: सीबीआई जांच की तलवार से सहमी सरकार ने पांच सहकारी चीनी मिलों को बेचने का प्रस्ताव किया रद्द : उत्तर प्रदेश की माया सरकार राज्य की 21 सरकारी चीनी मिलों को औने-पौने दामों में बेचने के मुद्दे पर सीबीआई जांच की लटकती तलवार से अत्यंत भयभीत है। जिस सरकार ने 21 सरकारी चीनी मिलों को शराब माफिया पोंटी चड्ढा और अन्य कंपनियों को कौडिय़ों के भाव में बेच दिया हो और हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने मामला दाखिल होने पर इस बिक्री पर रोक न लगाई हो, वही सरकार एनआरएचएम में करोड़ों के घोटाले और विभाग के दो सीएमओ व एक डिप्टी सीएमओ की हत्याओं की सीबीआई जांच की अदालती तलवार से इतनी डरी-सहमी है कि पांच सहकारी चीनी मिलों को बेचने से उसे अपने कदम वापस खींचने पड़े हैं।
सरकार ने पांच सहकारी चीनी मिलों मोहिउद्दीनपुर-मेरठ, रामपुर, नवाबगंज-गोंडा, बुढ़वल-बाराबंकी व छाता-मथुरा की नीलामी के लिए 10 जून 2011 को नीलामी सूचना निकाली थी और कौडिय़ों के दाम इन्हें बेचना चाहती थी। इस बीच पत्रकार सच्चिदानंद गुप्ता उर्फ सच्चे ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जनहित याचिका दाखिल कर दी, जिसका संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा सरकारी चीनी मिलों को निजी हाथों में बेचने के मामले पर सख्त रुख अपनाया और सरकार व खरीदार कंपनियों को नोटिस जारी करके चार हफ्ते में जानकारी तलब कर ली।
याचिका में बसपा सरकार पर आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2010 में सरकार ने मुनाफा दे रही 11 चीनी मिलों को औने-पौने दामों में निजी कंपनियों को बेच दिया है। इसी प्रकार 4 जनवरी, 2011 को दस अन्य चीनी मिलों को भी नियम विरुद्घ तरीके से बेच दिया गया है। इन सभी 21 चीनी मिलों को वेब इंडस्ट्रीज लिमिटेड, इंडियन पोटाश लिमिटेड, गिरासो कंपनी प्रा. लि., नम्रता मार्केटिंग प्रा. लि., एसआर बिल्डकाम प्रा. लि., नीलगिरि फूड प्रोडक्ट लिमिटेड व फूड एंड एग्रो प्रोडक्ट लिमिटेड को बेचा गया है। अब और पांच सहकारी चीनी मिलों को बेचने की तैयारी है। याचिका पर अधिवक्ता कामिनी जायसवाल और अखिलेश कालरा ने बहस करते हुए मांग की कि मिलों को बेचे जाने संबंधी आदेश खारिज किए जाएं और मामले की सीबीआई से जांच कराई जाए।
बीती 19 जुलाई को न्यायमूर्ति प्रदीप कांत और न्यायमूर्ति ऋतुराज की खंडपीठ के समक्ष जब यह मामला पेश हुआ तो सीबीआई जांच से डरी सरकार के अपर महाधिवक्ता जेएन माथुर ने जानकारी दी कि सरकार ने पांच चीनी मिलों, जिनकी नीलामी सूचना 10 जून, 2011 को प्रकाशित की थी, को बेचने का प्रस्ताव रद्द कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि इन चीनी मिलों का जो मूल्यांकन पहले किया गया था, वह सही नहीं है, इसलिए चीनी मिलों का सही मूल्यांकन करने के लिए गंभीर विचार-विमर्श किया जा रहा है। जबतक यह काम नहीं हो जाता, तब तक सरकार इन चीनी मिलों को बेचने का काम नहीं करेगी।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि जो भी नया मूल्यांकन किया जाएगा, उसे कोर्ट के संज्ञान में लाया जाएगा और जहां तक याचिका में अन्य मिलों को कौडिय़ों के दाम बेचने की बात है तो जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए प्रतिवादियों को तीन हफ्ते का समय दिया जाता है। वैसे भाजपा, कांग्रेस और सपा ने भी चीनी मिल बिक्री घोटाले की सीबीआई जांच की मांग की है। भाजपा ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि 25 हजार करोड़ रुपए का घोटाला किया गया है।
गौरतलब है कि अमरोहा चीनी मिल की पेराई क्षमता तीन हजार टन प्रतिदिन है। यह मिल 29.89 हेक्टेयर क्षेत्र यानी 74 एकड़ अथवा तीन लाख वर्गमीटर में स्थापित है। मिल परिसर में चार आलीशान बंगले हैं। एक विशाल गेस्ट हाउस भी है। मिल की जमीन पर जिला जज का बंगला और सर्किट हाउस बने हैं। पांच बड़ी कालोनियां हैं, जिनमें 300 रिहायशी फ्लैट्स हैं। 20 फ्लैट्स में जेपी नगर के सरकारी अधिकारी रहते हैं। मिल के गोदाम, बिल्डिंग, प्लांट और मशीनरी की कीमत का अनुमान नहीं लगाया गया। मिल की भूमि पर 230 हरे विशाल पेड़ हैं। इस क्षेत्र का डीएम सर्किल रेट छह हजार रुपए वर्गमीटर है। सर्किल रेट के हिसाब से केवल जमीन की ही कीमत सौ करोड़ रुपए है, जबकि मिल की सारी संपत्ति, मशीन आदि मिलाकर महज 17 करोड़ में बेच दी गई है। आरोप है कि जिस समय मिल चल रही थी, उसी समय इस पर कब्जा लेने के लिए पोंटी चड्ढा के हथियारबंद लोगों ने धावा बोल दिया। कब्जे के लिए 40 गाडिय़ों का काफिला पहुंचा था। कब्जे के समय आठ हजार बोरी कच्ची चीनी, पांच हजार 275 बोरी तैयार चीनी और 10 हजार कुंतल शीरा मौजूद था। इस सब पर भी कब्जा कर लिया गया।
इसी तरह चांदपुर चीनी मिल की पेराई क्षमता 2500 टन है। इसे पोंटी चड्ढा की फर्म को 90 करोड़ रुपए में बेचा गया। 1974 में यह मिल 84 एकड़ जमीन पर स्थापित की गई थी। मिल के आसपास का क्षेत्र गन्ना उत्पादन के लिए बेहद उर्वर है। वर्ष 2005 में मिल ने भारी मुनाफा कमाया था, बाद में एक साजिश के तहत पड़ोसी की निजी चीनी मिल को फायदा पहुंचाने के लिए समय से पहले ही पेराई बंद की जाने लगी। इसके बावजूद 2008-09 और 2009-10 में भी मिल मुनाफे में रही।
उधर, जरवल रोड मिल की पेराई क्षमता भी 2500 टन है। इसे पोटाश लि. को 26.95 करोड़ रुपए में बेचा गया है। वर्ष 1990 में 20 करोड़ की लागत से 94 एकड़ जमीन पर मिल शुरू हुई थी। मिल में आधुनिक प्लांट है। हाल के वर्षों में मिल ने 15 करोड़ का मुनाफा कमाया है। सिसवां बाजार मिल की क्षमता भी 2500 टन है। मिल पूरी तरह आधुनिक है। कुछ वर्ष पूर्व ही 34 करोड़ रुपए खर्च करके इसका आधुनिकीकरण किया गया था। 2008-2009 में मिल ने 30 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था। मगर इसे भी अब 34 करोड़ में बेच दिया गया है। कब्जा लेते ही खरीदार ने मिल का पुराना सामान ही 31 करोड़ में नीलाम करके मुनाफा कमा लिया। नेता विपक्ष शिवपाल सिंह यादव के अनुसार, मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित सचिव समूह (सीजीडी) के 8 मई 2010 के कार्यवृत्त से स्पष्ट है कि 11 चीनी मिलों का अनुमानित मूल्य अगस्त 2009 में 639.54 करोड़ रुपए तय हुआ था, जिसे बाद में वर्ष 2010 में घटाकर 614.70 करोड़ रुपए कर दिया गया। सचिव समूह द्वारा 28 अगस्त, 2010 व 19 नवंबर 2010 की बैठकों में कई चीनी मिलों का उनके अनुमानित मूल्य से बहुत कम धनराशि में विक्रय कर दिया गया है।
आरोप है कि जिन चार चीनी मिलों चांदपुर (बिजनौर), अमरोहा, जरवल रोड (महाराजगंज) और सिसवा बाजार (बहराइच) को राज्य सरकार ने करीब 170 करोड़ रुपए में बेचा है, उनकी वास्तविक कीमत 3,000 करोड़ रुपए से अधिक है। इन मिलों के पास विशाल परिसंपत्तियां हैं। बहराइच की चीनी मिल में 94 एकड़ जमीन है, 10 करोड़ का स्क्रैप, 9 करोड़ की चीनी, 1.5 करोड़ का शीरा पड़ा हुआ है। मगर यह मिल महज 27 करोड़ में बेच दी गई है। सिसवां बाजार, महराजगंज की मिल भी बेशकीमती संपत्तियों सहित महज 34 करोड़ में बेच दी गई। साभार : डेली न्यूज एक्टिविस्ट
लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और डेली न्यूज एक्टिविस्ट, इलाहाबाद के संपादक हैं.


