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एक दूसरे को नीचा दिखाने वाले दोनों पक्ष करें आत्‍म-मंथन

बाबा रामदेव की संसद एवं सांसदों के प्रति की गई अशोभनीय टिप्पणी को लेकर बबाल थमता नज़र नहीं आ रहा है। गौरतलब है कि मंगलवार को छत्तीसगढ़ के दुर्ग में अपने अभियान की शुरुआत करते हुए रामदेव ने कहा कि संसद के भीतर कुछ लोग अच्छे हैं, लेकिन ज्यादातर लुटेरे और जाहिल लोग बैठे हुए हैं। उन्होंने सांसदों को हत्यारा तक करार देते हुए कहा कि इनमें से कुछ लोग इन्सान के रूप में शैतान हैं। इससे पहले टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल भी सांसदों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर चुके हैं। २५ फरवरी को यूपी के ग्रेटर नोएडा में एक चुनावी सभा में बोलते वक्त केजरीवाल ने कहा था कि संसद में लुटेरे बैठे हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि संसद में हत्यारे और दुष्कर्मी बैठे हैं और उनसे उन्हें कोई उम्मीद नहीं है।

बाबा रामदेव की संसद एवं सांसदों के प्रति की गई अशोभनीय टिप्पणी को लेकर बबाल थमता नज़र नहीं आ रहा है। गौरतलब है कि मंगलवार को छत्तीसगढ़ के दुर्ग में अपने अभियान की शुरुआत करते हुए रामदेव ने कहा कि संसद के भीतर कुछ लोग अच्छे हैं, लेकिन ज्यादातर लुटेरे और जाहिल लोग बैठे हुए हैं। उन्होंने सांसदों को हत्यारा तक करार देते हुए कहा कि इनमें से कुछ लोग इन्सान के रूप में शैतान हैं। इससे पहले टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल भी सांसदों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर चुके हैं। २५ फरवरी को यूपी के ग्रेटर नोएडा में एक चुनावी सभा में बोलते वक्त केजरीवाल ने कहा था कि संसद में लुटेरे बैठे हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि संसद में हत्यारे और दुष्कर्मी बैठे हैं और उनसे उन्हें कोई उम्मीद नहीं है।

देखा जाए तो दोनों के बयान तार्किक दृष्टि से तो सही ठहराए जा सकते हैं किन्तु व्यावहारिकता के मापदंडों पर खरे नहीं उतरते। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की इतनी स्वतंत्रता नहीं होना चाहिए कि वह नैतिक मूल्यों का ही क्षरण करने लगे। बाबा ने जिस असंसदीय वाणी का प्रयोग किया है उसे किसी भी नजरिये से न्यायोजित नहीं ठहराया जा सकता। संसद की एक मर्यादा है जिसका पालन करना सभी के लिए अवश्यंभावी है। हाँ, बाबा के इस कथन से इंकार नहीं किया जा सकता कि ज़्यादातर माननीयों का चारित्रिक पतन हो चुका है जिन्हें संसद में बैठने का कोई अधिकार नहीं है। किन्तु इस बात को बाबा मर्यादित ढंग से भी कह सकते थे। यहाँ ध्यान देखा होगा कि बाबा और केजरीवाल के बयानों में कोई बड़ा अन्तर नहीं है। दोनों के बयानों का लब्बोलुबाब यह है कि अब देश के कर्णधारों पर विश्वास करना बेमानी है और व्यवस्था परिवर्तन अवश्यंभावी है। किन्तु सवाल यह है कि व्यवस्था परिवर्तन हेतु विकल्प कहाँ हैं?

बाबा रामदेव ने काले धन की स्वदेश वापसी हेतु जिस अभियान का आवाहन किया था वह राजनीति की कुटिल चालों में उलझकर पथभ्रष्ट हो चुका है। पिछले वर्ष बाबा के अभियान को नेस्तनाबूत कर सरकार ने बाबा को अपने ऊपर हावी होने का मौका दिया किन्तु मीडिया द्वारा बाबा के विषय में जो तथ्य छनकर आ रहे हैं उससे निश्चित रूप से बाबा की लोकप्रियता भी घटी है। एक समय बाबा को राजनीतिक विकल्प के रूप में देखने वाला मीडिया आज बाबा के अरबों के साम्राज्य का भांडा फोड़ उन्हें व्यापारी साबित कर रहा है। बाबा पर कई तरह के आरोप हैं जिन्हें वे आज तक नहीं झुठला पाए। तब सवाल यह उठता है कि अकूत धन-सम्पदा के धनी बाबा किस मुंह से व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं? संसद में बैठकर जो लोग धनाढ्य वर्ग की शोभा बढ़ाकर बाबा के निशाने पर हैं तो बिना संसद सदस्य बने बाबा भी उसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं; ऐसी स्थिति में दोनों में से सही कौन है? जहां तक बात केजरीवाल के बयान की है तो उन्हें पहले अपनी टीम तथा स्वयं के दागदार होते दामन को देखना चाहिए तब दूसरों के ऊपर कीचड़ उछालना चाहिए। 

अब जबकि बाबा के बयान को लेकर तमाम संसद सदस्य विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात कर रहे हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि केजरीवाल के विरुद्ध जो विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव आया था उसका क्या हुआ? विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव के अंतर्गत दोनों पक्षों को संसद में अपने कथन की सत्यता को प्रमाणित करना पड़ता है। तो क्या संसद में इतना साहस भी नहीं था कि वह केजरीवाल के बयान को झूठा साबित कर उन्हें कड़ी सजा दे? जिस विशेषाधिकार हनन कानून की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को जेल जाना पड़ा, उस कानून का उपयोग मात्र डराने-धमकाने के लिए हो रहा है। क्यों नहीं हमारे माननीय विशेषाधिकार हनन कानून के अंतर्गत केजरीवाल एवं बाबा रामदेव को जेल की सलाखों के पीछे ड़ाल देते? मोटे तौर पर देखा जाए तो यहाँ इच्छाशक्ति की कमी माननीयों में ही नज़र आती है क्योंकि दूध के धुले तो वे भी नहीं है। जब दोनों ही पक्ष नैतिक रूप से पूर्ण नहीं हैं तो पहले दोनों आत्म-मंथन करें तब एक-दूसरे के गुण-दोषों की बात करें वरना अशोभनीय टिप्पणी करने से दोनों पक्ष अपनी बची-खुची प्रासंगिकता भी खो देंगे? इस स्थिति में कमजोर हमारा लोकतंत्र ही होगा जिसकी जवाबदेही से ये बच नहीं सकते।

लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम ग्‍वालियर से प्रकाशित स्‍वदेश में भोपाल ब्‍यूरो में विशेष संवाददाता हैं.

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