: स्व. चन्द्रजीत यादव की पुण्य तिथि के अवसर पर : 19 अप्रैल 1982 को संसद में बहस के दौरान स्व. चन्द्रजीत यादव ने देश के किसानों के दर्द को इस तरह पेश किया – कृषि हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था की आज भी रीढ़ है और यदि हिन्दुस्तान में और खेती करने वालों की हालत नहीं सुधरेगी तो यह देश गरीब रहेगा और इस देश में गरीबी बेरोजगारी और आर्थिक विषमता खत्म नही हो सकती। आज दुर्भाग्य की बात है कि 35 वर्ष की आजादी के बाद भी हमारे देश के किसानों की आर्थिक हालत सबसे ज्यादा खराब है। आज अगर हम बिल्कुल निष्पक्ष रूप से देखें तो किसान की हालत में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। भाटिया जी ने हरियाणा और पंजाब के किसानों की चर्चा की। पर उनको भी मालूम है कि पंजाब और हरियाणा का किसान दूसरे प्रदेशों के किसानों की अपेक्षा ज्यादा उन्नत, ज्यादा अमीर और ज्यादा आधुनिक खेती करने वाला होने के बावजूद देश के विभिन्न भागों में 90 प्रतिशत किसान कर्जे से दबा हुआ है। खासतौर से ऐसे किसान जिनके पास दो-तीन एकड़ से कम जमीन है, उनकी हालत बिल्कुल एक खेतिहर मजदूर की श्रेणी के बराबर है। छोटे किसान और खेतिहर मजदूर दोनों की हालत बहुत खराब है।
श्रीमन्, अभी जो कीमत दी जा रही है, उसके बारे में मैं कहना चाहता हूँ कि पिछले तीन वर्षों के खेती के इस्तेमाल में आने वाली वस्तुएँ, जैसे-फर्टीलाइजर, डीजल, ट्रैक्टर, और दूसरे सामानों के दाम जिस रेट से बढ़े हैं, उसका अगर औसत निकाला जाए तो उस औसत से सरकार ने किसानों को न तो गन्ने की कीमत दी है और न गेहूँ, चावल, सरसों, चने आदि की कीमत दी है। इसकी वजह से किसानों में गहरा अंसतोष है। मेरी सबसे बड़ी आलोचना यही है कि सरकार किसानों के साथ इंसाफ नहीं करती। जब तक किसान आन्दोलन नहीं करता, लड़ने के लिए मजबूर नहीं हो जाता, तब तक उसको उचित दाम नहीं मिलता। पिछली बार गन्ने का दाम 13 रूपये प्रति क्विंटल तय किया गया था और जब सारे देश में किसानों ने आन्दोलन शुरू किया और जब आन्दोलन महाराष्ट्र और तमिलनाडु में शुरू हो गया तो उसके डर से फिर सराकर ने 20 रूपये प्रति क्विंटल कीमत दी, लेकिन यह कीमत उसको पहले दी जानी चाहिए थी। मुझे कृषि मंत्री महोदय एक भी उदाहरण दे दें इस देश में कारखाने के मालिक, उद्योगपति कभी अपने उत्पादन की कीमत के लिए आन्दोलन करते हैं? कभी वे अपने कारखाने बंद करते हैं? बिजली का दाम, मजदूरों की तनख्वाह, डीजल के दाम बढ़ने से उनके उत्पादन का जो रेट बढ़ता है, उस रेट से सरकार बिना किसी आन्दोलन के उनका मुनाफा बढ़ा देती है, लेकिन एक किसान ऐसा है जो देश की रीढ़ होते हुए जब तक लड़ता नहीं है और सरकार को मजबूर नहीं करता तब तक सरकार उसके साथ न्याय नहीं करती। जो 142 रूपये गेहूँ का दाम निर्धारित हुआ वह इस बात का सबूत है। बोने से पहले सरकार को दाम घोषित करने चाहिए।
किसान के इस्तेमाल में आने वाली वस्तुओं के दाम 31 प्रतिशत से ज्यादा बढ़े हैं और उसका रेट बढ़ाया गया है 22 प्रतिशत के करीब। किसानों के साथ यह नाइंसाफी क्यों? मैं यह बात कृषि मंत्री जी से पूछना चाहता हूँ। श्रीमन्, इस देश में सिर्फ 25 प्रतिशत गांवों में बिजली पहुँची और 80 प्रतिशत गाँव सड़कों से नहीं जुड़ पाए हैं। 90 प्रतिशत गाँव में अस्पताल नहीं है। गाँवों में किसान रहते हैं। आज इस देश में 35-40 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे रह रहें हैं, उनमें से 90 फीसदी आदमी गाँव में रहते हैं। वे या तो खेती करते हैं या खेतिहर मजदूर हैं या छोटे दस्तकार हैं। जब तक हम गाँव में रहने वालों की हालत नहीं सुधारेंगे, उनकी आर्थिक स्थिति को नहीं सुधारेंगे, तब तक हिन्दुस्तान एक गरीब और पिछड़ा हुआ देश बना रहेगा – इस बात को सरकार को मानना चाहिए। आज उद्योगों और कारखानों में जो सामान तैयार होता है उसके दामों के बारे में सरकार की एक नीति है और खेत में पैदा होने वाले सामान के बारे में दूसरी नीति है। मेरी माँग है कि एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन को समाप्त कर दिया जाए और राष्ट्रीय प्राइस ऐंड प्राफिट कमीशन बनाया जाना चाहिए और वह एक तरफ से, एकरूप कीमतों के अन्दर लाएँ फिर चाहे वह कारखानों का सामान हों, उद्योगों द्वारा तैयार किया गया सामान हो या खेती में पैदा किया गया सामान हो, और एक ही तरह का मुनाफा एक ही तरह की कीमत लागत मूल्य जोड़कर तय करे और इन सभी को वह मिले।
मेरी यह भी मागं है कि भूमि सुधारों को सख्ती से लागू किया जाए। आज हदबंदी नहीं हो रही है। आज भी देश के लाखों किसान है जिनके पास सैकड़ों, हजारों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है जबकि दूसरे किसानों की हालत खराब है। जापान में 99 प्रतिशत किसानों के पास दो एकड़ से भी कम भूमि है लेकिन हम से वे छह गुणा पैदा करते हैं और मेहनत करते हैं। वे इंटेंसिव खेती करते हैं। हमारे यहाँ भी किसानों को सुविधाएँ दी जानी चाहिए। आज भी पन्द्रह करोड़ से ज्यादा रुपया किसानों का चीनी मिलों के ऊपर बकाया है। अगर यही हालत रहेगी तो दो सौ करोड़ से ज्यादा रुपया किसानों का चीनी मिलों की तरफ बकाया हो जाएगा जो वे नहीं दे पाएँगे। अगर यही नीति सरकार की चलती रही और किसान को गन्ने के दाम नहीं मिले और वे बकाया रहते रहे तो मैं चेतावनी देता हूं अगले साल सरकार को चीनी का आयात करने पर मजबूर होना पड़ जाएगा। आज कपास की कीमत किसान को पूरी नहीं मिल रही है। यही हालत रही तो आपको 1983 में कपास का भी आयात करना पड़ेगा। मै अपना अनुभव बताता हूँ। जब किसान को उसकी पैदावार के उचित दाम नहीं मिलते है, दाम उसको कम देते हैं तो कर्जे से लदा होने के कारण देश की अर्थ व्यवस्था के ऊपर उसका बुरा असर पड़ता है। मैं चेतावनी देना चाहता हूँ कि आपको 1983 में चीनी और कपास दोनों का आयात करना पड़ेगा और इस कारण से देश की अर्थ-व्यवस्था के ऊपर इसका बुरा असर पड़ेगा। आपको चाहिए कि आप अपनी नीति को बदलें।
आज भी भारत के आधे से अधिक किसानों की पैदावार का जो औसत होता है वह दुनिया में सबसे कम है। एक पैरा मैं यहां कोट करना चाहता हूँ। हमारे देश के जाने माने अर्थशास्त्रियों भल्ला और अलघ ने अपने अध्ययन की बुनियाद पर कहा है कि देश के विभिन्न भागों में कृषि की दशा एक समान नहीं है और भारी विषमता है। उस पर भी ध्यान देना होगा। इस साल आप 134 मिलियन पैदावार का अंदाजा लगाते हैं। लेकिन पिछले सालों को आप देखें। जिस साल पानी कम बरसा, सूखा हुआ हमारी पैदावार गिर गई। बुनियादी तौर पर आज भी हम प्रकृति के ऊपर निर्भर करते हैं। आप सिंचाई को बढ़ाएँ। बिजली का रेट बढ़ाने के बजाय उसको पूरी बिजली दें। उनकी जो जरूरतें हैं उनको पूरा करें। जिस तरह से कारखानेदारों को उनका मुनाफा लगाकर आप कीमत देते हैं दूसरी चीजो की कीमतों के साथ जोड़कर उसकी कीमत देते है। उसी तरह से आप किसान को भी दें। गाँवों के विकास के ऊपर आज ज्यादा ध्यान दें। इससे देश में गरीबी की समस्या विषमता की समस्या और गरीबों की समस्या भी हल होगी। जो कीमत आपने गेहूँ की घोषित की है उस पर आप पुनर्विचार करें। आप दिल्ली और हरियाणा के बाजार में चले जाएँ। आज भी वहाँ 185-190 रूपये क्विंटल पर गेहूं बिक रहा है। जब कि आपने 142 रूपये कीमत घोषित की है। बाजार में जो दाम है उस हिसाब से कम-से-कम 180-185 रुपये तो आपको किसान को देने चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि कृषि मंत्री इन बातों पर ध्यान देकर किसानों की समस्या को हल करेंगे जिससे गाँवों का और देश का कल्याण हो।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. चन्द्रजीत यादव 1982 में चौधरी चरण सिंह के लोकदल में रहे। अपने चार बार के संसदीय जीवन में वे चाहे विपक्ष में रहे या सत्ता में देश और जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में कभी पीछे नहीं रहे। उनकी ओजस्वी वाणी गहन चिंतन के लोग कायल रहे। संसद में समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर उन्होंने जो विचार व्यक्त किया उसमें से एक यहां प्रस्तुत किया जा रहा है जो सामयिक महत्व का है।
लेखक बनवारी जालान वरिष्ठ पत्रकार हैं.


