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उत्‍तराखंडियों को हिमालय विरोधी क्‍यों लगते हैं जीडी अग्रवाल उर्फ स्‍वामी सानंद!

गंगोत्री के पास स्वामी सानंद की कृपा से 600 करोड़ खर्च करने के बाद बंद की गई लोहारी-नागपाला जलविद्युत परियोजना की कच्ची सुरंगें अब पर्यावरण के लिए और ज्यादा खतरनाक हो गई हैं और इससे यहाँ के पहाड़ लगातार खिसक रहे हैं जो स्थानीय लोगों के लिए खतरनाक बन गए हैं. पर इस पर कथित वैज्ञानिक सानंद ने एक शब्द भी नहीं कहा! हिमालय के जंगलों में लगी भीषण आग पर सानंद मौन हैं, जिसके कारण हर साल करोड़ों टन खतरनाक कार्बन गैस वातावरण में घुल रही है! हरिद्वार के जिन आश्रमों में वे अड्डा जमाकर गंगा को बचाने की मुहिम छेड़ने का दावा करते हैं वहां के कई विशाल आश्रमों का सीवर सीधे गंगा में बहाया जा रहा है. इन 5 स्टारनुमा अरबपति आश्रमों के पास अपने सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं हैं, ये प्लांट लगाने में सक्षम भी हैं, पर गंगा के नाम पर कमाई करने वाले ये मठाधीश सिर्फ प्रवचनों में ही गंगा को साफ़ व पवित्र रखने का राग अलापते हैं और सानंद व उमा भारती जैसे कथित पर्यावरणविदों की भूख हड़तालों के प्रायोजक बन जाते हैं. उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 96 आश्रम है इनका सीवर भी गंगा में जाता है. आनंद इस पर भी मौन हैं. 

गंगोत्री के पास स्वामी सानंद की कृपा से 600 करोड़ खर्च करने के बाद बंद की गई लोहारी-नागपाला जलविद्युत परियोजना की कच्ची सुरंगें अब पर्यावरण के लिए और ज्यादा खतरनाक हो गई हैं और इससे यहाँ के पहाड़ लगातार खिसक रहे हैं जो स्थानीय लोगों के लिए खतरनाक बन गए हैं. पर इस पर कथित वैज्ञानिक सानंद ने एक शब्द भी नहीं कहा! हिमालय के जंगलों में लगी भीषण आग पर सानंद मौन हैं, जिसके कारण हर साल करोड़ों टन खतरनाक कार्बन गैस वातावरण में घुल रही है! हरिद्वार के जिन आश्रमों में वे अड्डा जमाकर गंगा को बचाने की मुहिम छेड़ने का दावा करते हैं वहां के कई विशाल आश्रमों का सीवर सीधे गंगा में बहाया जा रहा है. इन 5 स्टारनुमा अरबपति आश्रमों के पास अपने सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं हैं, ये प्लांट लगाने में सक्षम भी हैं, पर गंगा के नाम पर कमाई करने वाले ये मठाधीश सिर्फ प्रवचनों में ही गंगा को साफ़ व पवित्र रखने का राग अलापते हैं और सानंद व उमा भारती जैसे कथित पर्यावरणविदों की भूख हड़तालों के प्रायोजक बन जाते हैं. उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 96 आश्रम है इनका सीवर भी गंगा में जाता है. आनंद इस पर भी मौन हैं. 

परियोजनाओं के बंद होने से उत्तराखंड सरकार को करीब 15 हजार करोड़ का सालाना नुकसान होगा, सानंद इसकी भरपाई कहाँ से करेंगे! बिजली की आपूर्ति के लिए उत्तराखंड सरकार कोयले से चलने वाले थर्मल पावर स्टेशन लगाने की योजना बना रही है, जिससे पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचेगी इस पर सानंद क्या फिर भूख हड़ताल करेंगे? उत्तराखंड के नामी समाजसेवियों व पर्यावरणविदों का मानना है कि स्वामी सानंद की हिमालय के प्रति सोच दकियानूसी, अव्यहारिक व अवैज्ञानिक है. प्रधानमंत्री को चाहिए कि हिमालय, उससे निकालने वाली नदियों को बचाने व विकास में संतुलन बनाए रखने के लिए….सानंद जैसे अव्यहारिक व्यक्ति के बजाये हिमालय के लिए दशकों से काम करने वाले चिपको नेता सुन्दर लाल बहुगुणा, मेगासेसे विनर चंडी प्रसाद भट्ट, जल संरक्षण के लिए समर्पित भारती व हिमाचल प्रदेश के पर्यावरणविद उपमन्यु जैसे पर्यावरणविदों को …गंगा बेसिन प्राधिकरण की बैठक में बुलाएं. नौकरशाह से स्वामी बने सानंद ने गंगा और अलकनंदा पर बनने वाली करीब 1400 करोड़ रुपये की बिजली परियोजनाओं को बंद करवाकर देश की आम जनता के टैक्स के रुपये को नदी में बहा दिया है. इस भूख हड़ताली शेर ने उन गैर सामाजिक सगठनों में भी जान फूंक दी है, जो उत्तराखंड में गंगा के फोटो खींच-खींच कर गंगा को बचाने के नाम पर विदेशों से खूब पैसा खींचते हैं. सरकारें भी बिना रीढ़ की तरह इसके सामने झुकती जा रही है.

देश में सैकड़ों लोग अपनी-अपनी मांगों के लिए भूख हड़ताल पर होंगे और लाखो गरीबों की भूख हड़ताल एक नियति है. आज-कल उत्तराखंड में यमुना, गंगा व अलकनंदा आदि नदियों के जलसंरक्षण क्षेत्रों के जंगलों में भीषण आग लगी है, जो पूरी गर्मियों  में जारी रहेगी. और हर साल की तरह इस साल भी इससे करोड़ों पेड़ व बेस कीमती हिमालयी वनस्पतियाँ जलकर नष्ट हो जायेंगी. इससे हिमालय को भारी नुकसान होता है पर सानंद को इससे क्या? गत वर्ष (नौगाँव) उत्तरकाशी में महिला स्वयं सहायता समूहों की एक सभा में पहाड़ी महिलाओं ने हिमालय को बचाने के लिय प्रस्ताव पास कर राज्य व केंद्र सरकार को भेजा, जिसमें कहा गया था कि जितना धन सरकार हिमालय व यहाँ की नदियों को बचाने के लिए खर्च कर रहीं है, उससे आधे धन में पहाड़ की महिलायें हिमालय को देश व दुनिया के लिए सुरक्षित व सरंक्षित रख सकती हैं. प्रताव में कहा गया था कि सरकार पहाड़ की महिलाओं का एक …हिमालय सुरक्षा बल गठित…किया जाए, जो अपने गांव स्तर पर वृक्षारोपण, जंगलों की आग से रक्षा, आपदा प्रबंधन, एको व ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ जंगलो में जडी-बूटी का उत्पादन का कामकर स्वावलंबी बनेंगी. इससे हिमालयी क्षेत्र से लगातार हो रहा पलायन भी रूकेगा और इससे हमारे ताकतवर देश चीन से लगी सीमा भी सुरक्षित रहेगी. इन महिलाओं को इसके एवज में नियमित मेहनताना दिया जाए.

पहाड़ों की कठिन परिस्थितियों में काम करने वाली इन महिलाओं का ये प्रस्ताव दिल्ली के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठे योजनाकारों व दिल्ली में मीडिया के दफ्तरों में चक्कर काटने वाले कथित सानंदों की आँखें खोलने के लिए काफी है. पर इन धरती पुत्रियों की आवाज कोई नहीं सुनता क्योंकि यदि जमीन पर काम हुआ तो हिन्दुस्तान से स्विस बैंकों तक जाने वाली काले धन की नहर के सूखने का खतरा बढ़ जाएगा और देश खुशहाली की ओर बढ़ने लगेगा! जिस दिन इन महिलाओं की यह बैठक हुई उसी दिन सानंद भी हरिद्वार में हड़ताल पर था. दूसरे दिन इन हिमालय पुत्रियों की हिमालय के प्रति गंभीर सोच की खबर कुकुरमुत्तों की तरह उग आये अखबारों में कहीं नहीं थी, पर हिमालय पर ख़बरों की टीआरपी बटोरने वाले जी.डी. अग्रवाल उर्फ़ स्वामी सानंद अखबारों में छाये हुए थे.

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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