Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिजनेस

एसपी और एसपी के बाद का टेलीविजन

आज तक सबसे तेज़। इसके निर्माता-एस.पी.। वो एस.पी., जिन्हें बड़ी शिद्दत के साथ आज भी याद किया जाता है। सैटेलाइट के ज़रिये ख़बरों की दुनिया को बदलने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। आज के कई, “नामचीन” नामों को भी गुरु एस.पी. के शागिर्द के रूप में जाना जाता है। गुरु एस.पी. ने ख़ासे अंदाज़ में, शानदार आगाज़ किया। तब, छोटे-छोटे शहरों में केबल टी.वी. प्रभावी था और सैटेलाइट ख़बरों का बाज़ार नया नवेला, मगर मज़बूत था और गलाकाट प्रतिस्पर्धा कम थी, लिहाज़ा नायक से महानायक बनना एस.पी. के लिए बेहद आसान था (ये बात दावे के साथ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उसी दौर में टीवी पत्रकारिता की तरफ मेरा भी रूख हुआ था)। एस.पी. ने एक नयी और अपेक्षाकृत युवा टीम के साथ प्रयोग किया, सफल हुए। तब के कई नौसिखिये वास्तव में आज पत्रकारिता के स्टार हैं और कुछ स्वयंभू स्टार। स्वयंभू इसलिए लिखा हूँ, कि- कुछ ने एस.पी. को अपनी कामयाबी की नींव मानने से इनकार कर दिया। 

आज तक सबसे तेज़। इसके निर्माता-एस.पी.। वो एस.पी., जिन्हें बड़ी शिद्दत के साथ आज भी याद किया जाता है। सैटेलाइट के ज़रिये ख़बरों की दुनिया को बदलने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। आज के कई, “नामचीन” नामों को भी गुरु एस.पी. के शागिर्द के रूप में जाना जाता है। गुरु एस.पी. ने ख़ासे अंदाज़ में, शानदार आगाज़ किया। तब, छोटे-छोटे शहरों में केबल टी.वी. प्रभावी था और सैटेलाइट ख़बरों का बाज़ार नया नवेला, मगर मज़बूत था और गलाकाट प्रतिस्पर्धा कम थी, लिहाज़ा नायक से महानायक बनना एस.पी. के लिए बेहद आसान था (ये बात दावे के साथ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उसी दौर में टीवी पत्रकारिता की तरफ मेरा भी रूख हुआ था)। एस.पी. ने एक नयी और अपेक्षाकृत युवा टीम के साथ प्रयोग किया, सफल हुए। तब के कई नौसिखिये वास्तव में आज पत्रकारिता के स्टार हैं और कुछ स्वयंभू स्टार। स्वयंभू इसलिए लिखा हूँ, कि- कुछ ने एस.पी. को अपनी कामयाबी की नींव मानने से इनकार कर दिया। 
एस.पी. ने नाम की बजाय काम को आमंत्रित किया। उन लोगों को ज़बान दी, जो क़ाबिल तो थे पर अवसर के अभाव में बे-जुबां थे। पत्रकारिता तल्ख़ थी और सत्ता के निरकुंश पैतरों से दो-दो हाथ करने को तैयार थी। अंजाम की परवाह कम थी (IBN7 के आशुतोष जी को कांशीराम का थप्पड़ याद होगा)। एस.पी. ने उन पत्रकारों की टीम तैयार की, जो सीधा आसमाँ में उड़ने की बजाय-ज़मीन पर रहकर गली की ख़ाक छानने को बेकरार थे। जोश और होश (अनुभवी और नए) का बेहतरीन गठजोड़ तैयार किया। ख़बरों की दुनिया का ये दौर बे-मिसाल था।  ये एक ऐसा दौर था, जहां रिपोर्टर, एंकर या प्रोड्यूसर नाम के बल पर नहीं-काम के बल पर मौक़ा पाते थे। एस.पी. में जाबांजी थे- वो नए और बिना नाम वाले वाले अनुभवी लोगों को मौक़ा देते थे। एस.पी.ने नामचीन लोगों के कंधे पर सवार होकर, महानायक का खिताब हासिल नहीं किया, बल्कि दिलेर युवकों और ईमानदार तजुर्बे को नुकीला हथियार बनाया। एक ऐसा हथियार, जो ख़बरों की दुनिया में पत्थर में भी सुराख कर देने का माद्दा रखता था और बाज़ार को झुकाना जानता था। ये कुछ बानगी थी एस.पी. के दौर में। अब नज़र डालते हैं – एस.पी.के बाद…।

एस.पी. बहुत जल्दी चले गए, विरासत भी शानदार छोड़ गए। पर इस विरासत को संभालने वालों में से कई उलटे सर बाज़ार के सुर-ताल पर नाचने लगे। बिना ज़मी सूंघे, हवा में उड़ने का शौक रखने वालों को लाइसेंस बांटने लगे। राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के एंकर ऐसे-ऐसे नवे-नवेले लोग बन गए जो दिल्ली- मुंबई के बाहर का हिन्दुस्तान बतौर पत्रकार ६ महीने के लिए भी देखे ही नहीं। “जुगाड़” वाले बड़े पत्रकार बन गए। जो ज़मीन सूंघ कर दावेदारी पेश किये – दरकिनार कर दिए गए। जो भी किसी चैनल में गया, “अपनी” टीम लेकर गया। इस टीम में कूबत की बजाय चाटुकारिता पैमाना बन गयी। एस.पी. ने जिन्हें जूझना सिखाया, लड़ना सिखाया- वो लोग बिना जूझे और ज़मीन पर ना रहने वाले लोगों के (आज) मुखिया बन बैठे हैं। जिस तरह ज़मीन सूंघे बिना राज्यसभा से घुसकर लोग बड़े नेता बन रहे हैं, कमोबेश उसी तर्ज़ पर आज टी.वी. पत्रकारिता में बड़े पत्रकार बन रहे हैं। टी.वी. पत्रकारिता, स्टूडियो-इन्टरनेट- यू-टयूब-दिल्ली-मुंबई के बीच तक ही सिमट चली है। एस.पी. ने बड़े चैनल या नाम को दरकिनार कर अंजाम की परवाह की, पर उन्हीं के बहुतेरे चेले आज अंजाम से उलट नाम और बड़े चैनल के टैग पर फ़िदा हैं। 

एस.पी. ने पत्रकारिता का जुनून रखने वालों की खोज की। एस.पी. के कई नुमाइंदे आज पत्रकारिता की बजाय “जुगाड़” रखने वालों को खोजते अहमियत देते हैं। एस.पी. ने बायोडाटा के बजाय काम को परखा, एस.पी. के चेले आज-कल बायोडाटा की चाशनी में घुले जा रहे हैं। (कुछ अपवादों को छोड़ दें तो) आशुतोष, पुण्य-प्रसून जैसे कुछ नाम आज भी हैं, जो बाज़ार के तानाशाही रवैये को गाली नहीं बक सकते पर, यकीनन बाज़ार को उलटे सर सलामी भी नहीं ठोंकते। जिन से मिल कर आप कह सकते हैं कि इनके तेवर एस.पी. से अलग नहीं हैं। इन्हें देख कर आप कह सकते हैं कि आज भी बायोडाटा के लुभावने हेर-फेर में ना पड़ने वाले बेहद कम लोगों में ये भी शुमार हैं। इन्हें देखकर आप को संतोष मिल सकता है कि काम को तवज़्ज़ो देने वाले कुछ लोग आज भी टी.वी. पत्रकारिता में मौजूद हैं। ये लोग पत्रकारिता के जुनून को इज्ज़त बख्शते हैं। काम की बजाय बड़े चैनल के टैग से प्रभावित नहीं होते। किसी मीडिया-मालिक के यहाँ नौकरी कर रहे एस.पी. के ये नाम भी एक नौकर ही हैं पर तलवे चाटने वाले गुलाम नहीं। एस.पी. की आत्मा इस बात से सुकून पा सकती है कि उनके कुछ शागिर्द, उनकी इज्ज़त की बखिया नहीं उधेड़े। 

एस.पी. के बाद बाज़ार का गुना-गणित बड़ी तेज़ी से बदला। पत्रकारिता का मिजाज़ भी बदला। जुगाड़, तजुर्बे के सामने भारी पड़ने लगा। बड़े चैनल टैग का झांसा देकर कम कूबत वाले ज़्यादा सैलरी पाने में सफल हैं। एंकर-प्रोड्यूसर-रिपोर्टर बनने के लिए “जुगाड़” बुनियादी ज़रुरत है। ये बानगी है एस.पी. के बाद की। अंत में इतना ही कहना उचित होगा कि- एस.पी. टी.वी. पत्रकारिता का एक नाम-भर नहीं बल्कि एक फॉर्मूला है। इसी फॉर्मूला से पनपी और जवान हुई टी.वी. पत्रकारिता। कहते हैं जवानी होश का लिहाज़ नहीं करती और अक्सर बेलगाम हो जाती  है…..बाज़ार में उतरने के बाद बदनामी का दाग भी छोड़ जाती है। जवान हो रही टी.वी. पत्रकारिता और एस.पी. के क्षत्रपों को आज ये याद रखना होगा कि एस.पी. ने जिस टी.वी. पत्रकारिता को पैदा कर विरासत में उन्हें दिया उसकी नथ उतारने से बाज आना होगा। पत्रकारिता और बाज़ार शायद यही दो पहलू रहे – एस.पी. और एस.पी. के बाद।

लेखक नीरज टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...