दिल्ली धमाके के अफसोसनाक बारह दिन बीतने को हैं, मगर मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी की तरफ से किसी ठोस नतीजे की दावेदारी नहीं की जा रही। लग रहा है कि मामले की जांच के सिलसिले में अबतक सिर्फ अंधेरे में ही तीरें चल रही हैं। वो भी ऐसी तीर जिसमें आतंकियों के माड्यूल पर निशाना साधने के बजाय यह ख्याल किया जा रहा है कि संदिग्धों को चोट ना आने पाए। यह आतंकवादी मामलों की नए तरीके से जांच कराने की सियासी दावेदारी का नतीजा है जिसमें जांचकर्ताओं के हाथ पैर बुरी तरह से जकड़ा हुआ नजर आ रहा है।
हाईकोर्ट धमाके के हादसे में हताहत के परिवारों की हालत को देखकर कायम जख्म को एनआईए की विफलता हरा भरा करने का ही काम कर रही है। एनआईए की तरफ से वारदात के छठे दिन बेतक्कलुफी से बता दिया गया कि आतंकवादियों की पहचान की लीड नहीं मिल पाई है। इसे लेकर मीडिया में छपी खबरें ठीक नहीं हैं। कुल मिलाकर एनआईए चीफ का प्रेस कांफ्रेंस लोगों में व्यवस्था के प्रति भरोसा जगाने की बात करने के बजाए विफलता का बखान करने और मीडिया रिपोर्टों से चोट महसूस करने वाले कश्मीरी आतंकी माड्यूल को सहलाने के लिए बुलाया गया लगा। एनआईए चीफ के मुताबिक कश्मीर के किश्तवाड़ में धमाके से दो घंटे पहले जिन स्कूलों बच्चों को दावेदारी वाला मेल करने का आदेश दिया गया था उनसे धमाका करने वालों के बारे में ठोस जानकारियां नहीं मिल पाई हैं।
बल्कि जांच में जो जानकारियां हासिल हुई हैं उनसे आतंकी जांच की गुत्थियां सुलझने के बजाय उलझती ही जा रही है। एनआईए की दिल्ली धमाके की जांच में कश्मीर के किश्तवाड़ से लेकर सुदूर केरल में सक्रिय आतंकी माड्यूल के बीच खास किस्म के एका का पता लगा है। ये भी पता लगा है कि मुंबई धमाकों के विस्फोटक और दिल्ली धमाकों के विस्फोटकों में कुछ हद तक साम्य है। ये खतरनाक जानकारियां मिली हैं कि अब सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि आतंकियों ने श्रीलंका, बंग्लादेश और नेपाल समेत अरब मुल्कों में ठौर विकसित कर लिया है। ज्यादा देशों के बीच उलझती जा रही जांच से जल्द नतीजे मिलने की उम्मीद धूमिल है।
एनआईए की जांच की मौजूदा दिशा को देखकर कहा जा सकता है कि जांच में एक लीड पर फोकस होकर फैसला करने से बचा जा रहा है। इसकी वजह से यह सोचना अब दूर की कौड़ी है कि दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने 2008 में दिल्ली को नौ धमाकों से दहलाने वाले आतंकियों और आतंकवादियों के संजाल को जिस तरह से छह दिनों के भीतर ही तिल्ली झिन्नी कर दिया गया था। उसी तरह एनआईए की जांच में फौरी नतीजा आएगा। तब आतंकियों के खिलाफ आपरेशन में इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की शहादत के साथ ही सच प्रतीत हुआ दावा कर दिया गया था कि अब सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के किसी कोने में होने वाले धमाके में इंडियन मुजाहिदीन नाम के संगठन की तरफ से दावेदारी किए जाने का सिलसिला थम जाएगा। मतलब दिल्ली पुलिस की जाबांज कार्रवाई में इंडियन मुजाहिदीन नाम की कुख्यात तंजीम को तात्कालिक तौर पर जड़ से उखाड़कर फेंक दिया गया था।
नवगठित एनआईए का सीबीआई की विशेष अपराध शाखा, दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल और मुंबई के एंटी टेरोरिस्ट स्कावर्ड (एटीएस) जैसा ट्रैक रिकार्ड अबतक नहीं बन पाया है। आतंकवाद को सियासी चश्मे से देखने की बनी नीति के तहत शायद वैसा ट्रैक रिकार्ड बनाना फिलहाल मुमकिन भी नहीं जिसमें जांचकर्ताओं पर आतंकी वारदात के हफ्ते–डेढ़ हफ्ते के अंदर आतंकियों की धडपकड़ कर लेने या वारदात के खुलासे के लिए कारगर लीड हासिल करने का दबाव या प्रतियोगी जज़्बा हुआ करता था। फिर भी आतंकवाद से निपटने में लगी एनआईए को याद रखना चाहिए कि आतंकवाद के जख्म की दर्द से कराह रहे लोग स्वभाविक तौर पर उनसे उम्मीद रखते हैं। मसलन एनआईए से ऐसे पहल की उम्मीद की जाती है, जिनसे आतंकी वारदातों से सुरक्षा के प्रति चिंतित लोगों में भरोसा पैदा हो। पहल से आमजन में सुरक्षा का बोध कराने और आतंकवादियों के लिए खतरनाक होने के बखान की उम्मीद की जाती है।
आतंकवाद का क्रूरतम दंश झेल रहे मुल्क के लोगों में राष्ट्रीय एजेंसी से यह भाव भरने की उम्मीद की जाती है कि आतंकवादी ज्यादा देर तक महफूज नहीं रह सकते। दुनिया में आतंकवाद का सबसे कलुषित रूप झेल रहे लोग अपनी एजेंसी इस गारंटी की उम्मीद करते हैं कि वारदात करने के बाद आतंकवादी चाहे जिस किसी मांद में जाकर बिला गए हों, उनको एनआईए की जांचकर्ताओं की खूंखार नजरें जल्द ढूंढ निकालेंगी। मगर ऐसे किसी सक्षमता के प्रदर्शन में एनआईए अबतक विफल रही है। एनआईए का यह चेहरा सीबीआई की विशेष अपराध शाखा यानी टेरोरिस्ट गतिविधियों की जांच करने वाली विंग को खत्म कर एनआईए के हवाले करने के फैसले वक्त उठे संशय को ही पुष्ट करता है। तब लगभग आज लोकपाल के दायरे में सीबीआई को लाने को लेकर छिडे़ बहस की तर्ज पर ही विवाद मचा था कि विशेष अपराध शाखा को कुंद कर एनआईए के हवाले करने से सीबीआई को कमजोर करने की साजिश हो रही है। लेकिन बहस छेडने वालों की एक नहीं चली थी और 1993 के मुंबई सीरियल धमाकों की जांच में अच्छी शोहरत कमाने वाली सीबीआई से आतंकवादी वारदातों की जांच लेकर एनआईए बनाने का फैसला कर लिया गया। गौरतलब है कि मुंबई सीरियल धमाकों की सीबीआई की जांच और मुकदमे ने दाउद इब्राहिम जैसे कुख्यात डान की पिल्लियां चमकाकर रख दी और धमाकों से बुरी तरह झुलसे मुंबई के लोगों में व्यवस्था के प्रति यह भरोसा पैदा करने का काम किया कि वो सीबीआई या एटीएस के चीतों की निगरानी में महफूज हैं।
एनआईए लोगों के बीच ऐसा कोई भाव भरने के बजाय उल्टी बानी बोल रही है। दिल्ली हाईकोर्ट धमाके की जांच के हफ्ते भर में पहला प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर बडी निर्लज्जता से कह दिया कि वो आतंकियों तक पहुंचने में विफल रही है। एनआईए प्रमुख ने अपनी विफलता के साथ मीडिया पर सेंसरशिप लगाने के अंदाज में यह भी कहा कि आतंकियों के किश्तवाड़ कनेक्शन की अपुष्ट खबरें आ रही हैं। याद रखने की जरूरत है कि ऐसे मौकों पर मीडिया को बुलाकर उसे गलत होने का अहसास कराने के खंडन के बजाय सुरक्षा एजेंसियों स्थापित रिवाज है कि जांच प्रगति से जुडी कुछ नई और चौंकाने वाली जानकारियां दी जाएं। जिससे आतंकवाद की चपेट में आए लोग या आतंकी वारदात से घबराए लोगों में व्यवस्था के प्रति आस्था बहाल की जा सके और वारदात करने वाले आतंकियों में ये बताकर घबराहट पैदा कर दी जाए कि सुरक्षा एजेंसियों के हाथ बस उनके गिरेबान पर पहुंचने वाले ही हैं।
बहरहाल तीस साल से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने जिस जम्मू-कश्मीर को लहुलुहान कर रखा है उस जम्मू-कश्मीर से 2001 में संसद पर हमले की खबर के बाद 2011 की यह दूसरी घटना है। जिसमें पता लगा है कि आतंकवादी सीधे कश्मीर के रास्ते दिल्ली में आए और मनमर्जी का तांडव कर गए। 2001 और 2011 का फर्क यह है कि 2001 में एनआईए नहीं थी और मामले की जांच दिल्ली पुलिस ने किया था। समय रहते दिल्ली पुलिस के हाथ आतंकवादियों के गिरेबान तक पहुंच गया और नतीजा है कि संसद हमले का प्रमुख अभियुक्त अफजल गुरु आज फांसी पर झूलने की तारीख का इंतजार कर रहा है।
सुरक्षा से जुड़ी सच्चाई है कि तीस सालों से जम्मू-कश्मीर में हमारी अभूतपूर्व चौकसी है। एक अर्थ में हमारे सबल तंत्र ने पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में ही उलझाकर रख दिया। सीमापार से जम्मू-कश्मीर आने वाले आतंकवादियों को इस राज्य से सीधे सरककर दिल्ली अथवा देश के दूसरे हिस्से में धमक जमाने के रास्ते हमारे संवेदी तंत्र ने रोक रखा है। मुमकिन है कि हाल के सियासी दांव से यह तंत्र कमजोर हुआ हो। क्योंकि जिस तरह से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की तैनाती कम की जा रही है और सीमा से सेना की तादाद कम हो रही है यह सब उस तबके को साल रहा है, जो मानते हैं कि आंतकवाद से मुकाबले के लिए किसी तरह की ढिलाई भविष्य के लिए खतरा है। जम्मू-कश्मीर की रियायतें सीमापार से आतंकवाद के संचालकों में भरोसा पैदा करने के लिए काफी है। हो सकता है कि नए पनपे भरोसे के तहत ही सीधे जम्मू-कश्मीर के रास्ते किश्तवाड़ से दिल्ली के लिए आतंकवादियों को रवाना किया गया।
ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की तरफ से हमारे खिलाफ निरंतर जारी आतंकवाद की सरकारी नीति को जम्मू-कश्मीर के रास्ते देश के दूसरे हिस्से में पहुंचाने की कोशिश नहीं की जाती है। बल्कि आतंकवाद के मोर्चे पर फेल होने के बाद जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी सियासत में गहरे पैठ रखने वाले पाकिस्तान की तरफ से कोशिश की जाती रही है कि जम्मू-कश्मीर के किसी वारदात पर हमारे देश के दूसरे हिस्से में प्रतिक्रियाएं हों। 2002 में लश्करे तोइबा के हाथों मारे गए अलगाववादी नेता प्रो.अब्दुल गनी लोन ने दिल्ली, हैदराबाद और कोलकाता में घुम घुमकर यही काम करना शुरू किया था। लोन के साथ देशभर में जलसा कर कई कश्मीरी अलगाववादी नेता गुहार लगाते कि कश्मीर में होने वाले वारदातों पर देश के दूसरे हिस्से में भी प्रतिक्रिया हो। दिल्ली के जामा मस्जिद और फतेहपुरी मस्जिद के इमामों को भी इस काम के लिए पटाने की कोशिश होती रही। लेकिन आतंकवाद के खिलाफ आम लोगों के नफरत ने तब उनकी दाल नहीं गलने दी।
आतंकवाद से निपटने के लिए ठोस और मजबूत कार्रवाई की शुरू से पैरवी की जाती रही है। लेकिन न जाने क्यों एनआईए का मौजूदा रवैया शंकाएं पैदा
कर रहा है। इस रवैए से खतरनाक बदलाव का अहसास हो रहा है। आभास हो रहा है कि सरकार पर सियासत का रंग चढ़ गया है। उम्मीद है कि नजाकत को जल्द भांप लिया जाएगा। एनआईए की तरफ से प्रेस कांफ्रेंस कर जुबानी तौर पर ही सही दिल्ली धमाके के सूत्रधारों में दहशत पैदा करने का काम किया जाएगा। जांच को तेजी से उस मकाम तक पहुंचाया जाएगा कि मामले का खुलासा हो पाए। जो लोग हिरासत में लिए गए हैं उनके बारे में बताया जाएगा।
लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. वे काठमांडू में नेपाल वन टीवी के मैनेजिंग एडिटर भी रहे हैं.


