वर्ष 2007 में उत्तराखण्ड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अजय भट्ट का नाम लगभग फाइनल हो गया था। परन्तु दिल्ली हाईकमान ने प्रदेश के जातीय समीकरणों के आधार पर अजय भट्ट के नाम को अंतिम समय में हटाकर बच्ची सिंह रावत को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। ऐसा लगातार तीसरी बार हुआ था जब अजय भट्ट का नाम आखिरी समय में सिर्फ और सिर्फ जातीय कारणों से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा था। पार्टी हाईकमान ने अजय भट्ट को लगातर दूसरी बार महामंत्री घोषित कर दिया। एक ऐसा व्यक्ति जिसे प्रदेश अध्यक्ष बनना था उसने चुपचाप संगठन द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को सिर आंखों पर लेकर बिना किसी तरह का विरोध कर, दी गयी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा व उत्साह के साथ निभाया। ये हैं अजय भट्ट होने के मायने….।
प्रदेश की पहली अंतिरम सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी निभा चुके अजय भट्ट को वर्ष 2009 में दायित्वधारी बनाकर उनका कद कम करने की कोशिश की गयी। अजय भट्ट द्वारा इस पर अनिच्छा जाहिर करते हुए सामान्य कार्यकर्ता के रूप में पार्टी के अंदर काम करने की इच्छा जताई। परन्तु संगठन द्वारा यह कहे जाने पर कि इस दायित्व को भी संगठन का काम समझकर करो। अजय भट्ट ने एक बार फिर संगठन के आदेश को शिरोधार्य मान पूरी लगन के साथ दायित्व के साथ न्याय किया। ये हैं अजय भट्ट होने के मायने…।
इस बार भी जब चुनाव परिणाम आने के तुरन्त बाद उनका नाम नेता प्रतिपक्ष के लिए तय होने के बावजूद, घोषणा करने में लगभग ढाई माह की देरी कर दी गयी तब एकबारगी लगने लगा कि कहीं फिर वही इतिहास न दोहराया जाय। परन्तु आप किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति को कुछ समय के लिए रोक तो सकते हो किन्तु ज्यादा समय तक उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। आखिरकार लम्बी जद्दोजहद के बाद भाजपा हाईकमान ने उत्तराखण्ड में नेता प्रतिपक्ष की कमान अजय भट्ट के हाथों में सौंप दी। गौरतलब है कि नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में वरिष्ठ विधायक हरवंश कपूर, रमेश पोखरियाल निशंक व मदन कौशिक जैसे नाम शामिल थे। लेकिन अजय भट्ट इन सब पर भारी पड़े। अजय भट्ट को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं का मानना है कि नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी के असल हकदार अजय भट्ट ही थे। कार्यकर्ताओं का मानना है कि हाईकमान के नेता प्रतिपक्ष के पद पर अजय भट्ट की नियुक्ति के निर्णय से अस्त-व्यस्त हालत में पड़ी भाजपा को एकजुट होने का मौका मिलेगा, जिससे पार्टी में नयी ऊर्जा का संचार होगा। धुर विरोधी नेताओं को भी आपस में संजोये रखने का गुण एक मात्र अजय भट्ट में है, जो कठिन से कठिन विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का झण्डा व डण्डा बुलंद बनाये रखने की कुव्वत रखते हैं।
वैसे भी देखा जायें तो भाजपा के अंदर अजय भट्ट ही एकमात्र ऐसे सर्वमान्य नेता हैं जो तोड़ने की बजाये जोड़ने की राजनीति में विश्वास रखते हैं। आज भट्ट पार्टी के अंदर जहां खड़े हैं, उसके पीछे उनकी कर्मठ कार्यशैली, पार्टी के प्रति समपर्ण भाव व विषम स्थितियों में भी हार न मानने का उनका वह जज्बा शामिल है, जिसके चलते वे आज नेता प्रतिपक्ष के महत्वपूर्ण पद तक पहुंचने में कामयाब रहे। हालांकि आज तक पार्टी स्तर से उन्हें जो भी जिम्मेदारियां सौंपी गयी, उन सबमें वे खरे उतरे। लेकिन इन सबके बावजूद पार्टी स्तर पर कई मौकों पर जातीय समीकरणों के चलते उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दर किनार कर दिया गया। पार्टी के अन्दरूनी राजनीति के चलते उम्दा प्रदर्शन के बावजूद उनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं किया गया। परन्तु इन कुचक्रों से वे टूटे नहीं बल्कि ऐसी ही तमाम विषम परिस्थितियों ने उनके अंदर आगे बढ़ने का हौसला भर दिया और वे निस्वार्थ भाव से पार्टी हित में निरंतर जुटे रहे। अजय भट्ट ऐसे ही चमकदार हीरा साबित हुये जो अपने विरोधियों को भी गले लगाकर पार्टी का काम करते हुए लगातार आगे बढ़ते रहे और आज इस मुकाम तक आ पहुंचे। आज के समय में जब लोग सत्ता से कुछ माह की दूरी भी बर्दाश्त नहीं कर अपनी पार्टी के सिद्धांतों को तिलांजलि देकर घोर अवसरवादी बनते जा रहे हैं। ऐसे में अजय भट्ट की जीवनशैली एवं उनका राजनैतिक आचरण नवगांतुक राजनेताओं के लिए एक आदर्श है।
लेखक शरद तिवारी उत्तराखंड में वकालत के पेशे से जुड़े हुए हैं.


