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एब्सर्ड नाटकों के जनक हैं भुवनेश्वर : नंद किशोर आचार्य

दिल्ली। भुवनेश्वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा (1946) भारतीय ही नहीं, अंग्रेज़ी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में भी लिखा गया पहला ‘एब्सर्ड (असंगत)’ नाटक है। पश्चिम में भी इसकी शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद होती है। अतः भुवनेश्वर को ‘एब्सर्ड (असंगत)’ नाटकों का जनक कहा जाना चाहिए। उक्त विचार प्रसिद्ध कवि आलोचक और नाट्यचिंतक नंदकिशोर आचार्य ने साहित्य अकादेमी द्वारा भुवनेश्वर जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। आगे उन्होंने कहा कि बड़ा रचनाकार वही होता है जो लेखन के लिए नई दृष्टि विकसित करता है और यह दृष्टि पाने के लिए उसे एक नए ‘फार्म’ को चुनना होता है। भुवनेश्वर ने अपने नाटकों और कहानियों के लिए एक नए ‘फार्म’ का आविष्कार किया। उनके ‘फार्म’ पर गंभीर अध्ययन की ज़रूरत है।

दिल्ली। भुवनेश्वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा (1946) भारतीय ही नहीं, अंग्रेज़ी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में भी लिखा गया पहला ‘एब्सर्ड (असंगत)’ नाटक है। पश्चिम में भी इसकी शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद होती है। अतः भुवनेश्वर को ‘एब्सर्ड (असंगत)’ नाटकों का जनक कहा जाना चाहिए। उक्त विचार प्रसिद्ध कवि आलोचक और नाट्यचिंतक नंदकिशोर आचार्य ने साहित्य अकादेमी द्वारा भुवनेश्वर जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। आगे उन्होंने कहा कि बड़ा रचनाकार वही होता है जो लेखन के लिए नई दृष्टि विकसित करता है और यह दृष्टि पाने के लिए उसे एक नए ‘फार्म’ को चुनना होता है। भुवनेश्वर ने अपने नाटकों और कहानियों के लिए एक नए ‘फार्म’ का आविष्कार किया। उनके ‘फार्म’ पर गंभीर अध्ययन की ज़रूरत है।

प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने बीज भाषण में कहा कि भुवनेश्वर का संपूर्ण साहित्य भावुकता को अस्वीकृत करता है। भुवनेश्वर रस की सत्ता को समाप्त कर ‘आत्मताप’ को प्रतिष्ठित करते हैं। हिंदी जगत ने उनके ‘क़िस्सों’ पर ज़्यादा ध्यान दिया है जबकि उनके कृतित्व का जाँचा-परखा जाना अभी बाक़ी है। ख़ासतौर पर उनके नाटकों की अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि भुवनेश्वर अपने ज़माने से आगे के रचनाकार थे। 1930 से 1955 के बीच में उन जैसा प्रतिभाशाली लेखक कोई नहीं है। प्रेमचंद द्वारा उनको अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने के संदर्भ पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिए। इससे पहले हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक माधव कौशिक ने कहा कि समाज से अलग सोचने वाले लेखकों के साथ हमने हमेशा अमानवीय व्यवहार किया है जो ग़लत है। भुवनेश्वर की त्रासदी अन्य लेखकों की भी त्रासदी है।

भुवनेश्वर की कहानियों पर आधारित सत्र की अध्यक्षता प्रो. गोपेश्वर सिंह ने की और मंजुला राना तथा सुषमा भटनागर ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। सुषमा भटनागर जी ने उनकी कहानियों में निर्भीक सच्चाईयों का विश्लेषण किया। गोपेश्वर सिंह ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि उनकी कहानियों में नई कहानी की तीन बातें पहली बार सामने आती हैं। पहली बात – अकेलापन, दूसरी बात प्रेम की सघन किंतु मौन अनुभूति और तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण बात – कहानी की नई भाषा। इस तरह भुवनेश्वर नई कहानी की प्रस्तावना लिखने वाले हैं। उन्हें केवल ‘भेड़िए’ कहानी तक सीमित नहीं कर देना चाहिए। दिन के अंतिम सत्र में भुवनेश्वर के नाट्य साहित्य पर देवेन्द्र राज अंकुर की अध्यक्षता में भानु भारती, ज्योतिष जोशी और राज कुमार शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किए। भुवनेश्वर को रंगमंच पर पहली बार प्रस्तुत करने वाले भानु भारती ने कहा कि भारतीय रंगमंच भुवनेश्वर के बिना अधूरा है। हिंदी रंग जगत ने उनके नाटकों के साथ अन्याय किया है। उनके नाटक घटनाओं से मुक्त हैं लेकिन उसका शिल्प चौंकाने वाला है। शब्दों की इतनी मितव्ययता आज दुर्लभ है।

ज्योतिष जोशी ने कहा कि भुवनेश्वर के नाटकों का कोई विकल्प नहीं है। स्त्री पुरूष संबंधों को अपने समय में वे जिस बेबाक़ी से उठाते हैं वह दुर्लभ है। उनके नाटकों में कला का कोई प्रभा मंडल नहीं है बल्कि एक वैचारिक मौलिकता है। देवेन्द्र राज अंकुर ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि भुवनेश्वर को एब्सर्ड नाटककार के फ्रेम में रख दिया गया है जिससे उनके नाटकों से दूरी बना ली गई है जो सर्वथा ग़लत है। उनके नाटकों के दृश्य खंडों में जो चाक्षुष प्रभाव है, वह आज के समय में अकल्पनीय है। उनके नाटकों में कथा की नई रंग भाषा है, उसे समझकर उन्हें ज्यादा से ज्यादा मंचित करने की ज़रूरत है। कार्यक्रम का संचालन उपसचिव श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन उपसचिव के.एस. राव ने किया।

अजय कुमार शर्मा की रिपोर्ट.

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