज भी जारी और जीवित है।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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