कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के कार्यकाल में भले ही 16 हजार 85 करोड़ रुपए का खनन घोटाला हुआ हो मगर उत्तर प्रदेश में यदि पिछले चार साल से अधिक के बसपा सरकार के कार्यकाल में खनन घोटाले की प्रदेश स्तरीय जांच सीबीआई से कराई जाए तो यह कम से कम 5 से 10 हजार करोड़ रुपए के बीच बैठेगा। कनार्टक में तो मुख्यत: एक ही परिवार रेड्डी बंधु ने वेल्लारी में अवैध खनन करके हजारों करोड़ का चूना लगाया है, मगर उत्तर प्रदेश में इस अवैध खनन में खनन माफियाओं के साथ-साथ मंत्री और विधायक तक संलिप्त हैं।
अभी पिछले दिनों सीएमओ हत्याकांड में हटाए गए निवर्तमान खनन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के कार्यकाल में पूरे प्रदेश में खनिज हो या फिर लघु खनिज, सभी के पट्टे में भारी धांधली की गई और अवैध धन उगाही करके पट्टे बांटे गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसका संज्ञान लेकर बांदा और सहारनपुर के मामले में सीबीआई जांच कराने का आदेश भी पारित कर दिया था, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट चली गई और सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मामला पुनर्विचार केलिए फिर से इलाहाबाद हाईकोर्ट को संदर्भित कर दिया।
खनन घोटाले का अंदाजा केवल इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि चंदौली के एक खनन घोटाले में तत्कालीन खनन सचिव और वर्तमान मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह पंकज, वाराणसी के डीएम अजय कुमार उपाध्याय, चंदौली के सीडीओ/प्रभारी राधेश्याम गुप्ता पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना लगा था, जिसका भुगतान उनके वेतन से करने का निर्देश दिया गया था। साथ ही खनन इंस्पेक्टर पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगा था। इस बीच पूरे प्रदेश में बिना पर्यावरणीय क्लीयरेंस लिए खनन कार्यों पर रोक लगी है और निर्देश दिया गया है कि 1 जुलाई 2011 से प्रदेश में बिना पर्यावणीय क्लीयरेंस कहीं भी बालू/सिलिका सहित लघु खनिज का खनन कार्य नहीं होगा। खनन कार्यों के लिए पर्यावरणीय क्लीयरेंस बाध्यकारी बना दिया गया है।
गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश में अवैध खनन और अमीनों द्वारा खनन की जांच के लिए पांच सदस्यीय टीम का गठन किया था, जिसमें केंद्रीय खनन मंत्रालय के भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड मामलों को देखने वाले उपमहानिदेशक सुमंत गुप्ता को अध्यक्ष तथा जेआर चौधरी- उपनियंत्रक खान, डॉ. केके गर्ग- निदेशक पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, डॉ. एसए फारुकी- सलाहकार, भूगर्भ एवं खनन निदेशालय, उत्तर प्रदेश और एके अरोड़ा- निदेशक, भूमि जल विभाग, उत्तर प्रदेश को बनाया गया।
इस टीम ने बांदा, सहारनपुर, हमीरपुर, जालौन, इलाहाबाद, कौशाम्बी, फैजाबाद व सोनभद्र का दौरा किया और मौके पर जाकर खनन कार्यों का जायजा लिया। जांच में पाया गया कि कहीं भी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से पर्यावरण प्रभाव अधिसूचना 2006 के तहत बाध्यकारी पर्यावणीय क्लीयरेंस नहीं लिया गया है। कहीं भी भूजल के आकलन केलिए आब्जर्वेशन की व्यवस्था नहीं की गई है। लघु खनिज रियायत नियमावली- 1963 का उल्लंघन कर के उन क्षेत्रों में भी खनन होता दिखाई पड़ा, जहां खनन का पट्टा नहीं है। यानी अवैध खनन हो रहा है। स्थान-स्थान पर अमीनों का प्रयोग करके खनन कार्य होता दिखाई पड़ा। जांच में यह भी सामने आया कि सिकमी पट्टेदारों पर खनन कार्य किया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश एफआई रिबैलो और न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह की खंडपीठ ने मोहम्मद कौसर जहां बनाम केंद्र व अन्य तथा श्याम बहादुर शाक्य बनाम केंद्र व अन्य के मामले में राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि 1 जुलाई 2011 को प्रदेश के किसी भी हिस्से में बालू/सिलिका सहित लघु खनिज का खनन कार्य कोई भी पट्टाधारक नहीं करेगा, यदि उसने 14 सितंबर 2006 की अधिसूचना के आधार पर पर्यावरणीय क्लीयरेंस नहीं लिया है। खंडपीठ ने राज्य सरकार को नूर मोहम्मद बनाम उत्तर प्रदेश में 6 मार्च, 2009 को पारित न्यायालय के आदेश के पैरा 20 में दिए गए निर्देश तथा पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के पत्र दिनांक 1जून 2010 के तहत गठित समिति की रिपोर्ट का क्रियान्वयन करने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया है।
याचिका केंद्रीयपर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना 1533 दिनांक 14 सितंबर 2009 के उल्लंघन को लेकर दाखिल की गई थी और आरोप लगाया गया था कि प्रदेश शासन के आला अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करके बिना पर्यावरणीय क्लीयरेंस लिए पूरे प्रदेश में अवैध खनन के पट्टे जारी कर रहे हैं। यह केंद्र और राज्यों की खनिज नियमावली व खनिज कानून का घोर उल्लंघन है। यही नहीं, एमसी मेहता बनाम केंद्र व अन्य मामले में पारित आदेश दिनांक 18 मार्च 4 व 8 मई 2009 की भी खुली अवहेलना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किया है कि कोर्ट भी खनन कार्य, जिसमें लघु खनिज का खनन भी शामिल है, तबतक नहीं किया जाएगा, जबतक कि इसके लिए पर्यावरणीय क्लीयरेंस नहीं ले लिया जाता।
इसके पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बसपा कार्यकाल के दौरान मनमाने ढंग से खनन पट्टा दिए जाने के संबंध में याचिका में लगाए गए गंभीर आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश दे चुका है। न्यायमूर्ति प्रकाश चंद्र वर्मा व न्यायमूर्ति बालकृष्ण नारायण की खंडपीठ ने याचिका संख्या 13552/2009 व 13550/2009 की सुनवाई करते हुए अलग-अलग आदेशों में पुलिस अधीक्षक सीबीआई लखनऊ को इस मामले की जांच करने का निर्देश दिया, ताकि राज्य सरकार द्वारा खनन लाइसेंस जारी करने के ढंग के बारे में खंडपीठ के समक्ष वास्तविक तथ्य उजागर हो सकें। खंडपीठ ने सीबीआई को 4 अप्रैल 2010 तक हाईकोर्ट में प्रारंभिक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए इन याचिकाओं को 5 अप्रैल 2010 को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया था, लेकिन राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई और सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए इसे पुनर्विचार के लिए पुन: इलाहाबाद हाईकोर्ट में भेज दिया।
इसके पूर्व खंडपीठ ने मुख्य सचिव, उ.प्र. शासन को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि उप्र लघु खनिज (रियायत) नियमावली 1963 के तहत बीते तीन वर्षों के दौरान मनमाने ढंग से खनन पट्टा जाने के संबंध में याचिका में लगाए गए गंभीर आरोपों के मद्देननजर क्यों न सीबीआई जांच कराई जाए। याचिका संख्या 13552/10 बांदा और 13550/10 सहारनपुर से संबंधित हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश के खान मंत्री केसंरक्षण में ‘पिक एंड चूज’ पद्धति से खनन पट्टे दिए जा रहे हैं और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा चंद्रिका प्रसाद निषाद बनाम उप्र 2006 (24) एलसीडी 1243 में पारित दिशा निर्देशों, सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए आदेशों व नियमावली में विहित आवश्यक शर्तों की खुली अवहेलना की जा रही है।
वर्ष 2008 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बांदा के अधिसूचित 142 क्षेत्रों में से केवल 11 के खनन पट्टे दिए गए हैं। हमीरपुर में अधिसूचित 220 क्षेत्रों में केवल 48 और जालौन में अधिसूचित 32 क्षेत्रों में से केवल 25 के खनन पट्टे दिए गए हैं। याचिकाकर्ता ने पट्टे धारकों के अवैध खनन में लिप्त होने की आशंका जताते हुए कहा है कि झांसी मंडल में वर्ष 2008 में 263 छापे डाले गए और 39.69 लाख रुपया वसूला गया, जबकि इनकी वास्तविक वसूली कई करोड़ रुपए है। इसी तरह चित्रकूट मंडल में 457 छापे मारे गए और 42.07 लाख रुपए वसूले गए। याची ने कहा है कि पट्टाधारकों के खिलाफ जो छापे मारे गए, उनमें करोड़ों रुपए का अर्थदंड लगाया गया, लेकिन सुविधा शुल्क के बल पर न तो खनन पट्टे निरस्त किए गए, न ही अर्थदंड की वसूली की गई।
याचिका के अनुसार, वशिष्ठ कुमार जायसवाल बनाम उ.प्र. में कोर्ट ने कहा है कि नियमावली-1963 का नियम 6 और नियम 8 असंवैधानिक व अवैध है, क्योंकि इसमें पट्टे का निर्धारण सार्वजनिक नीलामी के बजाय ‘पिक एंड चूज’ पद्धति से करने का प्रावधान है। इसके बावजूद प्रदेश शासन अपनी मनमानी के लिए इसका इस्तेमाल कर रहा है। यही नहीं, मनमाने ढंग से खनन पट्ïटा देने के मामले में खनन सचिव सहित अन्य अधिकारियों ने अदालत से बिना शर्त माफी भी मांगी। अवैध खनन करने वाले पट्टेदार को लाभ पहुंचाने के लिए और पट्टा रद्द करने व उस पर अवैध खनन के लिए लगे अर्थदंड वसूल करने के बजाय उसे दूसरा खनन पट्टा दिए जाने के एक मामले में अदालत में लगातार गलत बयानी करने, तथ्य छिपाकर अदालत को गुमराह करके अपने पक्ष में आदेश लेने और कोर्ट में लगातार झूठ बोलने पर कड़ी फटकार लगाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के तत्कालीन खनन सचिव रणजीत सिंह पंकज, वाराणसी के जिलाधिकारी अजय कुमार उपाध्याय, चंदौली केसीडीओ/प्रभारी राधेश्याम गुप्ता को अपने वेतन से 50-50 हजार रुपए का जुर्माना बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से चार हफ्ते के भीतर हाईकोर्ट के महानिबंधक के पास जमा करने का आदेश दिया था। चंदौली के खनन इंस्पेक्टर लालता प्रसाद को चंदौली/वाराणसी से तत्काल स्थानांतरित करके किसी अन्य कार्यालय में तैनात करने का आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा कि लालता प्रसाद अपने वेतन से एक लाख रुपए का जुर्माना बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से महानिबंधक के पास जमा करें। अवैध खनन में दोषी पट्टेदार अशोक कुमार सिंह को दो माह के भीतर याची को एक लाख रुपए का जुर्माना देने का आदेश दिया है।
यह रिजर्व आदेश न्यायमूर्ति अरुण टंडन ने श्रीमती कांति देवी बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में देते हुए राज्य सरकार के अधिकारियों जिनमें सचिव खनन, जिलाधिकारी व खनन इंस्पेक्टर शामिल हैं, द्वारा दाखिल हलफनामों को झूठ का पुलिंदा भी बताया। एकल पीठ ने कहा है कि न्याय की नदी को हर कीमत पर प्रदूषित होने से बचाना चाहिए, चाहे प्रदूषित करने का प्रयास करने वाला कितना ही बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। यदि वह न्याय की नदी को प्रदूषित कर रहा है तो स्थिति केअनुरूप उससे कानून की परिधि के भीतर निपटना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के तत्संबंधी आदेश को धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश की संज्ञा देते हुए निरस्त भी कर दिया।
लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और डेली न्यूज एक्टिविस्ट, इलाहाबाद के संपादक हैं.


