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उमराव जान फ़िल्म का संगीत खैय्याम का नहीं, मधु रानी का है : पीनाज मसानी

यह बात १९९१ की है। जब नवभारत टाइम्स के लिए दयानंद पांडेय ने उन से बात की। पीनाज मसानी ने उमराव जान के फ़िल्म के संगीत पर सवाल उठा दिया था। खास लखनऊ में। एक तरह से मुजफ़्फ़र अली के आंगन में। उन के घर से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर होटल क्लार्क्स में बैठी वह मुझ से बतिया रही थीं। उन दिनों वह गज़लों की रानी बनी घूमती थीं। क्या उमराव जान फ़िल्म का संगीत खैय्याम का नहीं है? नहीं, कहना है मशहूर गज़ल गायिका पीनाज मसानी का। तो किस का है? मधु रानी जी का। जिन की मैं शागिर्द हूं। पीनाज मसानी बोलीं। ‘दिल लगाना कोई मजाक नहीं’ गाने वाली पीनाज मसानी ने आर.डी. बर्मन, बप्पी लाहिड़ी, स्वर्गीय जयदेव, मधुरानी, उषा खन्ना आदि ढेर सारे संगीतकारों के साथ काम किया है। अपने कैसेट मुहब्बत के सागर में पीनाज मसानी ने खुद भी संगीत दिया है।

यह बात १९९१ की है। जब नवभारत टाइम्स के लिए दयानंद पांडेय ने उन से बात की। पीनाज मसानी ने उमराव जान के फ़िल्म के संगीत पर सवाल उठा दिया था। खास लखनऊ में। एक तरह से मुजफ़्फ़र अली के आंगन में। उन के घर से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर होटल क्लार्क्स में बैठी वह मुझ से बतिया रही थीं। उन दिनों वह गज़लों की रानी बनी घूमती थीं। क्या उमराव जान फ़िल्म का संगीत खैय्याम का नहीं है? नहीं, कहना है मशहूर गज़ल गायिका पीनाज मसानी का। तो किस का है? मधु रानी जी का। जिन की मैं शागिर्द हूं। पीनाज मसानी बोलीं। ‘दिल लगाना कोई मजाक नहीं’ गाने वाली पीनाज मसानी ने आर.डी. बर्मन, बप्पी लाहिड़ी, स्वर्गीय जयदेव, मधुरानी, उषा खन्ना आदि ढेर सारे संगीतकारों के साथ काम किया है। अपने कैसेट मुहब्बत के सागर में पीनाज मसानी ने खुद भी संगीत दिया है।
हिंदी और तमिल फ़िल्मों में भी पीनाज मसानी ने गाया है। पीनाज बंबई मूल की हैं और वहीं रहती हैं। तलत अजीज, अनूप जलोटा, पंकज उधास को अपना समकालीन मानती हैं। चंदन दास, अशोक खोसला को अपने बाद, लेकिन अच्छा मानती हैं। वह शकील बंदायूनी का एक शेर सुनाती हैं, ‘मेरी ज़िंदगी है जालिम तेरे गम से आशिकारा/ तेरा गम है दर हकीकत तेरे दर से प्यारा।’ कहतीं हैं कि यह शेर मुझे बहुत पसंद हैं। फिर वह गालिब का एक मिसरा पढ़ती हैं ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है’ और कहतीं हैं मुझे यह भी बहुत पसंद है। पीनाज मसानी अपने गुरु मधुरानी की सब से अच्छी कंपोजिंग में गाई मीर की एक गज़ल का ज़िक्र करती हैं और उस के दो शेर सुनाती हैं। ‘रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह/अटका कहीं जो आप का भी दिल इसी तरह।’

मधुरानी के संगीत की वह फिर तारीफ करने से नहीं अघातीं। दो शेर फिर सुनाती हैं। ‘दिल में रख लो कि निगाहों में बसा लो मुझ को/ जिंदगी हूं मैं किसी शक्ल में ढालो मुझ को।’ रियाज कब करती हैं, पूछने पर वह कहती हैं, सुबह-सुबह। घर में कौन-कौन है? माता-पिता। एक बड़ी बहन भी है मेरी। उस की शादी हो गई है। किसी ने फिकरा कस दिया है ‘हर आदमी की सफलता के पीछे किसी औरत का हाथ होता है और आप के?’ फिकरा सुन कर पीनाज मसानी क्षण भर को ठिठकती हैं। फिर बेलौस हो जाती हैं। कहती हैं, ‘मेरी सफलता के पीछे खुदा का हाथ है। फिर वह जैसे जोड़ती हैं, ‘हां, मेरी सफलता के पीछे भी एक औरत का हाथ है। मेरी गुरु मधुरानी का हाथ।’ आप की हॉबी क्या है? फैन लेटर्स। रोज करीबन 25-30 फैन लेटर्स आ ही जाते हैं। और टेलीफ़ोन फैन? हां, वह भी हैं। पर फ़ोन पर मैं ज़्यादा बात नहीं करती। अगर आप गज़ल गायिका नहीं होती तो क्या होतीं? पता नहीं। पर क्या पता बी.काम कर के कहीं चार्टड एकाउंटेंट बन जाती।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्‍यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

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