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ये दुनिया

उदाहरण हमेशा ही हकीकत को नहीं बल्कि अपवादों को सिद्ध करते हैं

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एक गैर सरकारी संस्था से जब से जुड़ा हूँ तब से घर में कम और ग्रामीण इलाकों के भ्रमण में ज्यादा रहने लगा हूँ. आखिर एक यही तो आकर्षण था जिसकी वजह से मैं यह नौकरी करने को तैयार हो गया था. मुझे नई-नई जगह घूमने और खासकर ग्रामीण इलाकों में जाने का बहुत ही शौक है. उस दिन भी जब दिल्ली ऑफिस से फोन आया कि कल ही यदि झारखण्ड जाना हो तो क्या तुम तैयार हो? तो मैं यह भूल गया कि कल ही तो मैं बीस दिनों के बाद घर लौटा हूँ और शरीर किसी भी यात्रा से इनकार कर रहा है. मैंने झट से हाँ कर दी, और फिर अगले ही दिन दिल्ली के लिए निकल पड़ा. वहीँ से मुझे झारखण्ड के लिए ट्रेन लेनी थी.

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एक गैर सरकारी संस्था से जब से जुड़ा हूँ तब से घर में कम और ग्रामीण इलाकों के भ्रमण में ज्यादा रहने लगा हूँ. आखिर एक यही तो आकर्षण था जिसकी वजह से मैं यह नौकरी करने को तैयार हो गया था. मुझे नई-नई जगह घूमने और खासकर ग्रामीण इलाकों में जाने का बहुत ही शौक है. उस दिन भी जब दिल्ली ऑफिस से फोन आया कि कल ही यदि झारखण्ड जाना हो तो क्या तुम तैयार हो? तो मैं यह भूल गया कि कल ही तो मैं बीस दिनों के बाद घर लौटा हूँ और शरीर किसी भी यात्रा से इनकार कर रहा है. मैंने झट से हाँ कर दी, और फिर अगले ही दिन दिल्ली के लिए निकल पड़ा. वहीँ से मुझे झारखण्ड के लिए ट्रेन लेनी थी.

मैं पहली बार झारखण्ड जा रहा था. दिल्ली जाते वक्त मैं मन ही मन झारखण्ड की एक तस्वीर अपने मन में बुनने लगा. जो कुछ भी मैंने आज तक झारखण्ड के बारे में पढ़ा और सुना था उसी के आधार पर एक धुंधली सी तस्वीर मैंने तैयार कर ली थी. एक ऐसी तस्वीर जो मुझे एक पिछड़े और गरीब राज्य की दास्तान सुना रही थी. जो तस्वीर मुझे उन हालातों से परिचित करवा रही थी जिनकी वजह से कोई भी इंसान हथियार उठाने पर विवश हो जाये और नक्सली या माओवादी बनने तो तैयार हो जाये. ऐसे में मेरी जल्दी से झारखण्ड पहुँचने की उत्सुकता और भी बढे जा रही थी. ट्रेन में मैंने अपने लैपटॉप पर जब इन्टरनेट शुरू किया तो देखा कि झारखण्ड के ही एक जिले में नक्सली मुठभेड़ में ११ नक्सली मारे गए हैं और मुठभेड़ अभी जारी है. इस खबर ने मुझे और उत्सुक कर दिया, आखिर मैं पहली बार ऐसे हालातों को इतनी नज़दीक से देखने जा रहा था.

परन्तु राँची स्टेशन पर पहुँचते ही मैंने एक बड़ा विरोधाभासी दृश्य देखा. जहाँ एक तरफ स्टेशन पर मौजूद लोग मेरी कल्पनाओं की तस्वीर को सही ठहरा रहे थे वहीँ दूसरी ओर स्टेशन की चमक-धमक, बड़े बड़े होर्डिंग्स, और स्टेशन के ठीक सामने खड़ा एक आलिशान सा “चाणक्य” नाम का होटल मेरी तस्वीर को सिरे से नकार रहा था. फिर मुझे एहसास हुआ कि मैं राज्य की राजधानी में हूँ और किसी भी शो-रूम की चमक से उसके गोदाम की दशा का आंकलन करना कत्तई भी सही नहीं है. मैंने वहीँ से एक ऑटो किया और अपने गंतव्य के लिए चल पड़ा.अगले दिन सुबह मैं जिला राँची के रातू नामक ब्लाक के भोंडा गांव में पहुंचा. इस गांव की दशा मेरी बनाई तस्वीर के झारखण्ड से काफी मिलती-जुलती थी. मैं यहाँ के लोगों से बात करने लगा. फिर मैंने यहाँ के कुछ बच्चों से अपने कार्य के अनुसार बात करना शुरू किया. क्योंकि मैं प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहा हूँ तो मेरी बातों का विषय भी उसी से सम्बंधित था. तभी मुझे संग्राम नाम का एक बालक मिला. उसकी उम्र नौ वर्ष थी. मैंने उससे कुछ प्रश्न पूछे, और फिर उसे कुछ हिंदी में पढ़ने को एवं गणित के कुछ सवाल हल करने को दिए. उसने जल्द ही सारे सवाल कर दिए और साथ ही जो कुछ मैंने उसे पढ़ने को कहा उसने सब कुछ फटाफट पढ़ कर सुना दिया. मुझे बहुत ही खुशी हुई, कि इस गांव में शायद स्कूली शिक्षा का स्तर काफी अच्छा है जो यहाँ के बच्चे इतनी अच्छी प्रतिक्रिया दे रहे है. कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में घूमने के बाद मुझे इतना तो अनुभव हो ही चुका था कि संग्राम जैसे बच्चे आसानी से हर कहीं नहीं मिलते. मेरी उस बच्चे के माता-पिता एवं शिक्षकों से मिलने की प्रबल इच्छा हुई. मैंने बहुत ही खुशी से संग्राम से पूछा कि बेटे तुम कौन सी कक्षा में पढते हो? इस पर मुझे जो जवाब मिला उसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी.

संग्राम का जवाब था: “ मैं स्कूल नहीं जाता”.उसके इस जवाब ने मुझे बड़ी ही हैरानी में डाल दिया था. यदि यह बच्चा स्कूल नहीं जाता तो यह इतनी सरलता से गणित के सवाल कैसे कर सकता है, और इतने सहज भाव से हिंदी का पाठ कैसे पढ़ सकता है? मेरे मन में कई सवाल एक साथ उमड़ने लगे. फिर मैंने संग्राम से पूछा कि स्कूल क्यों नहीं जाते, और तुम्हे यह सब पढ़ना लिखना कौन सिखाता है? तो संग्राम ने जवाब दिया: “बाबूजी सिखाते है, और वही स्कूल नहीं जाने देते”. अब तो संग्राम के बाबूजी से मिलने की मेरी इच्छा और भी प्रबल हो गयी और मैंने उस बालक से पूछा कि क्या तुम्हारे बाबूजी घर पर हैं? उसने जवाब दिया “हाँ वो घर पर ही हैं, अभी अभी खेत से लौटे हैं”. मैंने उस बालक से कहा कि मुझे अपने घर ले चलो.

संग्राम मुझे अपने घर ले गया. आँगन में ही कोई 35-36 साल का व्यक्ति पेड़ की छाँव में खाट पर लेटा आराम कर रहा था. संग्राम ने उनसे जाकर कहा, “बाबूजी ऐ तुमसे मिलने आये हैं”. उस व्यक्ति ने मेरी ओर देखा और फिर उठकर पास ही में रखी एक और खाट को बिछाकर मुझे बैठने को कहा. मैंने उन्हें अपना परिचय देने के बाद कहा “आपका बेटा बहुत ही होशियार है और अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले काफी तेज भी है”. इस पर उनकी कोई ख़ास प्रतिक्रिया मुझे नहीं मिली. फिर मैंने सीधे ही उनसे पूछ लिया कि आप संग्राम को स्कूल क्यों नहीं भेजते? इस पर मुझे जवाब मिला : “काहे भेजें स्कूल?”. “आप नहीं चाहते कि वो स्कूल जाकर पढ़ना-लिखना सीखे?” मैंने पुछा. संग्राम के बाबूजी ने जवाब दिया: “क्यों? वो पढ़ना-लिखना नहीं जानत है का? आप ही तो अभी कहे हैं कि वह बहुत ही होशियार है और खूब तेज है?” इस पर मैंने कहा, ”हाँ तेज तो है. और यदि स्कूल जाये तो और भी अच्छा सीख सकता है. और पढ़ लिख कर डिग्री हासिल करके बड़ा आदमी भी बन सकता है”.

अब जो जवाब मुझे संग्राम के बाबूजी से मिले, ऐसे वैचारिक जवाबों की कल्पना मैंने किसी भी गांव के व्यक्ति से नहीं की थी. वह बोले : “कौन आपसे यह कह दिया कि डिग्री से आदमी बड़ा बन जात है? इंसान अपने ज्ञान और कर्मों से बड़ा होत है बाबूजी. हमको ई व्यवस्था और सरकारी शिक्षा में कोई बिश्वास नाही. हम भी यह जान रहे हैं कि पढ़ना लिखना ज़रूरी है, तभी न संग्राम को हम घर पर पढ़ना सिखा रहे हैं, परन्तु डिग्री की हमको कौनो ज़रूरत नाही है. स्कूल के बच्चों से ज्यादा तो संग्राम आज भी कर सकत है. और डिग्री तो गुलाम बनाये खातिर सरकार दे रही है, कौनो महान बनाए खातिर नहीं. आस पास के सभी गांव में आप घूम कर देख लो कि कितना लोग पढ़-लिख कर महान हो गए? जो मिल जावे तो हमको बोलो”

“लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जो आपके जैसे गांव से ही निकल कर महान बने हैं. उन्होंने भी इसी सरकारी शिक्षा को ही ग्रहण किया और फिर सारे विश्व में अपना नाम…” मुझे बीच में ही टोक-कर संग्राम के बाबूजी बोल पड़े, “हमको उदाहरण मत दीजिए बाबूजी. इहाँ गांव की और आस पास के गांव की हालत देखकर बात कीजिये. उदाहरण तो हम भी दे सकत हैं. नेताजी (सुभाष चंद्र बोस) ने तो अफसरी की परीक्षा पास करके भी नौकरी को लात मार दी थी, देश की सेवा खातिर. आज कहिये तो कितना लोग उनकी तरह कर सकता है? ऐसा-वैसा उदाहरण देकर ही ई लोग इस गन्दी व्यवस्था को बनाए हुए हैं, और सभी लोग उदाहरण को सुनकर वैसा ही बनने की भेड़-चाल में लग जात हैं. और सब लोगन को इस दौड़ में लगाकर कुछ लोग सब कुछ हड़प कर रहे हैं. जाने कब दुनिया इस बात को समझ पाएगी कि उदाहरण का पीछा करके कोई फायदा नहीं. असल हकीकत सबके सामने होते हुए भी लोग उदाहरण को ही देखते हैं, जो कहीं मौजूद ही नहीं है. अरे जो सब तरफ का माहौल है, जो जमीनी हकीकत है हम लोगन की, वही काहे नहीं उदाहरण बना लेते? हज़ार लोगन में किसी एक का उदाहरण मत दो बाबूजी, बाकी का 999 लोगन का उदाहरण देकर बात करो, तब जाने कि इस व्यवस्था में और आपकी शिक्षा प्रणाली में कितना दम है?

उस दिन मुझे उस गांव के व्यक्ति की बात से एहसास हुआ कि उसने कितना सच बोला था. एक ऐसा सच जिस पर हम कभी ध्यान नहीं देते. यह बात कितनी सत्य है कि “उदाहरण तो हमेशा अपवादों के ही दिए जाते हैं”. बचपन से हर विषय में हम यही पढ़ते आये हैं कि “उदाहरण सहित व्याख्या करो”. विज्ञान का कोई सूत्र हो या सामजिक शास्त्र का कोई सिद्धांत, हर बात उदाहरणों से कितनी सहज सी प्रतीत होने लगती थी. परन्तु आज जब उसी “उदाहरण के सिद्धांत” को समझने की कोशिश की तो लगा कि उदाहरण हमेशा ही हकीकत को नहीं बल्कि अपवादों को सिद्ध किया करते हैं.

लेखक राहुल कोटियाल पत्रकारिता में एमए करने के बाद ‘प्रथम’ नामक एक स्‍वयंसेवी संस्‍था के साथ जुड़े हुए हैं.

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